सूरत एवं अमदाबाद से लौटकर अरुण कुमार सिंह
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सूरत एवं अमदाबाद से लौटकर अरुण कुमार सिंह

Written byArchiveArchive
Jul 14, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 14 Jul 2017 15:47:46


 

 

 

 

 

 

अरब सागर के तट पर बसे सूरत को आज दुनियाभर में हीरा और वस्त्र उद्योग के लिए जाना जाता है। इसे गुजरात की आर्थिक राजधानी भी कहा जाता है। इसका पुराना नाम है सूर्यपुर। अमदाबाद के बाद यह गुजरात का दूसरा और देश का आठवां सबसे बड़ा शहर है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अनुसार सूरत देश का तीसरा सबसे स्वच्छ शहर है। यहां की कारोबारी तरक्की को देखते हुए यह भी कहा जाता है कि सूरत दुनिया में ऐसा चौथा शहर है, जो सबसे तेज गति से विकास कर रहा है। गुजरात की राजधानी गांधीनगर से सूरत की दूरी 284 किलोमीटर है। 2011 की जनगणना के अनुसार सूरत की जनसंख्या लगभग 45 लाख है। 22 किलोमीटर में फैले इस शहर के लगभग 65 प्रतिशत लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं।  

सूरत
हीरा उद्योग
2,85,000
करोड़ रु.  का सालाना कारोबार

वस्त्र उद्योग
65,700
करोड़ रु. का सालाना कारोबार
प्रतिवर्ष एक लाख करोड़ रुपए के हीरों का आयात और 1,58,000 करोड़ रुपए का निर्यात होता है। इसके अलावा हीरा जड़ित गहने भी निर्यात होते हैं। इसलिए हीरा उद्योग का सालाना कारोबार 2,85,000 करोड़ रुपए का है। इस उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से एक करोड़ लोगों को रोजगार मिल रहा है।
-दिनेशभाई नावड़िया
अध्यक्ष, सूरत डायमंड एसोसिएशन  

सूरत में प्रतिदिन चार करोड़ मीटर कपड़ा तैयार होता है और दो करोड़ मीटर कपड़ा भिवंडी, मालेगांव और करंजी से आता है। इस तरह सूरत में प्रतिदिन छह करोड़ मीटर कपड़े से अनेक तरह के वस्त्र बनाए जाते हैं। ये वस्त्र भारत सहित विश्व के अनेक देशों के बाजारों में जाते हैं। सूरत के लगभग 70 हजार कपड़ा व्यवसायी प्रतिदिन 180 करोड़ रुपए का कारोबार करते हैं।  इनके अलावा लगभग 14 लाख लोगों को कपड़ा व्यवसाय से रोजगार मिलता है।
—सुरेश तोषनीवाल, उपाध्यक्ष, फेडरेशन आॅफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन

अनगढ़ हीरों को तराश कर सूरत को नई पहचान दिलाने में अनपढ़ लोगों की बड़ी भूमिका रही। 1970 के दशक में सौराष्टÑ से पाटीदार समाज के लोग, जो एक तरह से अनपढ़ थे, रोजी-रोटी के लिए सूरत आए और हीरों के कारखानों में मजदूरी करने लगे। काम सीखने के बाद इन लोगों ने खुद ही कारोबार शुरू किया और आज वही लोग बड़े हीरा कारोबारी हैं।
— धीरूभाई सवानी, पूर्व उप महापौर, सूरत

