| दिंनाक: 26 Jun 2017 10:11:56 |
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– सतीश पेडणेकर
आज से 33 साल बाद यानी 2050 में विभिन्न पांथिक समुदायों के नजरिये से दुनिया का नक्शा कैसा होगा? अमेरिका की 'पियू' नामक सर्वेक्षण संस्था की दुनिया के प्रमुख मत-पंथों की आबादी के रुझान के बारे में कुछ दिनों पहले जारी रपट ने कई देशों की नींद उड़ा दी है। यदि ये रुझान सही साबित हुए तो दुनिया के कई देशों का भूगोल बदल जाएगा।
आज विश्व का प्रत्येक देश इस बदलाव के अपने भूभाग पर होने वालेे असर के बारे में सोच रहा है। ऐसा स्वाभाविक भी है क्योंकि आज के लोकतांत्रिक युग में जनसंख्या मतों की ताकत नापने का प्रमुख पैमाना बन गई है। जनसंख्या के अनुपात में पंथों की राजनीतिक शक्ति बढ़ती या घटती है।
'पियू' की इस रपट के मुताबिक 2050 तक भारत इंडोनेशिया को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश हो जाएगा। साथ ही नास्तिकों को पीछे छोड़ते हुए दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी आबादी हिंदू धर्म को मानने वालों की हो जाएगी। लेकिन सबसे चौंकाने वाले आंकड़े इस सदी के अंत के बारे में हैं। रपट के मुताबिक तब दुनिया में मुसलमानों की आबादी ईसाई आबादी को पीछे छोड़ सबसे ज्यादा हो जाएगी। अभी दुनिया में सर्वाधिक आबादी ईसाइयों की है, उसके बाद मुसलमान और फिर सबसे ज्यादा तादाद नास्तिकों की है।
पियू की रपट में 2010 को आधार मानकर 2050 तक प्रमुख 8 पांथिक समुदायों की जनसंख्या का आकलन और विश्लेषण किया गया है। विश्व तथा भारत के संदर्भ में इसके निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं। आने वाले 33 साल में विश्व की जनसंख्या में 35 प्रतिशत की वृद्धि होगी, जिसमें मुसलमानों की जनसंख्या सर्वाधिक यानी 73 प्रतिशत, ईसाई 35 प्रतिशत तथा हिन्दुओं की जनसंख्या 34 प्रतिशत बढ़ेगी। इस हिसाब से ईसाई पहले, मुसलमान दूसरे तथा हिन्दू तीसरे नंबर पर होंगे। भारत के हिन्दुओं के लिए चिंताजनक खबर यह है कि 2050 में भारत की कुल आबादी में हिन्दुओं के प्रतिशत में 2़ 8 फीसदी तक कमी आने की संभावना है। 2050 में देश की कुल आबादी 1.7 अरब होगी। इसमें 76.7 फीसदी हिन्दू होंगे, जबकि 2010 में यह आंकड़ा 79़ 5 फीसदी था।
2010 में देश में हिन्दुओं की कुल आबादी 97़ 37 करोड़ थी, जबकि 2050 में संभावित तौर पर यह 129़ 79 करोड़ होगी। इस दौरान कुल हिंदू आबादी में 32.42 करोड़ की वृद्धि होगी। 2050 में कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 2010 के 14.4 फीसदी से बढ़कर 18.4 फीसदी हो जाएगी। इस दौरान उनकी कुल आबादी 17.62 करोड़ से बढ़कर संभावित तौर पर 31.06 करोड़ हो जाएगी। इस प्रकार इन 40 वषार्ें के दौरान, उनकी आबादी में 13.44 करोड़ की वृद्धि होगी। यह रपट बौद्ध धर्म के लिए बुरी खबर लाती है कि उसकी आबादी या तो कम होगी या उतनी ही रहेगी।
रपट कहती है कि 2050 में भारत में विश्व के सबसे ज्यादा हिन्दू और सबसे ज्यादा मुसलमान होंगे। इसके बाद नंबर पाकिस्तान तथा इंडोनेशिया का है। इस संभावित मॉडल को 2050 से आगे ले जाने पर नतीजा निकलता है कि 2070 में दुनिया में मुसलमानों और ईसाइयों की जनसंख्या लगभग बराबर होगी यानी दोनों विश्व आबादी में 32-32 प्रतिशत होंगे। इसके बाद दोनों पंथों की आबादी बढ़ेगी। मगर 2100 में ईसाइयों के मुकाबले मुसलमानों की आबादी एक प्रतिशत ज्यादा हो जाएगी। मुस्लिम 35 प्रतिशत होंगे तो ईसाई 34 प्रतिशत रह जाएंगे। यह वृद्धि मुख्यत: अफ्रीका के कारण होगी जो उच्च प्रजनन दर वाला महाद्वीप है। इसके कारण दोनों मत विश्व जनसंख्या में अपना प्रतिशत बढ़ाएंगे।
