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तुष्टीकरण की सियासत19 जून, 2016

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Jul 11, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 11 Jul 2016 13:19:19

आवरण कथा 'घर हुआ पराया' से स्पष्ट है कि कैराना में हिन्दुओं का उत्पीड़न हुआ है। लेकिन सेकुलर राजनीति के पैरोकारों ने इसमें भी राजनीति की और इसे 'कुछ गुंडे व दबंगों के भय से पलायन हो रहा है', ऐसा बोलकर पल्ला झाड़ लिया। लेकिन जिसने भी यह कहा कि गुंडों और दबंगों के कारण यहां पलायन हो रहा है, उन्होंने ऐसे लोगों के नाम स्पष्ट क्यों नहीं किये? इसके पीछे एक ही कारण है और वह यह कि ये गुंडे और कोई नहीं, मुस्लिम उन्मादी हैं। जैसे समाचार आ रहे हैं उससे साफ है कि वर्षों से केवल हिन्दुओं का ही पलायन हुआ है। इसका परिणाम यह हुआ कि 2011 की जनगणना में कैराना में हिन्दुओं की संख्या 30 फीसद थी जो अब घटकर 8 फीसद ही बची है।
—विनोद कुमार सर्वोदय, मेल से

    कैराना में पिछले कुछ समय से जिस प्रकार से सिर्फ हिन्दुओं का ही पलायन हुआ, वह चिंता का विषय है। हजारों की संख्या में चाहे वह व्यापारी हों, मजदूर हों अथवा किसान, उनके साथ हुए अमानवीय अत्याचारों ने उन्हें कैराना छोड़ने पर मजबूर किया है। कैराना का पलायन कश्मीरी हिन्दुओं के पलायन की याद ताजा करता है। सपा, बसपा और कांग्रेस ने  आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए जिस प्रकार जो चुप्पी ओढ़ रखी है वह दुर्भाग्यपूर्ण है।
                         —सत्येंद्र गोयल, मेल से
  आज जो स्थिति कैराना की है, ठीक वहीं स्थिति कुछ समय पहले कश्मीर की हुई थी। चंद मुस्लिमों के आतंक ने बहुसंख्यक हिन्दुओं को घाटी से भागने पर विवश कर दिया था। कमोबेश आज ऐसी ही स्थिति देश के सैकड़ों स्थानों पर देखी जा सकती है। यह पूर्णत: सत्य है कि जहां भी मुस्लिमों की जनसंख्या ज्यादा हो जाती है, वहीं पर हिन्दुओं का रहना मुश्किल हो जाता है। हालत यह हो जाती है हिन्दू परिवारों को वहां से पलायन ही करना पड़ता है। देश के लिए यह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज  विभिन्न क्षेत्रों में यह स्थिति बनी हुई है। केन्द्र सरकार को इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से लेना होगा क्योंकि इससे समाज में अशांति और भय का वातावरण पैदा होता है।
—अनंत कुमार, जालौन (उ.प्र.)

     आज से 45 साल पहले कैराना एक छोटा सा गांव था जहां न सड़कें थीं और न बिजली। कच्चे रास्ते थे और यह क्षेत्र पशुपालन के लिए प्रसिद्ध था। धार्मिक समन्वय के साथ-साथ शांति और सद्भाव का वातावरण था। लेकिन समय बदला और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने जाति-मजहब का भेदभाव फैलाया। इसके अलावा कैराना नकली नोटों और अवैध हथियारों का केंद्र भी बन गया। जहां कभी गाय-भैंस का व्यापार होता था वहां आज हर गैरकानूनी काम होता है। पुलिस-प्रशासन इस पर अंकुश लगाने के वजाय उसे और प्रश्रय देता है क्योंकि इससे मोटी कमाई जो होती है। कैराना से हिन्दुओं का पलायन एक गंभीर विषय है।          
—रचना दुबलिश, मेरठ (उ.प्र.)     

 कैराना को लेकर संतों के एक प्रतिनिधिमंडल ने भी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल से मिलकर यहां से हिन्दुओं के पलायन की रिपोर्ट दी। कथित संतों में इस प्रतिनिधि मंडल शामिल एक संत हाल ही में कांगे्रस के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुके है। राजनीति से प्रेरित इनकी रिपोर्ट में कैराना में हो रहे हिन्दुओं के पलायन को गलत बताया गया है। लेकिन इन संतों की टोली पर विश्वास कौन करेगा क्योंकि ये  लोग कोई संत नहीं बल्कि संतों के रूप में कांग्रेस के एजेंट थे जो मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति कर रहे थे।
                     —नीलम खन्ना, इन्दौर (म.प्र.)

