| दिंनाक: 21 Mar 2016 11:53:40 |
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अ.भा. प्रतिनिधि सभा ने भेदभाव और शोषण का गहरे जमा तंत्र उखाड़ फेंकने के लिए सामाजिक समरसत्ता का अपना उद्देश्य दोहराया। आचरण से समरसता का उदाहरण का प्रस्तुत करने का आह्वान
स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ''जाति व्यवस्था वेदांत के धर्म के विपरीत है। जाति एक सामाजिक रिवाज है और हमारे सभी महान भाष्यकारों ने इसे खत्म करने की कोशिश की है। बौद्ध धर्म से लेकर, बाद के हरेक संप्रदाय ने जाति के विरोध में आवाज उठाई और हर बार इससे इन बेडि़यों को और मजबूती ही मिली।'' स्वामी जी की इस सोच को आगे बढ़ाते हुए और समाज जीवन से सभी प्रकार की असमानता दूर करने के अपने घोषित उद्देश्य को दोहराते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने दैनिक जीवन में समरसता अपनाने का प्रस्ताव पारित किया। यह प्रस्ताव विश्व हिंदू परिषद के उडुपी सम्मेलन में किए गए समरसता के आह्वान का एक तरह से विस्तार था। उडुपी में प्रमुख हिंदू संतों ने घोषित किया था, 'न हिंदू पतितो भवेत्' (कोई हिंदू पतित नहीं हो सकता)। संघ का समरसता का यह प्रस्ताव तृतीय सरसंघचालक दिवंगत बालासाहब देवरस के पुणे की प्रतिष्ठित वसंत व्याख्यानमाला में दिए भाषण की भी प्रतिध्वनि था कि ''यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है तो कुुछ भी पाप नहीं है। इसे जड़-मूल सहित जाना ही होगा।''
हम सभी जानते हैं कि भारतीय संस्कृति की दार्शनिक नींव सभी जड़-चेतन चीजों में आधारभूत तत्वों के सतत साम्य पर आधारित है। इसे कहा गया है-'आत्मवत् सर्व भूतेषु' (सभी जीवों के प्रति एक समान दृष्टि), 'अद्वेष्टा सर्व भूतानां' (किसी के भी प्रति द्वेष भाव नहीं) और 'एक नूर ते सब जग उपजा कौन भले कौ मंदे' (उसी एक दिव्य ज्योति से सारी दुनिया पैदा हुई है तो कोई एक श्रेष्ठ कैसे और दूसरा हीन कैसे हो सकता है)। जब-जब एकत्व की इस चेतना का क्षय हुआ, जाति आधारित भेदभाव और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयां हमारे जीवन में प्रवेश कर गईं। इसका स्वाभाविक परिणाम था राष्ट्रीय जीवन का कमजोर होना और विदेशी शासन का आगमन। इस तथ्य के बावजूद हम रोजमर्रा के जीवन में कई तरह के सामाजिक भेदभाव का अनुभव करते हैं। हालांकि विषमता और शोषण का सैकड़ों साल से चला आ रहा यह तंत्र ध्वस्त करने के लिए कई संवैधानिक उपचार किए गए और संस्थागत तंत्र का निर्माण हुआ, फिर भी हमारे दैनिक जीवन में जाति आधारित सोच बराबर दिखाई देती है। कई बार यह भाव बहुत ही घृणित स्तर पर पहुंचकर सामाजिक ताने-बाने को ध्वस्त कर देता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ लोग जातिगत पहचान को राजनीति में आगे बढ़ने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं। अंतत: इससे कुछ समूहों द्वारा अपनाए जा रहे अमानवीय और शोषण के तरीकों को और भी वैधता मिल जाती है। इससे अविश्वास और दुराव का माहौल बना रहता है और ये हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में मजबूत होता और लगातार बढ़ता है।
असमानता और भेदभाव का मुद्दा केवल वैधानिक तंत्र या शैक्षणिक सिद्धांतों के जरिए हल नहीं किए जा सकता। जातिगत पहचान व्यक्तिगत और सामाजिक मानस में गहरे पैठी होने के कारण जरूरी है कि इसका निदान पहले उसी स्तर पर किया जाए। इसलिए प्रतिनिधि सभा ने अपने तीसरे और महत्वपूर्ण प्रस्ताव में यह बात रखी है कि प्रत्येक व्यक्ति को भारतीय जीवन के शाश्वत मूल्यों और आदर्शों के आधार पर अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में सच्चे मन से समरसता का आचरण करना चाहिए। इसी आचरण से हम जाति आधारित भेदभाव, छुआछूत तथा परस्पर अविश्वास दूर कर शोषण मुक्त समरस जीवन का अनुभव कर सकेंगे। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने स्वयंसेवकों सहित सभी नागरिकों को आह्वान किया है कि वे अपने जीवन में समरसता का पालन करें। सभा ने देश के सामाजिक-धार्मिक संगठनों से भी समरसता का यह भाव समाज में पक्का करने के महती कार्य में जुटने का अनुरोध किया। इस संदर्भ में स्वामी विवेकानंद को याद करना समीचीन है: ''मैं कहता हूं कि हिंदू आपस में भाई हैं। ये हम ही हैं जो एक दूसरे को नीचा समझते हुए चिल्लाते हैं-छूना मत-छूना मत! और इस तरह समूचे देश को इस ओछेपन, कायरता, और अज्ञानता के गहरे गर्त में पहंुचा दिया गया है। इन लोगों को ऊपर उठाना होगा और उनमें भरोसा जगाना होगा। उनको बताना होगा कि, 'आप हम जैसे ही हैं, और आपको भी वे सब अधिकार प्राप्त हैं जो हमें प्राप्त हैं।'' प्रतिनिधि सभा का प्रस्ताव हर व्यक्ति से इस बदलाव का वाहक बनने की अपेक्षा रखता है।