पाक अधिकृत कश्मीर को आतंक का अड्डा बनाता पाकिस्तान
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पाक अधिकृत कश्मीर को आतंक का अड्डा बनाता पाकिस्तान

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Aug 22, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 22 Aug 2016 11:58:09

पाकिस्तान में इस पर भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएं हुई हैं जिनमें अपने देश को सहिष्णु, संवेदनशील और भारतीय आक्रामकता का शिकार दर्शाने का प्रयास झलकता ह

 योगेन्द्र कुमार
70वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिल्ली के लालकिले से दिए गए भाषण की व्यापक प्रतिक्रिया हुई है। विशेष रूप से, उनके पाकिस्तान संबंधित उद्घोष जिसमें उन्होंने उस देश के मानवाधिकार के ठेकेदार बनने के खोखले दावों को सही मायनों में आईना दिखाया है। पाकिस्तान में भी इस पर भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएं हुई हैं जिनमें अपने देश को सहिष्णु, संवेदनशील और भारतीय आक्रामकता का शिकार दर्शाने का प्रयास झलकता है।
मैंने पाकिस्तान में भारतीय उच्चायोग में काम किया है, मैं पाकिस्तान के कश्मीरियों के प्रति दिखावे वाले दर्द को हास्यास्पद- लेकिन क्रूरतापूर्ण रूप में देखता हूं। जनमानस के स्तर पर कश्मीर या कश्मीरियों के मुद्दे में कोई दिलचस्पी नहीं है, बल्कि अक्सर व्यक्तिगत वार्तालापों में स्थानीय पाकिस्तानी इसे फजूल का मामला मानते हैं जिससे भारतवर्ष के साथ बेवजह तनाव बढ़ता है। अखबारों के अलावा, मैंने स्वयं देखा है कि कश्मीर संबंधी बहस के वक्त पाकिस्तानी संसद में कोरम नहीं होता। तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के दल के फ्लोर मैनेजर दूसरे पक्ष के नेताओं से इस बात पर निवेदन करते थे कि वे कोरम का  न उठाएं ताकिसंसद खानापूर्ति करके आगे की कार्यवाही पर आ जाए। पाकिस्तान के चुनावों में कश्मीर का मुद्दा कभी चुनाव का विषय नहीं बनता। राजनेतागण यह भी समझते हैं कि कश्मीर मुद्दे को लेकर पाकिस्तानी फौज, उसकी खुफिया एजेंसी (आईएसआई) और कट्टरपंथी जिहादी वर्ग के लोग राजनीतिक शासन तंत्र पर अपना वर्चस्व प्रबल करते हैं। यदि इस प्रक्रिया के जरिये निहत्थे, मासूम कश्मीरियों की बलि चढ़ जाए और या फिर जिहादी आतंकी पाकिस्तानियों को बंदूक की गोलियों या बम से उड़ा दें तो इससे इन वर्गों को उनकी आत्मा नहीं कचोटती। पाक-अधिकृत विधानसभा में, हमारे समय में स्थानीय वित्त मंत्री ने अपने बजट-भाषण की शुरुआत, कश्मीर से सांकेतिक एकरूपता की तर्ज पर कश्मीरी भाषा की एक पंक्ति बोल कर की थी।
भारतवर्ष की तुलना में, पाकिस्तान का राजनीतिक ढांचा सतही और कमजोर है। इसी कारणवश, वहां पर अनेक छितरे हुए शक्ति केन्द्र हैं। राष्ट्रीयता की अभिभावना, स्वतंत्रता के 70 साल बाद भी पूर्ण रूप से प्रबल हो पाई है। बाबरी ढांचे के प्रकरण के दौरान, भारतीय उच्चायोग के सामने जुलूस निकालने वाले लोग धमकी देते हुए कहते थे, महमूद गजनवी को भूल गए, मोहम्मद गौरी को भूल गए, लगता है कि तुम्हें फिर से सबक सिखाना होगा। जो लोग इस प्रकार की धमकी दे रहे थे, वे सभी पंजाब व आसपास के इलाकों से थे। उसी समय, लाहौर के महापौर ने बुलडोजरों से एक प्राचीन जैन मंदिर को 'बदले' की भावना से ध्वस्त कर दिया। स्थानीय पाकिस्तानी समाचार पत्रों ने यह खबर दी कि इस मंदिर को पंजाब सरकार ने वक्फ संपत्ति के रूप में हासिल किया था जहां पर कुछ गरीब मुस्लिम परिवार रह रहे थे। उपरोक्त कारकों के परिणामस्वरूप, प्रांतीय, भाषायी, समुदायी और सांप्रदायिक तनाव और भी भीषण रूप धारण कर रहे हैं और जिहादी मनोवृत्ति एवं राजनीतिक अस्थिरता निरंतर गहरा रही है। जो राजनीतिक तत्व हमारे समय में चरमपंथी थे, वह आजकल और नये वर्गों के सामने संयमित नजर आ रहे हैं। अहमदिया संप्रदाय के लोग (जिसमें पूर्व विदेश मंत्री जफरुल्ला खां और नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. अब्दुल सलाम शामिल हैं) गैर-मुस्लिम घोषित कर दिए गए जिसके कारण उन्हें अपनी मस्जिद बनाने का भी अधिकार नहीं रहा। कुछ सुन्नी चरमपंथी मोहर्रम के दौरान शिया संप्रदाय के ऊपर, बेवजह और क्रूरतापूर्ण ढंग से अंधाधुंध गोलियों की बौछार कर देते थे जोकि अभी भी प्रचलित है।

