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तथ्य-पड़ताल/बलूचिस्तानबलूचिस्तान : ऊर्जा की भू- राजनीति

Written byArchiveArchive
Oct 10, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 10 Oct 2016 15:06:48

बलूचिस्तान को कोयला, पेट्रोलियम पदार्थ और प्राकृतिक गैस के भंडार के रूप में जाना जाता है। एक रपट के अनुसार यहां एक ऐसा विशाल क्षेत्र भी है जहां अभी खनिज पदाथार्ें के लिए सर्वेक्षण हुआ ही नहीं है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यहां आने वाले समय में पेट्रोलियम पदाथार्ें के बड़े भंडार खोज लिए जाएं तो आश्चर्य का विषय नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक गैस के भंडारों और उत्पादन के द्वारा पाकिस्तान की ऊर्जा आपूर्ति में बलूचिस्तान विशेष महत्व रखता  है। पाकिस्तान की कुल ऊर्जा खपत का लगभग 50 प्रतिशत गैस पर आधारित है। दरअसल, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस पर निर्भर हो चुकी है। पाकिस्तान में आज बिजली का लगभग 50 प्रतिशत उत्पादन गैस आधारित संयंत्रों से ही होता है। 2006 के आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान का प्राकृतिक गैस भंडार लगभग 28 ट्रिलियन क्यूबिक फीट (टीसीएफ) है, जिसमें से करीब 19 खरब घनफुट (68 प्रतिशत) बलूचिस्तान के क्षेत्र में स्थित है। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है जो पाकिस्तान के ऊर्जा परिदृश्य के लिए अत्यंत चिंताजनक तथ्य है। यह भी तथ्य है कि पाकिस्तान को अपनी प्राकृतिक गैस का 20 से 25 प्रतिशत तक का हिस्सा बलूचिस्तान से मिलता है। पर वह इसमें से सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा ही बलूचिस्तान में खर्च करता है। वह भी मुख्य रूप से सिंचाई व्यवस्था में। बलूचिस्तान में घरेलू और वाणिज्यिक उपयोग में बिजली की खपत नगण्य ही है।
बलूचिस्तान में सबसे बड़ा गैस उत्पादक क्षेत्र सुई गैस फील्ड है, जो न केवल बलूचिस्तान का, बल्कि सारे पाकिस्तान का सबसे बड़ा गैस उत्पादक क्षेत्र है। सुई गैस फील्ड बलूचिस्तान के एक अतिसंवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। यह बुगती जनजाति के प्रभाव  वाला क्षेत्र है और पाकिस्तान सरकार द्वारा घोषित किए गए बलूच आतंकवाद से प्रभावित क्षेत्र के मध्य स्थित है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि बलूच राष्ट्रवादी अपनी सामरिक स्थिति के कारण प्राकृतिक गैस उद्योग के संचालन को बाधित करने के लिए सर्वदा समर्थ और सशक्त हैं। उदाहरण के लिए राज्य के स्वामित्व वाली सुई सदर्न गैस कंपनी का 27,542 किलोमीटर लंबा पाइप लाइन वितरण नेटवर्क है जो सिंध और बलूचिस्तान में फैला हुआ है। इतने बड़े क्षेत्र में सतत निगरानी अत्यंत कठिन कार्य है और बलूच संगठनों के लिए इन्हें नुकसान पहुंचाना उतना ही सरल है। बलूचिस्तान में 2002 से पाकिस्तान के विरुद्ध आंदोलन शुरू हुआ है। इसके बाद से तो वहां पाकिस्तान का निरंतर विरोध हो रहा है। बलूच लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए कई आंदोलन कर चुके हैं। इन लोगों ने पाकिस्तान को दबाव में लाने के लिए प्राकृतिक गैस प्रतिष्ठानों और विशेष रूप से पाइपलाइनों को निशाना बनाया है।
