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नई संभावनाओं के द्वार

Written byArchiveArchive
Feb 28, 2015, 12:00 am IST
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दिंनाक: 28 Feb 2015 15:37:30

 

जम्मू-कश्मीर – जम्मू-कश्मीर में सरकार का गठन
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती की पुष्टि के बाद जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन के स्थान पर चुनी हुई सरकार के गठन की संभावना बन गई है। उम्मीद है कि 1 मार्च को नई सरकार बन जाएगी। भाजपा पर जहां सभी दलों की ओर से अपने मुद्दों से हटने का दबाव बनाया जा रहा था, वहीं पीडीपी पर कश्मीर की स्थानीय राजनीति में भाजपा को प्रवेश करने का अवसर देने के आरोप लगाए जा रहे थे। दोनों दलों के लिए इन दबावों को किनारे कर सरकार बनाने की पहल करने का निर्णय लेना कठिन था। लेकिन उन्होंने यह साहसिक निर्णय लिया जो नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है।
छह वर्ष तक सत्ता में रहे कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन को राज्य की जनता द्वारा नकारे जाने के बाद भाजपा-पीडीपी गठबंधन द्वारा सरकार के गठन के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प संभव भी नहीं था। इसका विकल्प हो सकता था दोबारा चुनाव अथवा लंबे समय तक राज्यपाल शासन, जो जनता द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जताए गए विश्वास की अवहेलना ही माना जाता।
दोनों दलों के अलग-अलग राजनीतिक मिजाज को देखते हुए यह स्वाभाविक था कि सरकार गठन की उतावली न दिखाते हुए फूंक-फूंक कर कदम रखे जाएं। स्थिर सरकार देने के लिए जरूरी था कि गठबंधन से पहले ही न्यूनतम साझा कार्यक्रम और सरकार की संरचना पर स्पष्ट नीति का निर्धारण हो जाए। इसमें दो महीने से ज्यादा का समय लगा। लेकिन सरकार गठन के बाद दिन-प्रतिदिन के कार्य-व्यवहार में आने वाली छोटी-छोटी पेचीदगियों को रोकने में लगने वाले समय और श्रम की बचत इसकी भरपाई कर देगी।
विपक्षी दल निश्चित रूप से इसे भाजपा का अवसरवाद सिद्ध करने की कोशिश करेंगे। लेकिन वास्तव में यह समस्या भाजपा की नहीं, बल्कि अन्य दलों की है। देश और दुनिया की राजनीति का व्याकरण पिछले दशकों में बदला है। बदलाव के इस दौर को समझ कर नई परिस्थिति में काल-सुसंगत निर्णय लेने होंगे। भाजपा-पीडीपी द्वारा सरकार गठन का मुद्दा इसी की एक कड़ी है।
सरकार की प्राथमिकताएं
भाजपा ने तो चुनाव को विकास के मुद्दे पर ही केन्द्रित किया था। पीडीपी ने भी कहा है कि वह राज्य के विकास और लोक प्रशासन को ध्यान में रख कर ही भाजपा के साथ हाथ मिला रही है। इसलिए सरकार के गठन की स्थिति में न्यूनतम साझा कार्यक्रम का केन्द्र-बिन्दु विकास ही बना है। इस दृष्टि से सरकार के सामने प्राथमिकता का मुद्दा होगा सड़क, परिवहन, पर्याप्त बिजली आपूर्ति जैसे आधारभूत अवयवों को मजबूत बनाना। राज्य में निवेश, लघु और कुटीर उद्योगों का जाल, आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन, उचित कराधान नीति और सस्ते ऋण की व्यवस्था और नियंत्रण रेखा के दोनों ओर से चल रहे व्यापार को मजबूती देकर न केवल स्थानीय उद्योगों को सशक्त बनाना होगा, अपितु नियंत्रण रेखा के दोनों ओर परस्पर-पूरकता को बल देकर विकास और संवाद को जोड़ना होगा।