इसी प्रकार अखबारों में कराची शहर में, देवबंदी और बरेलवी फिरकों के बीच मस्जिदों पर कब्जा करने के लिए गोलीबारी की खबरें छपती थीं। कमजोर राजनीतिक-प्रशासनिक ढांचा ही पाकिस्तान के आंतरिक बिखराव का मुख्य कारण है जिससे एक सीमित कट्टरपंथी वर्ग यह फैसला करता है कि क्या प्रचलन इस्लामी है और क्या गैर इस्लामी और अब यह फैसला कुछ हथियार बंद निजी व्यक्ति करते हैं। इस राजनीतिक उद्वेगपूर्ण माहौल में हिन्दुओं, ईसाइयों और अनुसूचित जाति के हालात के बारे में जितना कहा जाए, उतना   कम है।
 बलूचिस्तान की समस्या और गंभीर मानवाधिकार हनन पाकिस्तानी राजनीतिक तंत्र की अविकसित स्थिति ही है। दक्षिण एशिया के सबसे प्राचीन इतिहास वाले क्षेत्र के निवासियों का दमन पाकिस्तान के अस्तित्व में आने से ही शुरू हो गया था। पाकिस्तानी फौजी दमन से कुचले हुए क्षेत्रीय समाज और अर्थव्यवस्था से ही वहां पर स्वतंत्रता आंदोलन पनपा। वर्तमान आंदोलन अगस्त 2006 में पूर्व प्रदेशीय मुख्यमंत्री नबाब अकबर बुगती, जो महात्मा गांधी के विशेष प्रशंसक थे और उनकी तस्वीर अपने दफ्तर में रखते थे, की नृशंस हत्या के बाद शुरू हुआ। बलूची समाज ने अपने दर्दनाक इतिहास में फौज की तोपों, टैंकों और वायुसेना के हमलों को झेला है। विदेश राज्यमंत्री श्री एम.जे. अकबर ने 16 अगस्त, 2016 के अपने बयान में 1971 में पूर्व पाकिस्तान की परिस्थितियों से तुलना की है, यह वक्तव्य उन्होंने न्यूयॉर्क में दिया और यह पहला अवसर है जब भारत के एक वरिष्ठ नेता ने विदेशी धरती पर इस विषय में ऐसा बयान दिया। पाकिस्तान सरकार की नीतियों के कारण और पंजाब प्रांत के जिहादी गुटों को बढ़ावा देने के कारण, बलूचिस्तान में भी आतंकवाद बढ़ रहा है जिसके कारण बड़ी संख्या में सभी वर्ग के लोग, विशेष रूप से अल्पसंख्यक, वहां से पलायन कर रहे हैं। पाकिस्तान की शह पर वहां तालिबान मुख्यालय है और कुछ खबरों के अनुसार अलकायदा कमांडर आयमन अल ज्वाहिरी भी वहीं मौजूद है।