बलूचिस्तान के लोग मानते हैं कि पाकिस्तान द्वारा बलूचिस्तान में चलाया जाने वाला घरेलू प्राकृतिक गैस उद्योग भयानक शोषण और संसाधनों की लूट का प्रतीक है। यहां 1952 में गैस खोजे जाने से लेकर अब तक इसका उपयोग पाकिस्तान के औपनिवेशिक शासन के हित में ही किया गया है। जबकि बलूचिस्तान और उसके निवासियों के हितों की सदा ही अनदेखी की गई। यहां एक ओर मोटा वेतन पाने वाले प्रबंधकीय कार्य से तो बलूचों को पूरी तरह से दूर ही रखा गया है, साथ ही साथ बलूच श्रमिकों को रोजगार देने में भेदभाव बरता गया। प्रबंधकीय और तकनीकी कुशल कर्मियों के साथ-साथ साधारण श्रमिकों को भी बाहर से लाकर नियोजित किया गया। यही नहीं, पाकिस्तान के कारिन्दों ने स्थानीय बलूचों को सदैव ही संदेह की नजर से देखा है। बलूचों के लिए कहा जाता है कि वे अभी तकनीकी रूप से पिछड़े हैं। अपवाद हो सकते हैं मगर यह सच है कि इसकी आड़ में बलूचों को किसी बड़े ओहदे तक पहुंचने ही नहीं दिया जाता है।
खटकने वाली बात यह है कि एक ओर तो कहा जाता है कि बलूच तकनीकी रूप से पिछड़े हैं, लेकिन दूसरी ओर उन्हें तकनीकी जानकारी देने के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया है। पाकिस्तान सरकार ने बलूचिस्तान में तकनीकी प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना और संचालन को कभी गंभीरता से नहीं लिया।
इसके अलावा बलूच राष्ट्रवादियों के असंतोष का सबसे बड़ा कारण गैस उद्योग से होने वाली आय से बलूचिस्तान को इसका न्यायसंगत अधिकार न दिया जाना है। पाकिस्तान में बलूचिस्तान पहला प्रांत है जहां गैस की खोज की गई थी और उत्पादन प्रारंभ हुआ था। परंतु पाकिस्तान सरकार गैस की कीमतों में हेरफेर करती रहती है और उसे बाजार भाव से कम दिखाती है। इसका मकसद है बलूचिस्तान को कम रॉयल्टी देना। उल्लेखनीय है कि बलूचिस्तान को पंजाब और सिंध जैसे गैस उत्पादक राज्यों की तुलना में केवल 20 प्रतिशत रॉयल्टी मिलती है। यह उसके साथ घोर अन्याय है। इस अन्याय की वजह से प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न होने के बावजूद  बलूचिस्तान हमेशा ही संसाधनों की कमी से जूझता रहता है।
वर्तमान में पाकिस्तान में प्राकृतिक गैस की  वार्षिक खपत लगभग एक ट्रिलियन क्यूबिक फीट है और यह मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, जबकि इसके  भंडार निरंतर कम होते जा रहे हैं।  अत: अगर इसकी पूर्ति आयात से की जाती है तो लागतें बढ़ जाएंगी।  मतलब यह है कि आयातित गैस पर निर्भरता बढ़ने से पाकिस्तान के राजकोष को गहरी क्षति पहुंच सकती है।  
इसलिए पाकिस्तान बलूचिस्तान में हर प्रकार के विरोध को समाप्त कर वहां से गैस आपूर्ति को निर्बाध करना चाहता है और यही उसकी बलूचिस्तान संबंधी नीति का प्रमुख केंद्र है। इसलिए वह यहां बलूच राष्ट्रवादियों के आंदोलन को कुचलकर या उनके साथ एक राजनीतिक सौदेबाजी कर अपना मार्ग प्रशस्त करना चाहता है। पाकिस्तान चीन के साथ चीन-पाकिस्तान इकॉनामिक कॉरिडोर के द्वारा सर्वाधिक निवेश ऊर्जा उत्पादन में ही कर रहा है, साथ ही साथ ग्वादर में चीन का नौसेना अड्डा बनने से चीन और पाकिस्तान के संयुक्त सैन्य प्रयासों द्वारा बलूचों के विद्रोह और उपद्रवों को आसानी से दबाया जा सकेगा।  वर्तमान में इस सैन्य आतंक का मुख्यालय क्वेटा में पाकिस्तानी सेना की 12 वीं कोर द्वारा संचालित किया जाता है।
स्पष्ट है कि जब तक बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग नहीं हो जाता या यहां के गैस भंडार समाप्त नहीं हो जाते, यह इस्लामाबाद और बलूच राष्ट्रवादियों के बीच विवाद का केन्द्रबिन्दु बना रहेगा। हालांकि बलूचिस्तान के लोग दुनियाभर में अपनी आजादी के लिए आवाज उठा रहे हैं। सुखद बात यह है कि आज दुनिया के अनेक देश उनकी बातों को सुन रहे हैं।    
-संतोष कुमार वर्मा

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