क्रांति-गाथा-36 - क्रांति-युग के कुछ संस्मरण
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क्रांति-गाथा-36 – क्रांति-युग के कुछ संस्मरण

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Jun 19, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 19 Jun 2017 12:51:03

पाञ्चजन्य ने 1968 में क्रांतिकारियों पर केंद्रित विशेषांकों की शंृखला प्रकाशित की थी। दिवंगत श्री वचनेश त्रिपाठी के संपादन में निकले इन अंकों में देशभर के क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाएं थीं। पाञ्चजन्य पाठकों के लिए इन क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाओं को नियमित रूप से प्रकाशित कर रहा है। प्रस्तुत है 22 जनवरी ,1968 के अंक में प्रकाशित चन्द्रशेखर आजाद का आलेख  :-

भाई चन्द्रशेखर आजाद को पकड़ने के लिए अंग्रेज सरकार ने कुछ कसर नहीं रखी थी। पुलिस भी उनके पीछे हाथ धोकर पड़ी थी। कानपुर, बनारस, झांसी और दिल्ली में उन्हें पकड़ने के लिए विशेष प्रबंध था। उन्हें पहचानने वाले इन स्थानों पर तैनात थे। फिर भी वे उनकी आंखों में धूल झोंक कर नि:शंक सफर किया करते थे। मैंने कभी उन्हें तुर्की टोपी पहने नहीं देखा।
जिस दिन वे जाने की बात कहते थे, उस दिन कभी सफर नहीं करते थे। अक्सर देखा गया कि जिस दिन उन्होंने अपने जाने की बात कही, उस दिन कानपुर, दिल्ली या टूंडले पर गाड़ी रोककर भली-भांति तलाशी ली गई। एक दफा दिल्ली से चले और वही दिन उन्होंने अपने जाने का बताया था। वीरभद्र के रहते फिर भला कमी किस बात की थी। दिल्ली से चले, एक साथी और साथ था। सुबह 7 बजे ट्रेन कानपुर स्टेशन पर आई। एकाएक गाड़ी रोक दी गई। सशस्त्र पुलिस ने गाड़ी दोनों तरफ से घेर ली। भाई को पहचानने वाले दो आदमी इंटर क्लास के गेट पर खड़े थे। मेनगेट पर ए.स. शंभूनाथ व टीकाराम हाथों में पिस्तौल लिए खड़े थे। उस दिन भाई कोट व निकर पहने हुए थे। सर पर शायद उस दिन हैट था। अच्छे खासे पुलिस इंस्पेक्टर मालूम होते थे। असबाब कुली को देकर रवाना कर दिया। आगे आगे आजाद और पीछे दूसरा साथी। दोनों का एक हाथ टिकट और दूसरा हाथ जेब में पिस्तौल संभाले हुए था। दोनों के दिल में पूरा ख्याल था कि उस दिन स्टेशन पर होली खेलनी ही होगी। भाई बेधड़क मेन गेट पर चले गये। बाबू को टिकट दिया और बाहर हो गये। भाई की आंख टीकाराम और शंभूनाथ पर थी। पता नहीं टीकाराम ने पहचाना या नहीं। भाई ने देखा, उनकी आंखें नीची थीं। श्री आजाद कुशलपूर्वक घर पहुंचे। जरा भी घबरा जाने से गोलियों की दनादन अनिवार्य थी।
साइकिलें किस काम आएंगी
ऐसे ही एक दफा भाई और हम टहलने निकले। कानपुर में माल रोड पर जनरल पोस्ट ऑफिस के पास एक सज्जन लंबी अचकन और पैंट डाटे हुए बड़ी तेजी से मेरे पास से गुजर गये। पहले मुझको फिर आजाद को घूर कर देखते आते थे। मैंने कहा— ''भाई विश्वेश्वर सिंह, मालूम होता है हमको शायद उसने पहचान लिया।'' भाई ने कहा— ''अच्छा तुम तैयार रहो, अबकी आने पर देखा जाएगा।'' बात समाप्त भी नहीं हुई थी कि वे सज्जन फिर सामने आये और हम लोगों के सामने खड़े होकर घूरने लगे। भाई ने जेब में हाथ डाला, कट की आवाज हुई। भाई की मुद्रा भयानक हो गई। सौम्यता का कहीं पता भी नहीं था। कट के होते ही सज्जन एबाउट टर्न हो गये और ठहर शब्द के सुनते ही मानों उन्होंने डबल मार्च की आज्ञा सुनी हो। संभवत: ठा. विश्वेश्वर सिंह अपनी उम्र में पहली दफा ही इतनी तेजी से दौड़े होंगे और बड़े डाकखाने की चारदिवारी एक ही छलांग में फांद गये। हमलोग भी अपनी राह लगे। बाद में मैंने पूछा— ''भाई, अगर गोली चलने के बाद भागना पड़ता तो हम लोग क्या करते? साइकिल भी तो नहीं थी।'' वे कहने लगे—''पागल! सड़क पर ये साइकिलें जिन पर गोरे दौड़े जा रहे थे, ये किस काम आतीं? हर एक काम में होश कायम रखने की आवश्यकता होती है।''
