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हिंदूनिष्ठ नागरिकों को अपने धर्म, संस्कृति और जीवन पद्धति की रक्षा की खातिर आखिर कब तक आततायियों का शिकार होना पड़ेगा और आप सिर्फ देखते रहेंगे
तरुण विजय
आदित्य नौ वर्ष का है। उसे अपने 34 वर्षीय पिता राजेश की चिता को अग्नि देनी पड़ी। कुछ ही समय पूर्व राजेश ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर पूज्य डॉक्टर जी तथा पूज्य गुरुजी के चित्र के समक्ष खड़े अपने बेटे आदित्य का सुन्दर, सलोना चित्र यह लिखते हुए पोस्ट किया था कि ‘मुझे गर्व है, मेरा बेटा आर.एस.एस. का स्वयंसेवक है।’
जीवन में किसी भी पिता और माता के लिए सबसे दर्दनाक क्षण वह होता है जब उन्हें अपने बच्चे की चिता अपनी आंखों से देखनी पड़े। फिर बचता क्या है जीवन में? राजेश की मां ने अपने बेटे के साथ केवल चौंतीस वर्ष नहीं बिताए। उसने बिताए 2,97,840 घंटे। उसने बिताए 1,78,70,400 मिनट। उसने बिताए न जाने कितने जन्मों के सपने, उम्मीदें और विश्वास के क्षण। तिरुअनंतपुरम के पास कल्लमपल्ली गांव में राजेश एक नारियल तोड़ने वाले कुली सुदर्शन का पुत्र था। वह स्वयं मकान बनाने वाले मिस्त्री या कभी आटो रिक्शाचालक का काम करता था। उसकी पत्नी रीना घर संभालती। साथ में एक भाई राजीव, एक बहन राजी, मां ललिता।
ललिता और सुदर्शन ने कितनी हसरत और चाव से अपने तीनों बच्चों के नाम एक सुर, ताल वाले रखे— राजेश, राजीव और राजी। 34 साल ललिता ने जिस राजेश के साथ बिताए, उसे अचानक चिता पर लेटे देखने का अर्थ क्या है, इसे संसद, विधानसभा या स्तम्भों में शोर मचाने वाले क्या कभी समझ पाएंगे, महसूस कर पाएंगे?
राजेश और रीना के दो बेटे— छह वर्षीय आदित्य और तीन वर्षीय अभिषेक। रीना क्या कभी अपने बच्चों को बता पाएगी कि उनके जिस पिता की आकाश जैसी भुजाएं और सागर जैसा सीना था, उसे कम्युनिस्ट आतंकवादियों ने पहले काटा, फिर 89 घाव किए, फिर निष्प्राण किया।
कौन पत्नी होगी जो अपने पति की इस दारुण मृत्यु को स्मरण कर कथा बताने का साहस कर पाएगी या बच्चों को प्रतिशोधी बनाना चाहेगी? उसके अनागत दिन, महीने, वर्ष स्मृतियों के झरोखों से अंधेरे में उजाला ढूंढते-ढूंढते ही बीतेंगे। और दिल्ली कहेगी कि वह शहीद हो गया, चिन्ता न करो। हमने मुख्यमंत्री को ‘सम्मन’ किया, हमने केरल सरकार से रपट मांगी। ‘अच्छा, अपराधियों को गिरफ्तार कर लिया? तो भाई ठीक ही तो है। अब अपराधी पकड़े गए, उनको सजा मिलेगी। और क्या चाहिए? संसद में मामला उठाया, जोरदार उठा, खूब तालियां पिटीं, चिल्लाए। कहा था न हमने? कर तो दिया। अब और क्या चाहिए सर?’
चाहिए वापस राजेश की ऊष्मा। चाहिए राजेश की शाखा। चाहिए राजेश का स्वयंसेवकत्व। चाहिए राजेश की उपस्थिति। साहस है किसी में कि राजेश की मां, ललिता की सूनी आंखों में उतर कर वहां ठहरे हुए सवालों का जवाब दे सकें? तो सुनो।
राजेश को क्यों जाना पड़ा? वह एक स्वतंत्र गणतंत्र का सभ्य नागरिक था। उसे क्यों मरना पड़ा? वह भारत भक्ति में लीन, एक साधारण मजदूर का मजदूर बेटा था। उस पर हमला क्यों हुआ? वह निष्ठावान हिन्दू था। हिन्दुस्थान का देशभक्त नागरिक था। हिन्दू संस्कृति, सभ्यता, जीवनपद्धति और राष्ट्र की रक्षा के लिए संघ का स्वयंसेवक था। क्या यही उसका अपराध था? जब पशु हत्या होती हैं तो आप ट्वीट करते हैं।
जब पशु हत्यारों पर कोई गुस्सा उतारता है तो आप ट्वीट से बढ़कर जन्तर-मन्तर पर धरना देते हैं। राजेश तो मनुष्य था। सर, आप उसकी इतनी बर्बर हत्या पर खामोशी ओढ़े रहते हैं। सर, आपके सीने में रखा दिल वाकई दिलचस्प है। कभी बेहद संवेदनशील होकर याकूब मेमन के लिए धड़कता है और आधी रात के बाद सर्वोच्च न्यायालय को तलब कर लेता है। कभी अखलाक और पहलू खान का मातम मनाता है।
राजेश का मरना सिर्फ एक स्वयंसेवक, एक भद्र नागरिक, एक देशभक्त युवक का मरना नहीं है। यह लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था के उस पाखण्ड का बेनकाब होना है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक देशभक्तों के मन में यह संशय पैदा करता है कि क्या उनकी देशभक्ति उनके असामायिक अन्त की एकमात्र वजह बन जाएगी?
यह सवाल है डॉ. हेडगेवार के बाद हुई उन तमाम पीढ़ियों का उन सबसे, जो देश को 2017 तक लेकर आई हैं कि क्या हजार साल से ज्यादा अपने अस्तित्व, धर्म, संस्कृति और जीवन पद्धति की रक्षा के लिए आततायियों से निरन्तर संघर्ष करते आ रहे हिन्दूनिष्ठ नागरिकों को आज भी कम्युनिस्ट जिहाद का शिकार होना पड़ेगा और आप सिर्फ देखा करेंगे? और चेतनाशील, यानी कि चैतन्य, पठित, यानी सुपठित समाज के सामने प्रदर्शन विरोध, अनुनय-विनय एवं प्रचार साहित्य वितरण के तमाम उपकरण अपनाते हुए उनसे कहना पड़ेगा कि सर प्लीज, इतने भयंकर घटनाक्रम पर प्लीज सर, कुछ बोलिए न सर?
कुछ लिखिए न सर? कुछ कीजिए न सर? सोचिए न सर अगर वो आपका बेटा होता सर….. सोचिए न सर। बहुत बिजी हैं सर?’
(लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद हैं)