पंथों की आबादी में आने वाले इस बदलाव से कई देशों का पांथिक चरित्र बदलने की संभावना जताई जा रही है। 2050 में ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस, मेसेडोनिया, बोस्निया-हर्जगोविना, नीदरलैंड्स में ईसाई बहुसंख्या में नहीं रह जाएंगे। अमेरिका में भी ईसाइयों की संख्या में कमी आएगी। 2010 में जहां वे आबादी के तीन चौथाई से ज्यादा थे, वहीं 2050 में दो तिहाई रह जाएंगे। वहां दूसरी सबसे ज्यादा आबादी यहूदियों की नहीं, मुसलमानों की होगी।
ईसाइयों की संख्या भले ही अमेरिका और ब्रिटेन में घट रही हो मगर रूस, चीन और दक्षिण कोरिया में ईसाई मत तेजी से अपनी जड़ें जमा रहा है। 1900 में दक्षिण कोरिया में एक प्रतिशत लोग ही ईसाई थे। लेकिन ईसाइयत वहां तेजी से बढ़ी है और आज 30 प्रतिशत दक्षिण कोरियाई ईसाई हैं। रूस में कम्युनिज्म की समाप्ति के बाद ईसाइयत को अपनाने वालों की तादाद बढ़ी है। 1991 से 2008 के बीच रूसी वयस्कों में ईसाइयों की संख्या 31 प्रतिशत से बढ़कर 72 प्रतिशत हो गई थी। चीन में पांथिक मामलों के विशेषज्ञ परजू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री फेंगांग यांग के मुताबिक 1950 से 2010 के बीच ईसाइयत 7 प्रतिशत की दर से बढ़ी, लेकिन उनका दावा है कि जनसंख्या वृद्धि की इस दर के अनुसार 2050 में चीन में 67 प्रतिशत लोग ईसाई मत को मानने वाले होंगे।
इस समय इस्लाम को दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ता वाला मजहब बताया गया है। इसकी वजह यह है कि वैश्विक स्तर पर मुसलमानों की प्रजनन दर सबसे ज्यादा यानी 3़1 बच्चे प्रति महिला है। 2.7 बच्चे प्रति महिला की प्रजनन दर से ईसाई दूसरे नंबर हैं और 2.4 की प्रजनन दर के साथ हिन्दू तीसरे नंबर पर। दूसरा निर्धारक तत्व है हर पंथ का वर्तमान आयु विभाजन। यानी उसके अनुयायी कितने युवा हैं और उनके सामने प्रजनन के कितने वर्ष बाकी हैं। 2050 में 27 प्रतिशत आबादी 15 वर्ष से कम उम्र वालों की होगी। इनमें मुस्लिम 34 प्रतिशत, हिन्दू 30 प्रतिशत और ईसाई 27 प्रतिशत होंगे। साफ है कि यह युवा आबादी ही मुस्लिम आबादी के तेजी से बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है।
'पियू' ने दस वर्ष पूर्व निष्कर्ष निकाला था कि अमेरिका एवं यूरोप में हिन्दुओं का प्रभाव बढ़ेगा। तब विश्व के एक मशहूर साप्ताहिक 'न्यूजवीक' ने तो एक विशेषांक भी प्रकाशित किया था। उसमें संपादक लिशा मिलर ने उस समय यह संकेत दिया था कि पूरा अमेरिका धीरे-धीरे भारतीय जीवनपद्धति को स्वीकारने की दिशा में बढ़ रहा है। लेेकिन यह कहना थोड़ा मुश्किल है कि यह निष्कर्ष हिन्दुओं को खुश करने के लिए था या अतिशयोक्ति के सहारे ईसाइयों को सचेत करने वाला था। पीयू रिसर्च सेंटर की रपट 'रिलीजियस लैंडस्केप स्टडी' के मुताबिक अमेरिका की हिन्दू आबादी बढ़कर 22़ 3 लाख हो गई है और आबादी के लिहाज से हिन्दू धर्म मानने वाले लोग यहां चौथे पायदान पर पहुंच गए हैं। 2007 से लेकर अब तक इसमें 85.8 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। अमेरिकी जनसंख्या में हिन्दुओं की आबादी 2007 में 0.4 फीसदी से बढ़कर पिछले साल 0.7 फीसदी हो गई। यह अध्ययन कुल आबादी में हिंदुओं के प्रतिशत को तो दर्शाता है, लेकिन संख्या नहीं बताता।
पियू की नई रपट को देखें तो एक बात साफ होती है कि अगले 30-35 वषोर्ें में विश्व के हर देश में मुस्लिम जनसंख्या तेजी से बढ़ेगी। इंडोनेशिया में आज 20 करोड़ 50 लाख मुस्लिम हैं एवं भारत में 17 करोड़ 70 लाख। भारत में 35 वर्ष बाद मुसलमानों की आबादी का आंकड़ा 20 करोड़ 50 लाख से अधिक होगा।
