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गाड़ी की छत पर लगे एक पैनल की उम्र 25 वर्ष है।
एक डिब्बे को बनाने में 9,00,000 रुपए का खर्च आया है।
इस गाड़ी से हर वर्ष लगभग 21,000 लीटर डीजल की बचत होगी, जिसकी कीमत करीब 12 लाख रुपए होती है।
सौर ऊर्जा के इस्तेमाल में 25 वर्ष में प्रति रेलगाड़ी 1,350 टन कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन कम होगा।
हम ऊर्जा के गैर-परंपरागत तरीकों को बढ़ावा दे रहे हैं। भारतीय रेल स्वच्छ एवं अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कृतसंकल्प है।
—सुरेश प्रभु, रेल मंत्री
कोणार्क का सूर्य मंदिर शायद इसलिए बनाया गया था कि लोग यह अनुभव करते रहें कि पूरा जीवन चक्र सूर्य की ऊर्जा से चलता है। सूर्य अक्षय ऊर्जा का भंडार है। इसके इस्तेमाल से पर्यावरण की रक्षा तो होती ही है, साथ ही खर्च भी कम पड़ता है। इसलिए अब सौर ऊर्जा का प्रयोग रेलगाड़ी में भी होने लगा है।
अब भारत में धूप यानी सौर ऊर्जा से रेलगाड़ी को भी बिजली मिलने लगी है। 14 जुलाई को शुरू हुई 10 डिब्बे वाली यह गाड़ी इन दिनों शकूरबस्ती (दिल्ली) से (फारूक नगर) गुरुग्राम तक दिन में एक बार चलती है। इसके उद्घाटन पर रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा कि भारतीय रेलवे को पर्यावरण मित्र बनाने के लिए यह एक लंबी छलांग है। इसके छह डिब्बों की छत पर 16 सोलर पैनल लगे हैं। एक पैनल की आयु लगभग 25 वर्ष है। इनसे बिजली बनती है और उसी से डिब्बे की बैटरी चार्ज होती रहती है। बैटरी के जरिए ही डिब्बे में लगे पंखे और अन्य संयंत्र चलते हैं। सोलर पैनलों को मजबूती देने के लिए इसमें बेहतरीन इन्वर्टर लगे हैं, जो ज्यादा बिजली पैदा करने में सहायक हैं। गाड़ी में एक बैटरी बैंक है, जो रात के समय पूरी गाड़ी में बिजली की आपूर्ति करता है। बैटरी बैंक के अच्छी तरह चार्ज होने पर दो दिन तक गाड़ी को आसानी से चलाया जा सकता है। यानी कभी मौसम खराब होने पर दो दिन तक सूरज नहीं निकलेगा तो भी यह गाड़ी चलाई जा सकती है। 1,600 अश्व शक्ति (एच.पी.) वाली यह गाड़ी चेन्नई की कोच फैफ्ट्री में तैयार हुई है, जबकि इंडियन रेलवेज आॅर्गेनाइजेशन आॅफ अल्टरनेटिव फ्यूल ने इसके लिए सोलर पैनल तैयार किए हैं।
उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी नीरज शर्मा ने बताया कि गाड़ी के एक डिब्बे को बनाने में 9,00000 रुपए का खर्च आया है। इस रेलगाड़ी से रेलवे को हर वर्ष लगभग 21,000 लीटर डीजल की बचत होगी, जिसकी कीमत करीब 12 लाख रुपए होती है।
आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित इस गाड़ी के हर डिब्बे में बायो शौचालय, पानी का पुन: उपयोग और कूड़ा का निस्तारण करने वाले संयंत्र लगे हैं। जरूरत पड़ने पर जैव र्इंधन और पवन ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा सकता है। गाड़ी के एक डिब्बे में 89 लोग बैठ सकते हैं। रेलवे बोर्ड के सदस्य (रॉलिंग स्टॉक) रविंद्र गुप्ता के अनुसार पहले शहरी और इसके बाद लंबी दूरी
की रेलगाड़ियों में सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाएगा।
अगले कुछ दिनों में 50 अन्य डिब्बों में भी सोलर पैनल लगाए जाएंगे। पूरी परियोजना लागू हो जाने पर रेलवे को हर वर्ष लगभग 700 करोड़ रुपए की बचत होगी। गुप्ता के अनुसार सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से 25 वर्ष में प्रति रेलगाड़ी 1,350 टन कार्बन डाईआक्साइड का उत्सर्जन कम होगा। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष के रेल बजट में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने घोषणा की थी कि रेलवे सौर ऊर्जा से आगामी पांच वर्ष में 1,000 मेगावाट बिजली पैदा करेगी। यह रेलगाड़ी इसी योजना का हिस्सा है।
इस धरती पर सूरज ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है। सूरज हर क्षण उपलब्ध रहता है, इसलिए इसे अक्षय ऊर्जा का असीमित भंडार कहा जाता है। भारत में 270 दिन सूर्य की रोशनी मिलती है। बहरहाल, पंखे और लाइट ही सही उम्मीद की जानी चाहिए कि कभी न कभी रेल रथ भी सौर शक्ति से खिंचेगा, कोणार्क के सूर्य रथ की तरह। अरुण कुमार सिंह