  मुस्लिमों की बात आते ही हमारे नेताओं की बांछें खिल जाती हैं और उनके लिए वे क्या कर दें, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। आंध्र प्रदेश सरकार ने इस रमजान से मस्जिदों के इमामों को पांच तथा मुअज्जिनों को तीन हजार रुपये वेतन देने की घोषणा की है। क्या इमाम-मुअज्जिन राज्य सरकार के कर्मचारी हैं? जबकि यह वक्फ बोर्डों की जिम्मेदारी बनती है कि वे इन्हें वेतन दें। 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा था कि वक्फ बोर्ड सरकार के साथ मिलकर इन दोनों समूहों को वेतन देने की स्कीम अदालत के सामने प्रस्तुत करें, जिसके अनुमोदन के बाद बोर्ड अपनी आमदनी में से वेतन बांटेंगे। किन्तु वक्फ बोर्ड ऐसा कुछ न कर सके। तब सेकुलरिज्म की ढिंढोरची कुछ सरकारें अपने खजाने से इन्हें वेतन देने को उत्सुक हो उठीं। ऐसा करके वे संविधान के मौलिक ढांचे को तहस-नहस कर    रही हैं।
—अजय मित्तल, मेल से

     निस्संदेह कैराना में हिंदुओं का घटता आंकड़ा वहां की सच्चाई को छिपा नहीं सकता। सरकार इस मामले की निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार कराये। इस मामले पर प्रदेश की जनता किसी भी प्रकार की राजनीति नहीं चाहती। क्योंकि ऐसी ही घटनाएं आग में घी डालने का काम करती हैं। इसलिए समय रहते इन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।
—सुरेन्द्र कटियार, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

ङ्म     कुछ लोग हो सकता है, इस बात से  इनकार करें लेकिन देश का प्रत्येक गांव, कस्बा, मुहल्ला और बड़ा शहर जहां  मुस्लिम जनसंख्या 50 फीसद से अधिक है, वह कैराना है। मुस्लिम उलेमा इस्लाम को भाईचारे और अमन का मजहब कहते  हैं।  हां, उनका यह कथन वहां सत्य बैठता है जहां ये 30 फीसद से कम होते हैं। लेकिन जैसे ही इससे ज्यादा होते हैं  अमन-चैन समाप्त हो जाता है। इसका सीधा मतलब यह होता है कि इन स्थानों पर अन्य  धर्मों व पंथों  के सभी अधिकार समाप्त हो जाते हैं।
—सुरेश नारायण त्रिवेदी, लखनऊ (उ.प्र.)

     पिछले कुछ समय से देश के अंदर हिन्दुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन करने की घटनाएं बढ़ी हैं। पूर्वोत्तर भारत इसका ज्वलंत उदाहरण है। अधिकतर स्थानों पर या तो मुस्लिमों का आधिपत्य है या फिर ईसाइयों ने कब्जा कर रखा है। 60 वर्ष सत्ता में रही कांग्रेस ने वोटों के लिए झूठे सेकुलरिज्म का ऐसा ताना-बाना बुना कि देश साम्प्रदायिकता व अलगाववाद की आग में झुलसता रहा।
—रमेश कुमार मिश्र, आंबेडकर नगर (उ.प्र.)

गलत को गलत कहे मीडिया
आवरण कथा 'खबर सच है' (22 मई, 2016) 'आजकल अपने अधिकारों को पाने के लिए होड़ लगी हुई है। इसके लिए हर कोई अन्य के अधिकारों का हनन करने पर आमादा है। कुछ लोग तो सरकारी संपत्ति को ही तहस-नहस कर डालते हैं। और मीडिया ऐसे लोगों की आलोचना करने के बजाय उन्हें और प्रश्रय देता है जिससे इनके हौसले और बुलंद हो जाते हैं। जबकि मीडिया को चाहिए कि वह ऐसे लोगों की आलोचना करे। क्योंकि ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि वे जिस संपत्ति का नुकसान कर रहे हैं वह केवल सरकार की संपत्ति नहीं बल्कि देशवासियों की संपत्ति है। इसका नुकसान देश का नुकसान है।
                      —तरुण कुमार शर्मा, मेल से

अनसुलझे रहस्य आएंगे सामने
रपट 'सरस्वती के लोग' (12 जून, 2016) उन लोगों के मुंह पर ताला लगाती है जो सरस्वती नदी के बारे में झूठ और भ्रामकता फैलाते आए हैं। सरस्वती नदी के अस्तित्व के अनसुलझे पहलुओं के फिर से स्पष्ट रूप से सामने आने की संभावना है। देश आज भी अपने सच्चे इतिहास से अनभिज्ञ है। जनता से सही इतिहास को छिपाया गया है।  लेकिन अब समय है जब भारत के सर्वांगीण इतिहास को देश के सामने लाया जा सकता है। इससे न केवल देश का इतिहास सामने आएगा बल्कि कुछ लोगों की करतूतें भी उजागर हो जाएंगी।
—हरिहर सिंह चौहान, इंदौर (म.प्र.)

