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क्यों है यह ठहराव?/कार्यपालिका और न्यायपालिका

Written byArchiveArchive
Nov 28, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 28 Nov 2016 15:23:08

एक लैटिन कहावत है पहरेदारों की पहरेदारी कौन करेगा? मौजूदा दौर में जजों की नियुक्ति को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच ठहराव से इस कहावत के मायने हो जाते हैं। पिछले दो दशक से ज्यादा समय से भारत में जजों की नियुक्ति में 'कॅलेजियम सिस्टम' चला आ रहा है। जज ही साथी जजों की नियुक्तियां कर रहे थे। इस सभी को देखते हुए केंद्र सरकार ने जजों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग एक्ट बनाया था जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया

प्रमोद जोशी

पिछले साल अक्तूबर में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक नियुक्ति आयोग को खारिज कर दिया था। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति और तबादले के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक्ट बनाया था जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग न्यायपालिका के कामकाज में दखल देता है, इसलिए पुराने तरीके यानी कॅलेजियम सिस्टम से ही जजों की नियुक्ति होगी। उसके बाद से व्यवस्था में दोतरफा ठहराव आ गया है। और तभी से से यह सवाल भी उभरकर सामने आ रहा है कि इससे आगे कैसे बढ़ा जाए?

उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति के लिए कॅलेजियम ने 77 जजों के नाम भेजे थे, जिनमें से 43 नामों को सरकार ने लौटा दिया। इस पर न्यायालय ने कहा कि उसने 43 नामों को केंद्र द्वारा नामंजूर किए जाने को स्वीकार नहीं किया है और इन नामों को पुनर्विचार के लिए वापस भेजा है।

केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रह्मण्यम की सर्वोच्च न्यायालय के जज के रूप में नियुक्ति को अस्वीकार कर दिया गया। अदालत के सहयोगी के रूप में गोपाल सुब्रह्मण्यम ने सोहराबुद्दीन मामले की जांच में मदद की थी, जिसके कारण अमित शाह की गिरफ्तारी हुई थी। कॅलेजियम के सुझाव पर सरकार ने आपत्ति व्यक्त की। सो उसने दूसरी बार उनका नाम नहीं भेजा। यदि भेजा होता तो नियुक्ति हो जाती। उधर गोपाल सुब्रह्मण्यम ने भी अपनी सहमति वापस ले ली। पर इस प्रकरण से बदमगजी जरूर पैदा हो गई।

पुरानी समस्या

ताजा मामले में सरकार ने 43 नामों को रोककर इस बात को रेखांकित किया है कि कॅलेजियम व्यवस्था में भी सरकार के पास अधिकार हैं। उधर मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों से लगता है कि सरकार जानकर नियुक्तियों में देरी कर रही है। इस साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के लालकिले से भाषण के फौरन बाद मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी मीडिया में प्रसारित हुई कि प्रधानमंत्री ने जजों की नियुक्ति के संदर्भ में कुछ नहीं कहा।

मुद्दे को तूल देने वाला मीडिया की सुर्खियों से ज्यादा महत्वपूर्ण समस्या है न्याय व्यवस्था में होने वाली देरी की पड़ताल और समस्या का समाधान। इसका समाधान होना सरकार, न्यायपालिका और विधायिका तीनों की जिम्मेदारी है। क्या यह देरी जजों की नियुक्ति में देरी के कारण है? या वजह कोई और है? नियुक्तियां रोकने में वर्तमान सरकार ने कोई अतिरिक्त भूमिका निभाई है या यह पुरानी समस्या है?

ताजा प्रसंग के संदर्भ में विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सफाई दी कि इस साल उच्च न्यायालयों के 120 न्यायाधीशों की नियुक्ति हुई, जबकि सन् 1990 से अब तक हर साल औसतन 80 नियुक्तियां होती रहीं हैं। सबसे ज्यादा 121 नियुक्तियां 2013 में हुई थीं, जिनसे केवल एक कम इस साल हुई। ऐसे में यह कहना उचित नहीं है कि सरकार नियुक्तियों में देरी कर रही है। उन्होंने कहा कि यह आरोप गलत है कि सरकार अदालतों को ठप करने की कोशिश कर रही है।

यह सही है कि वर्ष 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को लेकर पैदा हुई असहमति के कारण काफी कम नियुक्तियां हो पाईं थीं। बहरहाल केंद्र ने न्यायालय से कहा कि उसने विभिन्न उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॅलेजियम द्वारा भेजे गए 77 नामों में से 34 को मंजूरी दे दी है। सरकार ने उच्चतम न्यायालय को सूचित किया था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश से जुड़ी कोई भी फाइल उसके पास लंबित नहीं है।