सूरत की चमक बढ़ाने में सबसे बड़ा योगदान हीरा उद्योग का है। यहां दुनिया के 90 प्रतिशत हीरे को तराशा जाता है। एक अनुमान के अनुसार सूरत में हीरों के लगभग 5,000 छोटे-बड़े कारखाने हैं। इन कारखानों के लिए दुबई और बेल्जियम के एंट्रोक से अनगढ़ हीरे मंगाए जाते हैं। दुबई और बेल्जियम के बाजारों में रूस, कनाडा, अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया से अनगढ़ हीरे आते हैं।
इन अनगढ़ हीरों को सूरत के कारखानों में लाखों मजदूर तराशते हैं और ऐसी शक्ल देते हैं कि विदेशी बाजार में उनकी मांग बेतहाशा बढ़ जाती है। तराशे गए हीरे मुंबई जाते हैं और वहीं से विदेशों को निर्यात होते हैं। भारत में हीरे की मांग बहुत ही कम है, इसलिए सूरत का हीरा उद्योग पूरी तरह विदेशी बाजार पर टिका है। सूरत डायमंड एसोसिएशन के अध्यक्ष दिनेशभाई नावड़िया ने बताया, ‘‘प्रतिवर्ष हीरे का एक लाख करोड़ रुपए आयात और 1,58,000 करोड़ रुपए का निर्यात होता है। इसके अलावा हीरा जड़ित गहने भी निर्यात होते हैं। इसलिए हीरा उद्योग का सालाना कारोबार 2,85,000 करोड़ रुपए का है। इस उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से एक करोड़ लोगों को रोजगार मिल रहा है।’’
आज बेशक सूरत के हीरे दुनिया को चमका रहे हैं, पर यहां के हीरा उद्योग को चमकाने के लिए हजारों लोगों ने अपना खून-पसीना बहाया है। ऐसे सूरत में हीरे का कारोबार बहुत पहले से होता रहा है, लेकिन इसमें गति 1980 के बाद आई। सूरत के पूर्व उप महापौर धीरूभाई सवानी, जो पहले एक हीरा कारखाने में मजदूरी कर चुके हैं, कहते हैं, ‘‘अनगढ़ हीरों को तराश कर सूरत को नई पहचान दिलाने में अनपढ़ लोगों की बड़ी भूमिका रही। 1970 के दशक में सौराष्ट्र से पाटीदार समाज के लोग, जो एक तरह से अनपढ़ थे, रोजी-रोटी के लिए सूरत आए और हीरों के कारखानों में मजदूरी करने लगे। काम सीखने के बाद इन लोगों ने खुद ही कारोबार करना शुरू किया और आज वही लोग बड़े हीरा कारोबारी हैं।’’
सवानी के मुताबिक जब लोगों ने हीरों से पैसा कमा लिया तो उन्होंने कपड़े का भी कारोबार शुरू कर दिया। इससे सूरत के वस्त्र उद्योग में फिर से तेजी आई। उसी तेजी की वजह से सूरत आज कपड़े के क्षेत्र में भी भारत में अग्रणी स्थान रखता है। फेडरेशन आॅफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुरेश तोषनीवाल कहते हैं, ‘‘सूरत में जरी और  कपड़े का काम बहुत पुराना है, लेकिन इसमें तेजी 1980 के बाद आई। 1980 के आसपास जापान से नायलॉन का कपड़ा भारत आया था। इसके बाद यहां भी, खासकर सूरत में यह कपड़ा बनना शुरू हुआ। इस क्षेत्र में नई तकनीक अपनाई गई। इससे उत्पादन बढ़ा और उद्योग को भी बल मिला।’’ तोषनीवाल ने बताया कि इस समय सूरत में प्रतिदिन चार करोड़ मीटर कपड़ा तैयार होता है और दो करोड़ मीटर कपड़ा भिवंडी, मालेगांव और करंजी से आता है। इस तरह सूरत में प्रतिदिन छह करोड़ मीटर कपड़ों से अनेक तरह के वस्त्र बनाए जाते हैं। ये वस्त्र भारत सहित विश्व के अनेक देशों के बाजारों में जाते हैं। कच्चा कपड़ा तैयार करने के लिए सूरत में 430 इकाइयां और करीब तीन लाख एंब्रायडरी मशीन हैं। सूरत के लगभग 70,000 कपड़ा व्यवसायी प्रतिदिन 180 करोड़ रुपए का कारोबार करते हैं। कारोबारियों के अलावा लगभग 14 लाख लोगों को कपड़ा व्यवसाय से रोजगार मिलता है।
हीरा और वस्त्र उद्योग ने सूरत में नव धनाढ्य वर्ग को जन्म दिया है। इस वर्ग के एक सदस्य हैं भवन निर्माता कंपनी ‘अवध’ के मालिक लवजी भाई (बादशाह)। वे 1984 में भावनगर जिले से मजदूरी करने के लिए सूरत आए थे। कई वर्ष तक संघर्ष करने के बाद उन्होंने कुछ पैसे उधार लेकर फ्लैट बनाने का काम शुरू किया। केवल दो दशक में उन्होंने वह कामयाबी हासिल की है, जिस पर विश्वास नहीं होता। आज उनके यहां लगभग 3,000 लोग काम करते हैं और उनकी कंपनी का सालाना करोबार 1,000 करोड़ रुपए है।
सूरत की गगनचुंबी इमारतें बताती हैं कि यह शहर देश के सबसे महंगे शहरों में शामिल हो चुका है। साधारण आदमी के लिए यहां जमीन लेकर घर बनाना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए आम लोग फ्लैटों की ओर भाग रहे हैं। रोजगार के लिए भारतभर से आने वाले लोग इस भागदौड़ को और बढ़ा रहे हैं। लेकिन सूरत के लोगों ने अपने आपको इस तरह ढाल लिया है कि वे हर किसी को सहज में ही अपना लेते हैं। यही कारण है कि सूरत में आज लघु भारत की झलक मिलती है। इस लघु भारत का हर नागरिक अपनी मेहनत से सूरत को संवार रहा है, उसकी चमक बढ़ा
रहा है।

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