बुढ़ाना की 'मारीच-लीला'
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बुढ़ाना की 'मारीच-लीला'

Written byArchiveArchive
Oct 17, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 17 Oct 2016 17:39:00

मुजफ्फरनगर में बुढ़ाना की रामलीला में मारीच की भूमिका निभाने के लिए तैयार होने के बाद आखिर ऐसा क्या हुआ कि चर्चित अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अचानक पैर पीछे खींच लिए? गौरतलब है कि अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें अपनी एक योजना का ब्रांड एम्बेसेडर बनाया है

आशीष कुमार 'अंशु'

मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना की रामलीला में चर्चित अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी मारीच की भूमिका निभाने वाले थे पर अचानक शिवसेना से धमकी मिलने की बात कहते हुए उन्होंने इस संदर्भ में भूमिका न करने का फैसला किया। लखनऊ के रघुराज दीक्षित यह कहते हैं, ''मुझे आश्चर्य है कि उत्तर प्रदेश में शिवसेना का कोई अस्तित्व है क्या? और अगर रामलीला में कौन जटायु बने, कौन मारीच यह फैसला शिवसेना ही कर रही है तो विधानसभा चुाव में सपा, बसपा, भाजपा के बनाम वही नंबर एक पार्टी बनकर उभरेगी।'' दीक्षित जी की सहज समझदारी से भरी यह बात उस राजनीति की पोल खोलने वाला इशारा है जिसने 'मारीच लीला' के बहाने रामलीला के मंच पर चढ़ने और मुद्दे को संभवत: सियासी तौर पर भुनाने की राह तैयार कर ली थी।
मारीच एक मृग था। ऐसा मायावी जो सोने का हिरण बनकर आया, सीता को ललचाया, राम को भटकाया और रावण का काम आसान बना गया। इस मामले में भी कहीं ऐसा ही तो नहीं हुआ कि नवाजुद्दीन का निशाना कहीं और था और भावुक जनता लीला की आध्यात्मिकता में खोने की बजाए सियासत की उस जमीन पर जमा होने लगी जहां उसे चुनावी तौर पर माफिक आने वाले पालों में धकेला जा सकता है। वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संतोष कुमार तिवारी अपने लखनवी लहजे में सवाल करते हैं, 'मारीच तो रावण का कारतूस था, नवाजुद्दीन किसका कारतूस है? वैसे भी चुनाव नजदीक हैं। प्रकरण की राजनीतिक गंभीरता को समझते हुए मेरठ के बृजेश कुमार कहते हैं, ''मौसम चुनावी है। किसकी लीला मंच तक है और कौन लखनऊ के लिए किस लीला पर उतर आए, कहना मुश्किल है।' इन सब बातों से यही संकेत मिलता है कि 'रामलीला' की आड़ में कोई 'पॉलिटिकल लीला' तो नहीं चल रही थी।
दरअसल मुजफ्फरनगर की रामलीला की पटकथा के समानान्तर जो 'स्क्रप्टि' चल रही थी, जिसके संवाद बुढ़ाना रामलीला के संभावित मारीच मीडिया के सामने पढ़ रहे थे, उसे समझना अधिक मुश्किल नहीं है। आइए, इस घटना को क्षेत्रीय राजनीति की नब्ज पर हाथ रखने वालों की नजर से समझने का प्रयास करें। 5 अक्तूबर, 2016 की शाम 5 बजकर 11 मिनट पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक लोकप्रियता का दावा करने वाले दैनिक पत्र की वेबसाइट पर खबर आई, ''मुजफ्फरनगर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी रामलीला में मारीच का रोल निभाएंगे।''  इस दैनिक पत्र की डिजिटल टीम की खबर के अनुसार नवाजुद्दीन के भाई फैजुद्दीन सिद्दीकी ने यह जानकारी वेबसाइट को दी थी। वेवसाइट के अनुसार नवाजुद्दीन फिल्मों में आने से पहले से ही रामलीला में कोई भूमिका करना चाहते थे। उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई थी। वे अपनी कला बुढ़ाना के लोगों को दिखाना चाहते थे। खबर के अनुसार वे बुढ़ाना स्थित चांदनी वाला मंदिर के परिसर में चल रही रामलीला में मारीच का किरदार निभाने वाले थे। प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंदिर परिसर में होने वाली रामलीला के संयोजक विनीत कात्यान नवाजुद्दीन को सिर्फ रामलीला देखने के लिए निमंत्रित करने गए थे। मारीच का किरदार निभाने की इच्छा नवाजुद्दीन ने ही जाहिर की थी।