जब गाडोदिया बैंक लूटी गई
एक और उदाहरण देकर हम आगे बढ़ेंगे। पार्टी के पास रुपया बिल्कुल नहीं बचा था। बहुत से काम करने थे। सरदार भगतसिंह को छुड़ाने की बात भी सोची जा रही थी। भाई ने कहा— ''जगदीश! रुपये का प्रबंध करो।'' मैंने कहा— ''जिसने रुपये देने को कहा था, वह इस समय आगा-पीछा कर रहा है। रुपये के प्रबंध में एक महीना लग जाएगा।'' उन्होंने कहा— ''अच्छा, मेरे साथ चलो।'' अगले दिन दिल्ली पहुंच गये। एक मामला तैयार था। अस्सी हजार रुपये मिलने की आशा थी। पहली तारीख को, उसी दिन शायद पं. मोतीलाल जी गिरफ्तार हो गये थे। हड़ताल हो गई। आशाओं पर पानी फिर गया। मैं रुपये के प्रबंध में बाहर चला गया। मेरठ जाने पर मालूम हुआ कि जिस सज्जन ने लगभग दो हजार रुपये इकट्ठे किए थे, वे हजम करना चाहते हैं। खाली हाथ शाम को वापस आया। अगले दिन दूसरा मामला तैयार था। दिन में हमलोग अपने-अपने  अस्त्र साफ कर रहे थे। भाई का एक पिस्तौल कार्ययोग्य था और सब खुले पड़े थे। हम और भाई योजना के बारे में विचार-विमर्श कर रहे थे। इतने में 'साथी' ने खबर दी कि शाम को 7 बजे चलना होगा। मैं किसी काम से शहर चला गया। 7 बजे मोटर में बैठकर कंपनी बाग पहुंचे। वहां पर कैलाशपति मुखबिर मिला। उसने सूचना दी कि आज काम नहीं हो सकेगा। सब लोग इधर-उधर की बात कर रहे थे कि एक साथी आया और उसने चलने को कहा। कौन-कौन साथ गए, यह तो यहां लिखना अभी शायद उचित न होगा। हां, कैलाशपति मुखबिर के कहने के अनुसार—भाई श्री विद्याभूषण, श्री धन्वंतरी, विश्वंभर तथा काशीराम (मैं) वहां पर गए थे। जो भी हो, जिन्होंने दिल्ली केस पढ़ा है, वे जानते हैं कि किस खूबी से यह कार्य किया गया था। भाई ने सब स्थिति पहले से सोच रखी थी। किसको क्या करना होगा? वे मकान के हर एक हिस्से से भली प्रकार परिचित थे। काम समाप्त कर सब लोग आसानी से वापस चले आए। भाई सबके अंगरक्षक थे। गली में चलते समय रुकावट पड़ने पर केवल दो राउंड फायर किए गए थे। सीआईडी के सुपरिन्टेंडेंट मि. पॉल उस समय मोटर के पास शराबी गोरे का अभिनय कर रहे थे, संभवत: देखने में उनको अधिक लुत्फ आ रहा था।
जब धृष्टता की गई
भाई का अपना कोई पृथक व्यक्तित्व नहीं रह गया था। पार्टी का हर व्यक्ति पार्टी था—हर एक सदस्य अपना पृथक व्यक्त्वि खोकर पार्टी में आता था। पार्टी का नियम पालन अनिवार्य था। उसकी अवहेलना करने की शक्ति किसी में न थी और जब कभी हम लोगों ने धृष्टता की, तो उस समय पार्टी भी विध्वंस हो गई।
नेहरू जी की भ्रांति
भाई का चरित्र और लगन दूसरों के लिए उत्साह का कारण थी। भाई के अथक परिश्रम से पार्टी का पुनस्संगठन किया, उसमें नवजीवन प्रदान किया। पं. जवाहरलाल जी ने भाई को 'फासिस्ट' कहा है— शायद इसलिए कि वे भाई को निकट से न जानते थे। कभी जानने का अवसर भी तो नहीं मिला। जहां तक मैं उनको समझ सका हंू फासिस्ट  डिक्टेटरशिप से वे घृणा करते थे। दिल्ली षड्यंत्र के चल जाने के बाद भाई की यह प्रबल इच्छा थी कि भारत में एक बहुत बड़े गुप्त प्रेस की स्थापना की जाए, जहां से जनता के लिए छोटी-मोटी पुस्तिकाएं और पर्चे छपवाकर वितरण किए जाएं।