2050 में विश्व में 31 प्रतिशत ईसाई होंगे और 30 प्रतिशत मुस्लिम होंगे, लेकिन बाद के 20 वषार्ें में दोनों में उसी अनुपात में वृद्घि होकर विश्व में 31 प्रतिशत मुस्लिम तथा 30 प्रतिशत ईसाई होने की संभावना व्यक्त की गई है। इस रिपोर्ट में यूरोप के मुसलमानों की संख्या को लेकर वृद्धि पर विस्तार से लिखा गया है। इसका मानना है कि 2010 में यूरोप में 5़ 9 प्रतिशत मुस्लिम थे, जो 2050 में 10 प्रतिशत होंगे। पर इससे भी अधिक गंभीर चेतावनी है और वह यह कि यूरोप में अन्य सभी मतावलंबियों तथा सेकुलर लोगों की तुलना में ईसाई 45 प्रतिशत यानी अल्पसंख्या में होंगे। ब्रिटेन में भी यही स्थिति होगी। यूरोप में मुस्लिमों की जो वृद्धि होगी, वह मुख्यत: फ्रांस, जर्मनी और बेल्जियम में होगी। इसमें दिए गए आंकड़े जनसंख्या की वृद्धि प्रजनन संख्या से जुड़े अनुमान पर आधारित है। इसमें फिलहाल विश्वभर में चल रहे कन्वर्जन अभियानों से बढ़ने वाली संभावित संख्या का अनुमान नहीं है। जबकि भारत, अफ्रीका का सहारा रेगिस्तान इलाका और लातिनी अमरीका में कन्वर्जन जोरों पर है। कई जगह तो ईसाइयत और इस्लाम के बीच कन्वर्जन को लेकर होड़ चल रही है। अब तो चीन में भी कन्वर्जन के चलते ईसाई मिशनरियों और चीन की कम्युनिस्ट सरकार के बीच 'आमने-सामने' की लड़ाई चल रही है। रपट का यह मानना है कि कन्वर्जन भी किसी पांथिक समुदाय की संख्या वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। लेकिन यह प्रक्रिया काफी जटिल है।
आव्रजन भी दुनिया के विभिन्न देशों के पांथिक चरित्र को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आबादी बढ़ने के अन्य कारणों के साथ आव्रजन को भी जोडे़ं तो यूरोप में मुस्लिम आबादी 2010 के 5.9 प्रतिशत से बढ़कर 2050 में 10.2 प्रतिशत हो जाएगी। वैसे कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह रपट पश्चिम अथवा ईसाई समर्थक नजरिये से लिखी गई है। वह विश्व में बढ़ रहे इस्लामी वर्चस्व की बात तो उठाती है मगर सारी दुनिया में चल रहे ईसाई कन्वर्जन पर चुप्पी साध लेती है।
रपट में कन्वर्जन को लेकर एक महत्वपूर्ण मुद्दे को नजरअंदाज किया गया है, जो मुस्लिम आबादी बढ़ने का महत्वपूर्ण कारण है। ज्यादातर इस्लामी देशों में लोग इस्लाम को छोड़कर किसी अन्य मत में कन्वर्ट नहीं हो सकते, लेकिन गैर इस्लामी देशों में मुसलमान गैर मुसलमानों का इस्लाम में कन्वर्जन कराने के लिए स्वतंत्र हैं। इस तरह मुसलमान गैर मुस्लिम देशों में कन्वर्जन के बूते अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देशों को इस मामले में कठोर कदम उठाने चाहिए। वे सवाल करते हैं कि यदि गैर मुसलमानों को मुस्लिम देशों में पांथिक स्वतंत्रता नहीं मिलती दूसरे देशों में उनके मुसलमानों के साथ वैसा ही नियम क्यों नहीं लागू होना चाहिए? कई मुस्लिम देश छल-कपट से कन्वर्जन कराने पर इतने आमादा हैं कि अपराधियों के कन्वर्जन करने पर उन्हें सजा में छूट तक दे देते हैं। मुम्बइया फिल्मों की अभिनेत्री ममता कुलकर्णी का नाम एक बार फिर सुर्खियों में तब आया जब ममता ने अपना मत बदलकर इस्लाम कबूल कर लिया। उन्होंने अपना कन्वर्जन मादक पदार्थों के कथित तस्कर विकी से शादी करने के लिए किया था। हुआ यूं था कि मुम्बई से 5 साल से 'गायब' ममता दुबई में रहकर अपने मंगेतर विकी की रिहाई का इंतजार कर रही थीं, जो दुबई की ही जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा था। विकी की रिहाई के लिए ममता को आखिरकार शादी का रास्ता सूझा। इसके लिए ममता को इस्लाम कबूल करना पड़ा और इस्लामी रीति-रिवाजों से विकी से निकाह करना पड़ा। इस निकाह से 'खुश' होकर दुबई के शेख ने विकी की सजा माफ कर दी थी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)