पाकिस्तान का शुरू से ही यह राग रहा है कि कश्मीरी लोग पाकिस्तान से मिलना चाहते हैं और वहां की घटनाओं में कोई बाहरी हाथ नहीं है। वैसे ही, जैसे-जैसे बलूचिस्तान में उसकी समस्याएं गहरी हो रही हैं, वह भारत पर इल्जाम लगा रहा है कि वह वहां पर आतंकवाद में शामिल है यद्यपि वह कोई भी सबूत नहीं दे पाया है। प्रधानमंत्री के भाषण को भी सरकार और मीडिया ने इसी प्रकार से लिया है। उनके बयान को वहां के विदेश मंत्री बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री और स्थानीय सैनिक कमांडर ने प्रांत में भारत की भूमिका की स्वीकारोक्ति कहा है। प्रधानमंत्री ने केवल पाकिस्तान के मानवाधिकार हनन को चाहे पाक-अधिकृत कश्मीर या बलूचिस्तान में, विश्व समुदाय के सामने कच्चा चिट्ठा खोलने की ही बात की है।
पाकिस्तान के नेताओं और फौज ने इस बयान को बलूची और पाक-अधिकृत क्षेत्र के लोगों को हथियार और पैसे की मदद के रूप में लिया है। कुछ टिप्पणी यह भी की गई है कि बलूचिस्तान का बदला भारत के पूर्वोत्तर प्रांतों में लिया जाएगा। इसमें कोई शक नहीं है और यह बात पाकिस्तानी जनरलों और खुफिया तंत्र को मालूम है कि उस देश के संबंध अफगानिस्तान से काफी खराब हैं और ईरान के साथ बहुत नाजुक हैं, साथ ही साथ, भारतवर्ष के पूर्वोत्तर प्रांतों की सुरक्षा संबंधी परिस्थितियां बहुत बेहतर हो गई हैं। पाक-अधिकृत क्षेत्र और बलूचिस्तान में मानवाधिकार समर्थक योद्धाओं को प्रेरणा और अंतरराष्ट्रीय जगत में उनकी दुर्गति के प्रति संवेदनशीलता की जागृति में काफी मदद मिलेगी।
पाकिस्तानी फौज और खुफिया एजेंसी में इस संदर्भ में गहरी चिंता होना स्वाभाविक है विशेष रूप से अब जबकि पाकिस्तान को विश्वभर में आतंकवाद और जिहादी मनोवृत्ति का स्रोत माना जा रहा है। एक दूसरे मायने में भी इस बात की महत्ता यह है कि इस वक्त पाकिस्तानी फौज अपने देश के सभी प्रांतों में आतंकवाद से जूझ रही है और शीर्ष नेतृत्व-राजनीतिक और सैन्य धीरे-धीरे समझ रहा है कि उस देश के अस्तित्व की चुनौती आंतरिक ही है, बाहर से नहीं। प्रश्न केवल यह है कि क्या पाकिस्तान में तंत्र इस योग्य है कि अपनी आंतरिक चुनौतियों से जूझने के लिए सही रुख अख्तियार करे?
(लेखक 1990-93 कें दौरान इस्लामाबाद में भारतीय राजनयिक रहे हैं)

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