गौरतलब है कि जिस दैनिक पत्र की वेबसाइट पर रामलीला मंे नवाजुद्दीन की मारीच का किरदार निभाने की खबर 5 बजकर 11 मिनट पर प्रकाशित हुई थी, उसी पत्र की वेबसाइट पर दूसरी खबर 5 अक्तूबर को ही 4 घंटे 57 मिनट बाद लगाई गई— नवाजुद्दीन मारीच की भूमिका नहीं कर रहे। दूसरी खबर के अनुसार एक हिन्दूवादी संगठन ने दंगाग्रस्त क्षेत्र में इस तरह के कार्यक्रम पर एतराज जताया था। इस कथित संगठन का नाम कई मीडिया संस्थानों ने 'शिवसेना' बताया। खबर के अनुसार रामलीला समिति और उत्तर प्रदेश पुलिस ने भीड़ अधिक और सुरक्षा कम होने की बात कहकर पूरे मामले से हाथ पीछे खींच लिए थे। नवाजुद्दीन का साम्प्रदायिक सद्भाव से भरा यह बयान भी प्रकाशित हुआ कि वे श्रीराम के प्रशंसक हैं और उनसे प्रभावित हैं। यदि इस बार उन्हें अभिनय का मौका नहीं मिला तो कोई बात नहीं, वे अगले वर्ष फिर प्रयास करेंगे।
असहिष्णुता की भूमिका
दरअसल नवाजुद्दीन और उनके भाई जिस पटकथा का संवाद बोल रहे थे, उसमें उनका अभिनय चाहे जबरदस्त रहा हो, लेकिन 'फिल्म' पूरी तरह फ्लॉप हो गई। अपने भाई मिनाजुद्दीन की पत्नी आफरीन द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में आरोपी नवाजुद्दीन ने एक मारीच-लीला से खुद को सही साबित करने का नायाब दांव चला। दहेज उत्पीड़न के मामले में आफरीन ने अपनी शिकायत में फैजुद्दीन और उनकी पत्नी को भी आरोपी बनाया है।
अब मीडिया में नवाजुद्दीन द्वारा मारीच की भूमिका न निभाए जाने की घटना को पेश किए जाने की बात। उन्हें यह भूमिका इतने आनन-फानन में मिली कि उन्होंने रामलीला के कलाकारों के साथ अभिनय से पूर्व किसी तरह का अभ्यास भी नहीं किया। वे कथित तौर पर घर पर ही अपनी भूमिका की तैयारी कर रहे थे। क्या वे रामलीला मंे अपनी भूमिका को लेकर गम्भीर नहीं थे या फिर भूमिका लेते हुए तय कर चुके थे कि मंच पर इसे अभिनीत नहीं करना है?
यह कैसा संयोग है कि नवाजुद्दीन को पिछले महीने ही उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना समाजवादी किसान बीमा योजना का ब्रांड एम्बेसेडर बनाया गया था। एक महीने में ही कथित हिन्दुत्ववादियों पर आरोप लगाकर उन्होंने समाजवादी सरकार के प्रति अपनी वफादारी का इजहार किया है। लेकिन इस पूरे मामले में जो वास्तविक खबर थी, उस पर अब तक किसी की नजर न जाने क्यों नहीं गई? क्या शिवसेना उत्तर प्रदेश में इस वक्त इतनी सामर्थ्यवान पार्टी है कि रामलीला में एक कलाकार को मारीच की भूमिका निभाने से रोक सके? इस मामले में उसका आधिकारिक बयान क्यों नहीं सामने आया? कहीं ऐसा तो नहीं कि उत्तर प्रदेश में शिवसेना का पुनर्जन्म सिर्फ नवाजुद्दीन सिद्दीकी को मारीच की भूमिका से वंचित करने के लिए हुआ था? राज्य में उनके रुतबे का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि मुजफ्फरनगर के एसएसपी दीपक कुमार ने फोन करके रामलीला में सुरक्षा को लेकर उन्हें आश्वस्त किया। एक चैनल को दिए साक्षात्कार में दीपक कुमार ने कहा कि उन्होंने नवाजुद्दीन से कहा कि वे खुद रात में रामलीला के समय मंदिर परिसर में मौजूद रहेंगे, जहां रामलीला का मंचन होगा। उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर कोई चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। इसके बाद खबर तो यह बनती है कि उनका विश्वास उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था से उठ गया है। उत्तर प्रदेश के एक जवाबदेह आला अफसर के आश्वस्त करने के बावजूद वे रामलीला में शामिल होने का साहस नहीं जुटा पाए। वे अब कह रहे हैं कि वे अगले साल बुढ़ाना की रामलीला में मारीच की भूमिका निभाएंगे। पर क्या अगले साल शिवसेना उत्तर प्रदेश से अपना बोरिया बिस्तर समेटकर मुम्बई चली जाने वाली है, जो उनका विरोध नहीं करेगी? या यह पूरी पटकथा उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर लिखी गई थी। यदि देश की बहुसंख्यक जनता को ऐसा लगता है तो यह बात निराधार नहीं है। 

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