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कभी किराए की एक छोटी-सी दुकान चलाने वाले संजय सरावगी आज साड़ी बनाने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी ‘लक्ष्मीपति साड़ी’ के मालिक हैं। उनका सालाना कारोबार 500 करोड़ रुपए है। 1983 में उनके पिता कपड़े का व्यापार करने के लिए ग्वालियर से सूरत आए। यहां किराए की एक दुकान लेकर काम शुरू किया, लेकिन कुछ समय बाद ही अस्वस्थ हो गए। उस समय संजय की उम्र साढेÞ 13 साल थी। घर का बड़ा बेटा होने के नाते कारोबार की पूरी जिम्मेदारी उन पर आ गई। उन्होंने बहुत ही सूझ-बूझ के साथ काम लिया। दुकानदारी के साथ ही अपने पिता का इलाज भी करवाया, लेकिन वे बहुत दिनों तक ठीक नहीं हो पाए। कई वर्ष बिस्तर पर पड़े रहे। इन स्थितियों से संजय की आर्थिक हालत दयनीय हो गई। खर्च बढ़ रहा था और आमदनी घट रही थी। इससे उबरने के लिए उन्होंने कुछ नया करने का संकल्प लिया। वह संकल्प था कपड़े बनाने की मिल शुरू करना। बहुत हाथ-पैर मारने के बाद वे कुल 17 लाख रुपए इकट्ठे कर पाए। इसी पंूजी के सहारे उन्होंने सूरत के पंडेसरा में कपड़ा मिल शुरू की, लेकिन पिता के इलाज में ज्यादा पैसा खर्च होने पर कभी-कभी काम में कुछ बाधा आई। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और मिल बंद नहीं की।
आज उनकी मिल में 4,500 लोग काम करते हैं और प्रतिदिन 2,00000 मीटर कपड़े का उत्पादन होता है। उनका माल 20 देशों में जाता है, पर सबसे अधिक राजस्व घरेलू बाजार से ही मिलता है।
संजय का मानना है कि देश में उद्योगों का जाल बिछे, लेकिन पर्यावरण को बचाते हुए। इस विचार को साकार करने के लिए वे दुनियाभर से पर्यावरण हितैषी मशीनें मंगाते हैं और उनका इस्तेमाल करते हैं। उनके पास पॉलिस्टर प्रोसेसिंग की भारत की सबसे बड़ी और अत्याधुनिक एयर फ्लो डाइंग मशीन है। इस मशीन से एक किलो पॉलिस्टर को रंगने में 150-200 ग्राम पानी खर्च होता है, जबकि सामान्य मशीन के जरिए इतने ही पॉलिस्टर को रंगने में 8-10 लीटर पानी खर्च होता है। उनके पास रंग बनाने वाला जापानी रोबोट है। इसके कारण 65 प्रतिशत प्रदूषण रुक गया है।
केवल 12वीं तक पढ़ाई करने वाले संजय का कारोबार आज दुनियाभर में फैल चुका है। इसके बावजूद वे आज भी इतने सरल हैं कि अपनी सफलता का श्रेय अपने कामगारों को देते हैं। शायद इसी सरलता में उनकी सफलता के बीज अंकुरित हो रहे हैं।











