क्रांतिकारी आंदोलन में भारतीय नारी
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क्रांतिकारी आंदोलन में भारतीय नारी

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Aug 29, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 29 Aug 2016 13:17:28

बाल चौपाल/क्रांति-गाथा-18
पाञ्चजन्य ने सन् 1968 में क्रांतिकारियों पर केन्द्रित चार विशेषांकों की शंृखला प्रकाशित की थी। दिवंगत श्री वचनेश त्रिपाठी के संपादन में निकले इन अंकों में देशभर के क्रांतिकारियों की शौर्यगाथाएं थीं। पाञ्चजन्य पाठकों के लिए इन क्रांतिकारियों की शौर्यगाथाओं को नियमित रूप से प्रकाशित करेगा ताकि लोग इनके बारे में जान सकें। प्रस्तुत है 29 अप्रैल ,1968 के अंक में प्रकाशित शहीद किशोर प्रद्योत भट्टाचार्य के साथी रहे प्रफुल्ल बाला बख्शी का आलेख:—

-प्रफुल्ल बाला बख्शी-

'पाञ्चजन्य' के पिछले क्रांति-संस्मरण अंक के उपर्युक्त शीर्षक लेख में बंगाल की जिन एक अज्ञातनामा बहिन का उल्लेख है— उनका नाम है श्रीमती दुकड़ीवाला देवी। उनको 1916 या 17 में अस्त्र कानून के अन्तर्गत दो साल का सश्रम कारादंड मिला था। उनके घर, वीरभूम जिला के सिउड़ी शहर में पुलिस को तलाशी के समय सात माउजर पिस्तौल मिले थे। ये पिस्तौलें कलकत्ते की रोडार ब्रिटिश कंपनी से चोरी किये हुए पिस्तौलों में से थे।
श्रीमती ननीबाला देवी
सन् 1915 तथा 16 में ननीबाला देवी कलकत्ता, चंदननगर तथा अन्य शहरों में बहुत सक्रिय थीं। विप्लवी फरारों को आश्रय देने तथा उनके अस्त्र-शस्त्र रखने तथा खुफिया पुलिस वालों को चकमा देने में अद्वितीय थीं। सीआईडी को पता चल गया और उनकी खोज होने लगी। ननीबाला देवी सन् 17 में फरार हो गईं। उनकी बचपन की एक सहेली के बड़े भाई पेशावर जा रहे थे। सहेली से अनुनय-विनय करवा कर ननीबाला पेशावर चली गयीं। पुलिस को भी पता लग गया। उन्होंने 18-20 दिन में ही फरार ननीबाला को पेशावर में गिरफ्तार कर लिया। उस वक्त उन्हें हैजा हो गया था। पुलिस द्वारा स्ट्रेचर पर ले जायी गयीं। कुछ अच्छे होने पर उन्हें बनारस जेल भेजा गया। वहां तथा बाद में कलकत्ता जेल में और सीआईडी पुलिस दफ्तर इलिशियम रो में उन्हें सब बातें कबुलवाने के लिए बहुत कष्ट और यातनाएं दी गईं। उसी सिलसिले में एक दिन आपने आईबी पुलिस के स्पेशल सुपरिंटेंडेंट मि. गोल्डि को कई थप्पड़ लगा दिये। उसके बाद आपको सन् 1919 के रेगुलेशन तीन के मुताबिक राजबंदी बनाकर प्रेसीडेंसी जेल में रखा गया। उन दिनों की एकमात्र महिला राज्य-बंदिनी वही थीं। दो साल बंदी-जीवन बिताकर आपको 1919 में मुक्ति मिली। जेल-जीवन में कई बार आपने अनशन किये। यह सन् 1917 के जनवरी महीने की घटना है। वह रिहा हुई थीं 1919 के दिसम्बर में। घर पर छाोटे-छोटे बच्चे छोड़कर वे जेल गई थीं। जेल की तकलीफों के बावजूद तथा कठोर मेहनत करके भी वे अपने पिता को पत्र लिखा करती थीं कि ''मैं अच्छी तरह से हूं और आप लोग मेरी चिंता न करें- सिर्फ बच्चों की देखभाल करें। बच्चों की तकलीफ न हो।''
कल्याणी दास (भट्टाचार्य)
स्वनामधन्य विप्लविनी वीणादास (अंग्रेज गवर्नर गोलीकांड में दस साल सजा प्राप्त) की बड़ी बहिन। विप्लवी आंदोलन में कलकत्ता में महिला-संगठन के साथ सक्रिय कार्यकत्री थीं। फरार विप्लवियों के साथ संपर्क रखवा, गैरकानूनी सामान आदि छिपा कर रखना। उन दिनों यह सब जिम्मेदारी का काम बंगाल की लड़कियां किया करती थीं। सन् 1933 के अंत में गिरफ्तार होकर सन् 1938 तक नजरबंद रहीं।
उज्ज्वला मजुमदार (रक्षित राय)
सन् 1934 में 8 मई दार्जिलिंग शहर स्थित लेव घुड़दौड़ मैदान में गवर्नर एण्ड रसन पर गोली चलाई गईं थी। उस सिलसिले में भवानी भट्टाचार्य को फांसी हुई, मनोरंजन बनर्जी तथा रवि बनर्जी को बीस-बीस साल की सजा तथा उज्ज्वला को चौदह साल के कारावास की सजा मिली। सन् 1939 में रिहा कर दी गईं। पश्चात सन् 42 से 46 तक नजरबंद भी रही थीं। सन् 48 में विप्लवी साहित्यिक भूपेंद्रकिशोर रक्षित राय के साथ विवाह किया, जबकि भारत स्वतंत्र हो चुका था।
ज्योतिकणा दत्त (बोरा)