क्रांतिकारियों की देन
देश के अंदर जो जागृति आज हम देखते हैं, उसमें क्रांतिकारियों का बहुत बड़ा हाथ है। 'क्रांति' के नाम से गुलाम भारतवासियों के अंदर उन्होंने उत्साह पैदा किया, उनके अंदर से भय को निकाला। आजादी—स्वतंत्रता का नाद गुंजाया, उस नाद से भारतवासी उठे, उनकी नींद टूटी। भारतीय क्रांतिकारियों का प्रभाव यदि आप जानना चाहते हैं तो उस समय के असहयोग आंदोलन पर एक दृष्टि डालिए। पुरानी भूली हुई बातों को याद कीजिए। महात्मा गांधी के जन आंदोलन ने देश में महान जागृति पैदा की, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। क्रांतिकारी गांधीजी के असहयोग आंदोलन की पूर्ति थे। जितने युवक और युवतियां उस समय आंदोलन में आई थीं, उनके हृदयों में क्रांति की आग जल रही थी।
हमारे नेताओं को मालूम होगा  कि बहुत से तो अपने को पुलिस से बचाने के हेतु ही असहयोग आंदोलन में शामिल होकर जेल यात्री हुए थे। उस समय के नेताओं के उद्गार, क्रांतिकारियों के प्रति जनता का प्रेम और जोश अपने वीर योद्धाओं के प्रति किससे छिपा हुआ है। मेरा तो अपना विश्वास है कि भारत क्रांतिकारियों के बलिदान का परिचय देता रहा है। जब गांवों में 'महात्मा गांधी की जय' के साथ और शायद इससे भी अधिक जोश और प्रेम के साथ 'क्रांति की जय', 'भगतसिंह की जय' के नारे सुनाई देते रहे हैं। गांधी जी की जय स्वार्थवश थी- किसानों को छूट मिलने की आशा थी और 'क्रांति की जय', 'भगतसिंह की जय' शुद्ध प्रेम का परिचय देती थी। उनका बलिदान पूर्ण स्वतंत्रता का आभास था। और यही नि:स्वार्थ प्रेम का पाठ क्रांतियुग ने भारत को पढ़ाया।
डबलरोटी खाते वक्त
जेल का सुधार तो क्रांतिकारियों के अथक परिश्रम से ही हुआ। इसके लिए अनेकों ने अपनी बलि दी। स्वर्गीय यतीन्द्रदास का नाम स्वर्णाक्षरों में इतिहास में लिखा जाएगा। राजनीतिक बंदियोंे के साथ मनुष्योचित व्यवहार करने के लिए सरकार को क्रांतिकारियों ने ही बाध्य किया। असहयोग आंदोलन में गए, हजारों-लाखों देशवासियों को बी और ए क्लास की डबल रोटी खाते समय, कभी भी सेंट्रल जेल में अकेले कोठरी में सड़ते हुए अपने अधिकारों के वास्ते भूख हड़ताल किए हुए क्रांतिकारियों की सुधि भी न आई होगी।
जेल में रहते हुए मनुष्य पर कैसा प्रभाव पड़ता है, वह भुक्तभोगी भली-भांति जानता है। जेल जीवन ने हमारे राष्ट्रीय आंदोलन पर विशेष प्रभाव डाला। बंगाल की जेल में ही 'इंडिपेंडेंट नेशनल कांग्रेस पार्टी' का जन्म हुआ था और युक्तप्रांत की पार्टीबाजी का जन्म भी जेलों की चारदीवारी के अंदर ही हुआ था। यह सब क्रांतिकारियों के बलिदान का ही परिणाम था। कांग्रेसी नेता असेंबली की कुर्सी पर बैठकर चाहे जितनी डींग हांकते रहे हों, पर वास्तव में जेल के अंदर राजनीतिक लड़ाई की अगुवाई इन्हीं क्रांतिकारियों ने की थी। बाहर भी जब आजादी के नाम से लोग अपने कान पर हाथ धरते थे, तब भी ये ही पागल मस्त क्रांतिकारी आजादी का नाद गुंजाते फिरते थे। वह समय ही ऐसा था। क्रांतिकारियों की उस समय आवश्यकता थी। जब कभी भी फिर हम एसेंबली की गलियों में बहक जाएंगे, तब फिर क्रांतिकारी हमें होश में लाएंगे। क्रांतिकारी देश और समय की आवश्यक कृति हैं। कोई इन्हें पैदा नहीं करता। समय ही इनको बनाता है। उसी ने इनको बनाया और उसी ने उनको मिटाया। फिर आने पर बहरों को सुनाने के लिए इनका जन्म होगा। 

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