|
'वे हमारी प्रेरणा का केन्द्र बने रहेंगे'
गत 15 जून को नई दिल्ली में पाञ्चजन्य के पूर्व सम्पादक एवं दीनदयाल शोध संस्थान के पूर्व महासचिव स्व. यादवराव देशमुख को श्रद्धांजलि देने के लिए एक सभा आयोजित हुई। उल्लेखनीय है कि 6 जून को उनका निधन हो गया था। उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए संस्कार भारती के मार्गदर्शक श्री योगेन्द्र बाबा ने कहा कि वे हमारे लिए पिता के समान थे। छोटी उम्र में ही उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला। संस्कार भारती की रचना का काम उन्होंने दिया। वे चित्र बनाने के लिए विषय निकाल कर लाते थे और संस्कार भारती के कलाकारों से चित्र बनवाते थे। वे सदैव हमारी प्रेरणा का केन्द्र बने रहेंगे। वरिष्ठ स्तंभकार और इतिहासविद् श्री देवेन्द्र स्वरूप ने कहा कि 68 वर्ष तक हम दोनों साथ-साथ चले और पाञ्चजन्य और दीनदयाल शोध संस्थान में काम किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दिल्ली प्रान्त के सह प्रान्त संघचालक श्री आलोक कुमार ने कहा कि उनके जीवन से हम लोगों ने बहुत कुछ सीखा। उन्होंने 30 नवम्बर, 2014 को मृत्यु के बाद देहदान का संकल्प लिया था। उनके उसी संकल्प के कारण उनकी मृत देह मेडिकल कॉलेज को दान कर दी गई। इस तरह उनकी मृत्यु से भी हम सब ने कुछ सीखा। वरिष्ठ पत्रकार श्री राहुल देव ने कहा कि उनकी वजह से ही मैं कुछ बन पाया। वे विलक्षण थे। उनका हृदय विशाल था, विचार बड़े प्रेरक थे और कर्म बहुत ही श्रेष्ठ। उन्होंने कभी अपने यश की कामना नहीं की। यही गुण उन्हें अन्य बड़ों से बड़ा बनाते थे। दीनदयाल शोध संस्थान के सचिव डॉ. भरत पाठक ने कहा कि यादवराव काका ने अनेक कार्यकर्ताओं को गढ़ा। वरिष्ठ पत्रकार श्री रामबहादुर राय ने कहा कि यादवराव जी स्वतंत्र-चेत्ता थे और सम्बंध बनाने की कला उनके पास थी। इसी कला के कारण उन्होंने कार्यकर्ताओं की श्रृंखला खड़ी की। लखनऊ से प्रकाशित 'जनमोर्चा' के सम्पादक श्री शीतला सिंह ने कहा कि यादवराव जी अपने विचारों के प्रति निष्ठावान थे और उसी आधार पर जीवन जीते थे। वरिष्ठ चिन्तक श्री गोविन्दाचार्य ने कहा कि उन्होंने मुझे तराशा था और मेरे द्वंद्व को समाप्त किया था। इसके बाद ही मैं संघ का प्रचारक निकला था। भाजपा महासचिव (संगठन) श्री रामलाल ने कहा कि उनका व्यक्तित्व अनूठा था। भवन तो कोई भी बना सकता है, पर व्यक्ति का निर्माण हर कोई नहीं कर सकता है। उन्होंने व्यक्तियों और अनेक संस्थाओं का निर्माण किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि यादवराव जी ने अनेक कार्य किए, पर वे मूलत: स्वयंसेवक थे। स्वयंसेवक होने का अर्थ है साधनामय जीवन। उन्होंने अपने जीवन में स्वयंसेवकत्व को निभाने का कार्य बहुत ही सहजता से किया। एकल अभियान की वरिष्ठ कार्यकर्ता श्रीमती मंजू ने कहा कि उनका प्यार ही हमारे जीवन की ताकत है। मंच का संचालन डॉ. महेशचन्द्र शर्मा ने किया। -प्रतिनिधि

ब्रह्मलीन हुए गुरु शिवानंद मूर्ति
10 जून को तेलंगाना के वारंगल स्थित 'गुरुधाम आश्रम' में प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु शिवानंद मूर्ति ब्रह्मलीन हो गए। वे 87 वर्ष के थे। शिवानंद जी दक्षिण भारत में सनातन धर्म के लिए समर्पित थे। उन्होंने अनेक ऐसे कार्य किए जिनसे हिन्दुओं में एक नई ऊर्जा जाग्रत हुई। उन्होंने शिवानंद कल्चरल ट्रस्ट, आंध्र म्यूजिक एकेडमी जैसी संस्थाओं की स्थापना की थी। गुरु शिवानंद मूर्ति के समाधिस्थ होने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत, सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी और सह सरकार्यवाह श्री भागैया ने गहरा दु:ख व्यक्त किया। श्री मोहनराव भागवत ने अपने शोक संदेश में कहा, 'पूज्य सद्गुरु शिवानन्द मूर्ति जी की समाधि का समाचार सुनकर गहरा आघात लगा। इस आधुनिक युग में वे सम्पूर्ण हिन्दू समाज को मार्गदर्शन देने वाले योगीश्वर थे। उनके माध्यम से पूरे भारतवर्ष के बौद्धिक जगत में एक सांस्कृतिक नवोत्थान हुआ। सभी को सत्कर्म एवं समाज सेवा करने की प्रेरणा पूज्य स्वामी जी ने दी। श्री गुरुजी के समय से लेकर अब तक उन्होंने एक स्वयंसेवक के नाते हम सभी का दिशादर्शन किया।' – प्रतिनिधि

नहीं रहे बाबाराव पुराणिक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और उत्तर-पूर्व क्षेत्र (बिहार-झारखंड) के पूर्व प्रचारक प्रमुख श्री आनंद वासुदेव पुराणिक उपाख्य बाबाराव पुराणिक ने 10 जून की प्रात: राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) में अंतिम सांस ली। बाबाराव गत दो दशक से बिहार में सक्रिय थे। बाबाराव का जन्म दिसंबर, 1931 को वर्धा में हुआ था। उच्च शिक्षित बाबाराव 1965 में श्री मोरोपंत पिंगले के आग्रह पर संघ के प्रचारक बने। उस समय से उन्होंने कई दायित्वों का निर्वहन किया। बाबाराव लंबे समय तक विलासपुर के विभाग प्रचारक रहे। विदर्भ के प्रांत प्रचारक का दायित्व भी उन्होंने निभाया। वे दक्षिण बिहार प्रांत के सह प्रांत प्रचारक 1992 में बनाए गए। बाद में दक्षिण बिहार के प्रांत प्रचारक बने। उस समय संयुक्त बिहार में दो प्रांत थे- उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार। संघ की दृष्टि से जब बिहार के तीन प्रांत बने तो बाबाराव उत्तर बिहार (गंगा नदी के उत्तर) के प्रांत प्रचारक बनाए गए। उन्होंने संघ के उत्तर-पूर्व क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक प्रमुख का दायित्व भी कुशलतापूर्वक निभाया। दो भाई और दो बहनों में बड़े बाबाराव गीत के विशेषज्ञ माने जाते थे। बाबाराव का अंतिम संस्कार 11 जून को राजनांदगांव में किया गया। -प्रतिनिधि