    सरस्वती से जुड़े सत्य को उजागर करके पाञ्चजन्य ने इतिहास प्रेमियों का हृदय जीतने का काम किया है। कुछ प्रसिद्ध इतिहासकारों ने इस पर गहन शोध किया और समय दर समय नदी इनके लिए
शोध का विषय बनी हुई है। वर्तमान हरियाणा सरकार भी इस बारे में लगातार प्रयास कर रही है कि वह पुन: अस्तित्व में आ जाए।
—कृष्ण वोहरा, सिरसा (हरियाणा)
मिला सम्मान
रपट 'सावरकर जोत से देशभक्ति का उजास' (12 जून, 2016) अच्छी लगी। विनायक दामोदर सावरकर के अटूट राष्ट्रप्रेम से अंग्रेजों का कांपना स्वाभाविक था परंतु जब कांग्रेस पार्टी द्वारा उनके उत्सर्ग का निरादर किया जाता है तो फिर उसके और अंग्रेजों के दुर्व्यवहार में कोई बड़ा फर्क नजर नहीं आता। जिस सेल्युलर जेल में सावरकर को अंग्रेजों ने कू्रर यातनाएं दीं। उनकी राष्ट्रभक्ति को सम्मान देते हुए अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने जेल को राष्ट्रीय तीर्थ मानते हुए सावरकर पट्टी और सावरकर ज्योत की स्थापना की थी। लेकिन कंाग्रेस सरकार ने उसे अपने शासनकाल में खंडित किया। अब ऐसे में उसे अंगे्रजों से कैसे भिन्न माना जाए। मोदी सरकार ने फिर से वीर सावरकर का सम्मान करते हुए ज्योत और पट्टी को स्थापित करके अपने दायित्व का पालन किया है।
—हरिओम जोशी, भिण्ड (म.प्र.)

 

हिंदी को मिले उसका खोया सम्मान
रपट 'सफर ऊर्जा भरा' (19 जून, 2016) यही बताती है कि प्रधानमंत्री ने भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों को एक नया आयाम दिया है। जो दोनों देशों के विकास में सहायक सिद्ध होगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। भारत आज तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था वाला देश है तो वहीं अमेरिका सबसे शक्तिशाली। इन दोनों के समन्वय से विकास को गति मिलेगी। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता देश ही नहीं, पूरे विश्व में बढ़ी है, इसके पीछे उनका राष्ट्रीय प्रेम है। जब वे लाखों लोगों के सामने हिन्दी में अपनी बात कहते हैं तो स्वाभाविक है कि देश के लोगों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। क्योंकि राष्ट्रभाषा देश का गौरव है। हर देश की अपनी एक राष्ट्र भाषा है। भारत में भी संविधान ने राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं संस्कृति, सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति को मजबूती देने के लिए हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया है। अब तक इसे संवैधानिक रूप से भारत की राष्ट्रभाषा होना चाहिए था। कुछ लोगों में भ्रम है कि हिन्दी के सहारे हम आज के समय में मजबूती से खड़े नहीं हो सकते। ऐसा बिल्कुल नहीं है। जिन्हें भ्रम है उन्हें देश के प्रधानमंत्री की ओर देखना चाहिए।  उन्होंने पूरे विश्व में हिन्दी का डंका बजाया है। आज यह बिलकुल सच है कि जहां भारत के प्रधानमंत्री विश्व में हिन्दी को मान दिला रहे हैं वहीं कुछ लोग देश के अंदर ही हिन्दी की गरिमा को धूमिल करने का काम करते नजर आते हैं। इन लोगों को हिन्दी की गरिमा से अवगत कराना होगा और राष्ट्रभाषा का अर्थ समझाना होगा। समय आ गया है जब हिन्दी को वैधानिक रूप में राष्ट्रभाषा बनाया जाए और लोगों में हिन्दी के प्रति जो भ्रम है, उसे दूर किया जाए।
—हरीलाल मिलन, 300ए/2,प्लाट-16, दुर्गावती सदन, हनुमंत नगर,नौबस्ता, कानपुर (उ.प्र.)
विदेशी धन आएगा

अर्थव्यवस्था खुल गयी, भारत की सम्पूर्ण
पर इससे सपने सभी, कैसे होंगे पूर्ण?
कैसे होंगे पूर्ण, विदेशी धन आएगा
साथ-संग अपने वह तंत्र नया लाएगा।
कह 'प्रशांत' हैं सम्मुख लेकिन आशंकाएं
करते हुए हवन हाथ ही ना जल जाएं॥  
—प्रशांत

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