अदालत में इस मुद्दे पर अब शीतकालीन अवकाश के बाद सुनवाई होगी। जजों की नियुक्तियों के नौ महीने तक रुके रहने को लेकर हाल में पूर्व महाधिवक्ता सोली सोराबजी ने सरकार पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था, ''अगर हम समय के अंदर न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं करते तो निश्चित है कि लोगों को न्याय मिलने में देरी होगी। इस देरी के लिए सरकार किसी तरह का स्पष्टीकरण नहीं दे सकती।'' राजनीतिक सतह पर भी यह मामला उठ रहा है, बावजूद इसके कि यह राज्य के तीनों अंगों की भूमिका से जुड़े संवेदनशील प्रश्नों से जुड़ा है।

समस्या का मूल क्या है?

यह ठहराव क्यों? सरकार और कॅलेजियम के बीच इस साल जजों की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर यानी एमओपी) पर सहमति नहीं हो पाई है। यह ज्ञापन सर्वोच्च न्यायालय के अक्तूबर 2015 के फैसले की रोशनी में तैयार किया जाना है। मई 2016 की जानकारी है कि तब सर्वोच्च न्यायालय में (स्वीकृत 31 पदों में से) दो रिक्तियां थीं और उच्च न्यायालयों में (1,065 स्वीकृत पदों में से) 432 रिक्तियां थीं। यानी उच्च न्यायालयों में काफी पद खाली थे। क्या इसमें वर्तमान सरकार की कोई भूमिका है?

पिछले कुछ वषोंर् के आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि ऐसा पहले के वर्षों में भी कमोबेश रहा है। मसलन दिसंबर, 2012 में सर्वोच्च न्यायालय के 31 पदों में से 4 रिक्तियां थीं और उच्च न्यायालयों में 895 में से 281 रिक्तियां थीं। यानी कि 43 रिक्तियों की पूर्ति हो जाए तब भी बड़ी संख्या में पद खाली रहेंगे। न्यायाधीशों की संख्या कम होने के कारण कहीं और भी हैं। न्यायिक सेवा आकर्षक नहीं है, उनके वेतन, सुविधाएं और पेंशन वगैरह साधारण हैं। जज बनने के मुकाबले वकील बने रहना ज्यादा आकर्षक है।

अक्तूबर, 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को अवैध घोषित करते हुए देश के लगभग समूचे राजनीतिक वर्ग को कठघरे में खड़ा कर दिया था। जबकि वह अच्छा मौका था, जब व्यवस्था में सुधार के रास्ते खोले जाते। यदि संसदीय प्रस्ताव में दोष थे, तो उन्हें दुरुस्त करने के रास्ते बताए जाते। कई विधि शास्त्रियों की राय है कि अब भी मौका है कि प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) पर सहमति बने और संभव हो तो उसे सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाए। इसे कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच वर्चस्व की लड़ाई नहीं बनना चाहिए, बल्कि इसे शासन के तीनों अंगों को मिलकर सुलझाना चाहिए। इसमें दो की नहीं, तीनों की भूमिका है।

इस साल अगस्त में केंद्र सरकार ने मुख्य न्यायाधीश के पास प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) का ड्राफ्ट भेजा था। उसके बाद विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद खुद भी मुख्य न्यायाधीश से मिले थे और टकराव के बिंदुओं पर बात की थी। संभावना इस बात की है कि अगले कुछ महीनों में कॅलेजियम की संरचना में परिवर्तन होगा, क्योंकि एक-दो रिटायरमेंट भी होने

वाले हैं।

समस्या का समाधान कई तरह से किया जा सकता है। एनजेएसी अधिनियम में दोष है तो उन दोषों को दूर किया जाए। कॅलेजियम को प्रमुख भूमिका दी जानी है तो उसमें सीमा और संतुलन (चेक एंड बैलेंस) होना चाहिए तथा कार्यपालिका की राय लेने की व्यवस्था भी शामिल होनी चाहिए। फिलहाल कार्यपालिका और न्यायपालिका प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) पर विचार कर रहे हैं। इस पर सहमति बनाई जानी चाहिए। पर यह प्रक्रिया ज्ञापन समस्या का समाधान नहीं है। यह अस्थायी समाधान है। हमें स्थायी समाधान की ओर बढ़ना चाहिए।

मुकदमों में देरी क्यों?

पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने निचली अदालतों में पांच और अपील कोर्ट में दो साल में मुकदमा निबटाने का लक्ष्य रखा था। क्या यह संभव है? यह तभी संभव है जब प्रक्रियाओं को आसान बनाया जाएं। न्याय व्यवस्था का संदर्भ केवल आपराधिक न्याय या दीवानी के मुकदमों तक सीमित नहीं है। व्यक्ति को कारोबार का अधिकार देने और मुक्त वातावरण में अपना धंधा चलाने के लिए भी उपयुक्त न्यायिक संरक्षण की जरूरत है।

इस साल मार्च तक देश की जिला और अधीनस्थ अदालतों में 2़ 77 करोड़ मुकदमे विचाराधीन पड़े थे। जनवरी से मार्च की तिहाई में 45 लाख मामलों का निबटारा हुआ था और 50 लाख नए मामले दर्ज हुए थे। उस समय तक उच्च न्यायालयों में 39 लाख मामले विचाराधीन थे। वहां भी 4़ 35 लाख मामलों का निपटारा हुआ था और 4़ 5 लाख नए मामले आए थे। कुल मिलाकर सभी स्तरों पर तकरीबन 3़ 3 करोड़ मुकदमे पड़े हैं। यह मान लें कि औसतन एक मुकदमे में कम से कम दो या तीन व्यक्ति पक्षकार होते हैं तो देश में 7 से 8 करोड़ वादकारी हैं। यह संख्या बढ़ रही है।

न्यायाधीशों की नियुक्तियों में देरी के पीछे केवल कार्यपालिका की सुस्ती नहीं है। कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच अपने अधिकारों को लेकर मतभेद आज की बात नहीं है। न्याय प्रणाली में विलम्ब केवल आज के विवाद के कारण नहीं है। पिछले साल दिसंबर में देश में निचली अदालतों में लंबित पड़े मामलों में से 51़2 फीसदी दो साल से ज्यादा समय से विचाराधीन थे। यही नहीं, 7़5 फीसदी से ज्यादा मामले 10 साल से ज्यादा समय से विचाराधीन हैं। उच्च न्यायालयों में यह प्रतिशत क्रमश: 68 और 19़22 था।

एक वजह यह है कि उच्च न्यायालयों में 25-30 प्रतिशत और अधीनस्थ अदालतों में 20 प्रतिशत तक नियुक्तियां लंबित हैं। पर सारी नियुक्तियां हो जाएं तब भी प्रति दस लाख की जनसंख्या पर 13 जजों की संख्या काफी कम है। इसे कम से कम 30 या उससे ऊपर ले जाने की जरूरत है। विकसित देशों में यह संख्या 50 और कुछ विकासशील देशों में 35-40 तक है। महिला सशक्तीकरण पर लोकसभा की कमेटी की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार अधीनस्थ स्तर पर भारत में 18,000 न्यायाधीश हैं। एक न्यायाधीश द्वारा औसतन निबटाए गए मामलों की संख्या से भी न्याय-व्यवस्था की झलक मिलती है। एक ऑस्ट्रेलियाई विकास सलाहकार, बेरी वल्श के एक अध्ययन के अनुसार सन् 2005 में दिल्ली में निस्तारण दर 701 मामले प्रति वर्ष थी जबकि ऑस्ट्रेलियाई अदालतों में यह संख्या 1511 थी।

देश में मुकदमों का निबटारा देर से होने की वजहें अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं और अलग-अलग अदालतों में अलग। कानूनी प्रक्रियाओं को भी इस प्रकार सुधारा जाना चाहिए कि मुकदमे समय सीमा में निबटाए जा सकें। पिछले दिनों पास हुए कमर्शियल कोर्ट एक्ट-2015 में ऐसी व्यवस्था की गई है। पर देखा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता की व्यवस्थाओं को कड़ाई से लागू न करके उसे अदालतों के विवेक पर छोड़ दिया। इससे मुकदमों को लंबा खींचने वालों ने तारीखें लेने की परम्परा को जारी रखा।

दूसरे तरीकों से भी विवादों को निबटाना चाहिए, जैसे कि पंचाट या आर्बिट्रेशन। पिछले साल तत्कालीन कानून मंत्री डीवी सदानंद गौडा ने कहा था कि मध्यस्थता कानून में संशोधनों की जरूरत है और सरकार संसद में संशोधन विधेयक लाएगी। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और कनाडा में लगभग 70 प्रतिशत सिविल मामले ट्रायल शुरू होने से पहले निपट जाते हैं। दोनों पक्ष मुकदमे में होने वाली देरी और आर्थिक नुकसान के बारे में जानते हैं। कुछ लोग फंसाने के लिए ही मुकदमा दायर करते हैं। जरूरी है कि मुकदमे के हर चरण के लिए समय सीमा का निर्धारण हो।