सन् 1933 में जब ये कालेज छात्रावास में रहती थीं- बीए करते समय कई पिस्तौलें इनके पास तलाशी में पकड़ी गयीं और ज्योतिकणा को अस्त्र-कानून में चार साल की सजा मिली।
रिहाई के बाद डाक्टरी पास की और सन् 1947 में मतिराम बोरा नाम के एक पंजाबी सज्जन से विवाह किया। वे अब लंदन में हैं, जहां उनके पति स्थायी रूप से रहते हैं। ज्योतिकणा अलीपुर बम केस के प्रसिद्ध क्रांतिकारी नेता तथा बम विशेषज्ञ उल्लासकर दत्त की
भतीजी हैं।
सावित्री देवी
सन् 1932 में विप्लवियों को आश्रय देने के जुर्म में इन्हें तथा इनके पुत्र रामकृष्ण चक्रवर्ती को चार-चार साल की सजा मिली। जेल में तपेदिक से रामकृष्ण की मृत्यु हो गई। ऐसी ही माताओं ने कभी अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचा, वरन् दु:ख को ही जीवन का पाथेय बना लिया तथा— विप्लवियों को आगे बढ़कर चलने की राह बना दी।
किशोर शहीद विप्लवी निर्मल जीवन घोष। मिदनापुर के अंग्रेज कलेक्टर मि. वर्ग के वध-कांड में शामिल थे। मिदनापुर कालेज में इंटर (प्रथम वर्ष) के छात्र थे।
26 अक्तूबर, सन् 1934 को फांसी दी गई। विप्लवियों ने चुनौती दी थी कि मिदनापुर में अंग्रेज कलेक्टर नहीं रहने देंगे- 3 गोरे कलेक्टर मारे गये। विप्लवी जीते- अंतत: बंगाली कलेक्टर भेजा गया।
बनलता दास गुप्त उर्फ नीना
ज्योतिकणा दत्त की सहपाठिनी। सक्रिय विप्लविनी भी। जिन पिस्तैलों को रखने के कारण ज्योतिकणा को चार साल की सजा हुई, वस्तुत: वह सब कार्य बनलता के जिम्मे में था और उन्होंने ही ज्योतिकणा के पास पिस्तौलें रखवाई थीं। बनलता सबला थीं। वे मोटरसाइकिल व कार चला लेती थीं तथा जहाज चलाना सीखना भी शुरू ही किया था, जबकि सन् 1933 में गिरफ्तार कर ली गईं। प्रमाण के अभाव से सजा नहीं हुई और नजरबंदी में तीन साल से ऊपर जेल में रहीं। जेल में ही बीमार हो गई थीं— मेडिकल कालेज में डा. ऐण्डरसन ने आपका आपरेशन किया था। आपरेशन के छत्तीस घंटे के अंदर सन् 1936 की पहली जुलाई को विप्लविनी बनलता का जीवनदीप बुझ गया। उस समय उनकी आयु सिर्फ इक्कीस साल मात्र थी।
सशस्त्र मुक्ति-संग्राम की एक निर्भीक सैनिक। उस दिन जीवन के दायरे से विदा ले गईं।
ऐसी ही और भी कितनी हैं, जिन्होंने त्याग और बलिदान किये— ज्यादातर वे सब अज्ञात तथा अनाम ही हैं— आज उनका नाम तक किसी को मालूम नहीं।
सत्य का आलोक
आज सोचने पर बड़ा ही आश्चर्य लगता है कि यह सब कैसे संभव हुआ था? हमारे राष्ट्र में मानव-जीवन आज बहुतांश स्वार्थ केन्द्रित है। अत: आज के जमाने में आश्चर्य लगना स्वाभाविक है। परंतु उस युग में देश में जो नवजागरण आया था उस बहुमुखी नवजागरण ने बुद्धि को दासत्व की भावना से मुक्त किया और विस्मृति की— अंधकार की अतल कंदरा से निकाल कर मनुष्य को संघर्ष और बलिदान के अग्नि पथ पर लाकर सामने खड़ा कर दिया— यह सब प्राचीन भारत की श्रेष्ठतम शिक्षा तथा दीक्षा का ही देन थी— वह शिक्षा तथा दीक्षा जो कि आचार-अनुष्ठान के दबाव में कई सौ साल से ढकी पड़ी रही थी। प्राचीन भारत का दीक्षा-मंत्र था— 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:' का महावाक्य जो आज भी वैसे ही सत्यालोक से
जगमग है।
वर्तमान शताब्दी में राष्ट्र के जीवन में उस सत्य की प्रेरणा आयी संन्यासी की वाणी में, लेखक के उद्दीपन में, कवि के गीत में तथा नाटककार के इंगित में, और उस प्रेरणा का पूर्ण विकास हमने देखा विप्लवी
आंदोलन में।
आशा का जागरण
जिन्होंने भली प्रकार सोच-समझ कर उन दिनों विप्लव की दीक्षा ली थी, वे कहते थे—हमारे जीवनदान से राष्ट्र में नया जीवन संचरित होगा। नयी आशा व नयी उमंग की सृष्टि होगी। राष्ट्र जीवित हो उठेगा।
यह नैराश्यवादी की भाषा नहीं। संत्रासवादी की भाषा भी नहीं। 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:' उच्च कोटि के साधक की वाणी है। और इस शाश्वत आदर्श से अनुप्रेरित होने के फलस्वरूप, विप्लवी आंदोलन की उत्ताल तरंगों के मध्य से ऐसे चरित्र विकसित होकर सामने आये—जिनकी तुलना विश्व के किसी भी देश या जाति के इतिहास में भी कम ही मिलेगी।     ल्ल

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