मुकदमा फाइल करने की तिथियों के साथ-साथ निस्तारण तिथियों का प्रकाशन होना चाहिए। बार-बार तारीख लेने और दूसरी टालमटोल रणनीतियों पर बंदिशें लगनी चाहिए। मोटर व्हीकल एक्ट और चेक बाउंस मामलों के निबटारे का आसान इंतजाम किया जा सके तो एक तिहाई मामले यूं ही निपट जाएं। इसके साथ ही ऊंची अदालतों को मुकदमों को विचारार्थ स्वीकार करने में कड़ाई बरतनी चाहिए। हाल के एक अध्ययन से जाहिर हुआ है कि सर्वोच्च न्यायालय में दायर होने वाले 41 फीसदी मामले विचारार्थ स्वीकार हो जाते हैं। यह प्रतिशत वैश्विक औसत को देखते हुए अच्छा खासा है।

कार्यपालिका का हस्तक्षेप

जजों की नियुक्तियों का मसला छह दशक से राष्ट्रीय विमर्श में है। सन् 1958 में विधि आयोग की चौदहवीं रिपोर्ट में नियुक्ति प्रक्रिया निर्धारित करने की सिफारिश की गई थी। सन् 1973 में देश भर के बार एसोसिएशनों ने द्वारा जजों की नियुक्ति का फॉर्मूला बनाने की मांग की। उसी वक्त देश के पहले प्रशासनिक सुधार आयोग ने विधि आयोग की 14वीं रिपोर्ट से सहमति जताई। 1987 में विधि आयोग की 121 वीं रिपोर्ट 'न्यू फोरम फर ज्यूडीशियल ऑपइंटमेंट' में नेशनल ज्यूडीशियल सर्विस कमीशन की सिफारिश की गई थी।

एक समय ऐसा भी था जब कार्यपालिका ने न्यायपालिका के कामकाज में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप किया था। 1973 में एएन राय को मुख्य न्यायाधीश बनाते समय तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को पीछे कर दिया गया था। आपातकाल में उच्च न्यायालय के जजों के बड़े स्तर पर तबादले किए गए। जजों की नियुक्ति को लेकर विवाद तो आपातकाल के दौरान ही शुरू हो गया था, लेकिन 1977 में वरिष्ठतम जज एचआर खन्ना की अनदेखी वाले मामले से बात कुछ आगे बढ़ गई थी।

आपातकाल के दौरान व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता की हिमायत करने वाले खन्ना का इस्तीफा एक बड़ा विवाद था। सरकार ने वरिष्ठतम जज एचआर खन्ना की वरिष्ठता की अनदेखी कर उनसे जूनियर जज को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। यह भी साफ नजर आ रहा था कि यह फैसला जस्टिस खन्ना के फैसलों पर नाराजगी जताते हुए किया गया था। सरकार के इस कदम से जस्टिस खन्ना ने उसी दिन इस्तीफा दे दिया।

आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को स्थापित करने की कोशिश की। 1978 में 45वां संविधान संशोधन लाया गया, जिसमें कहा गया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सार्वजनिक जनमत संग्रह के माध्यम से भी बदला नहीं जा सकेगा। यह संशोधन राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण पास नहीं हो सका। 1981 में केन्द्रीय कानून मंत्री ने पंजाब के राज्यपाल और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा कि वे ऐसी व्यवस्था करें कि उनके राज्य के उच्च न्यायालय में एक तिहाई जज बाहरी राज्यों के हों। उनसे यह अनुरोध भी किया गया कि वे अतिरिक्त जजों से दूसरे राज्यों में तबादले के लिए सहमति पत्र भी प्राप्त कर लें। इस पत्र ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव की भूमिका तैयार की। 1998 में केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालय के कुछ जजों के तबादलों को लेकर मुख्य न्यायाधीश एमएम पंछी को पुनर्विचार करने के लिए एक याचिका भेजी। राष्ट्रपति केआर नारायणन ने प्रेसीडेंशियल रेफरेंस भेज कर जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सर्वोच्च न्यायालय से राय मांगी। न्यायालय ने 1993 के अपने पूर्व के फैसले को फिर दोहराया।

बहरहाल ताजा सुर्खियों ने भारतीय न्याय व्यवस्था के उन प्रश्नों को फिर ताजा कर दिया है जो अरसे से दबे थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि कार्यपालिका और न्यायपालिका मिलकर ठहराव के इस पड़ाव को पार करने के लिए परस्पर सहमति का सेतु बनाने में सफल होंगी। यदि ऐसा होता है तो आम आदमी को भी राहत मिलेगी क्योंकि अब तक उसे तारीखें ज्यादा मिली हैं और तसल्ली कम।   ल्ल

 

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