राज्य के पिछड़े और सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए विशेष योजनाएं बनानी होंगी और उनके समयबद्ध क्रियान्वयन पर ध्यान देना होगा। एक ओर विस्थापितों और शरणार्थियों के मुद्दे पर संवेदनापूर्ण ढ़ंग से विचार करना होगा, वहीं अलगाववाद, आतंकवाद और इस्लामिक कट्टरवाद की चुनौतियों से कठोरता से निपटना होगा। दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन कर राज्य में व्याप्त तमाम समस्याओं के समाधान तक पहुंचा जा सकता है क्योंकि सदन में दोनों दलों का संयुक्त संख्या बल दो-तिहाई से कुछ ही कम है।
कठिनाई यदि आएगी तो उन वैचारिक मुद्दों पर आएगी जिन पर दोनों दलों को परस्पर सहमति तक पहुंचना शेष है। इनमें से भी अधिकांश मुद्दे वे हैं जिनके संबंध में समस्या संवैधानिक कम और रुख की ज्यादा है। दशकों से इन संगठनों ने कुछ मुद्दों और कुछ शब्दों पर एक रुख अपना लिया है जो अब उनकी पहचान बन गई है। नए राजनीतिक हालात में पहले उन्हें अपने कार्यकर्ताओं को विश्वास में लेना होगा। जब तक नई भूमिका और स्थिति को उनके कार्यकर्ता स्वीकार न कर लें, तब तक भाजपा-पीडीपी को अड़ने की बजाय जुड़ने और समझ बढ़ाने की राह निकालनी होगी।
अनुच्छेद 370 और अफस्पा
उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 370 को हटाने का मुद्दा भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, अथवा कहें कि बना दिया गया है, वहीं सशस्त्र सैन्यबल विशेषाधिकार अधिनियम 'अफस्पा' को हटाने का प्रश्न पीडीपी की नाक का सवाल बन चुका है। इन प्रश्नों पर विपक्षी दल भी इन्हें घेरने का प्रयास करेंगे। इनके अपने कार्यकर्ता भी इन मुद्दों पर अतिसंवेदनशील हैं इसलिए इन दलों के लिए भी इन प्रश्नों से कन्नी काट लेना संभव नहीं है। कार्यकर्ताओं को यह स्पष्ट करना होगा कि इन मुद्दों पर क्या रुख है। साथ ही देश को भी यह बताना होगा कि इन मुद्दों पर दोनों दलों के बीच जो सहमति बनी है वह किसी प्रकार का समझौता, अवसरवाद अथवा सत्तालोलुपता नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधानों का पालन करने की ईमानदार स्वीकारोक्ति है।
जहां तक अनुच्छेद 370 का सवाल है। अपने मूल स्वरूप में वह भारतीय संविधान के प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर में लागू करने की प्रक्रिया का निर्देश करता है। वह राज्य को कोई विशेष अधिकार नहीं देता, यह संवैधानिक तथ्य है। यह एक अस्थायी प्रावधान है जिसका एक उपखण्ड उक्त अनुच्छेद के समाप्त होने की प्रक्रिया बताता है। लेकिन इस पर विभिन्न दलों द्वारा अपनाए गए रुख ने ही स्थिति को जटिल बनाया है। जनसंघ अध्यक्ष स्व़ श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा चलाया गया आन्दोलन 'एक देश में दो प्रधान, दो निशान और दो विधान' के विरुद्ध था। अनुच्छेद 370 से परे का यह आन्दोलन राष्ट्र को खंडित करने के प्रयासों के विरुद्ध था। दो प्रधान और दो निशान का निर्णय पं. जवाहरलाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के साथ हुए एक व्यक्तिगत समझौते में स्वीकार किया जिसे दिल्ली समझौता कहते हैं। यह 1952 में हुआ, जबकि अनुच्छेद 370 संविधान के लागू होने के दिन से ही प्रभावी है। मुखर्जी सहित अनेक तत्कालीन राजनेताओं ने दिल्ली समझौते को असंवैधानिक बताते हुए इसका विरोध किया। इसके उत्तर में नेहरू ने भी इसे संवैधानिक नहीं कहा, बल्कि कहा कि जनता की इच्छा संविधान से ऊपर है। उनकी निगाह में जनता की इच्छा वह थी जो शेख अब्दुल्ला चाहते थे।
एक दशक बाद भी इस मुद्दे पर कोई भ्रम नहीं था। 1964 में संसद में प्रकाशवीर शास्त्री द्वारा अनुच्छेद 370 को हटाने संबंधी निजी विधेयक पर बहस में विभिन्न राजनीतिक दलों के 27 वक्ताओं ने भाग लिया।अधिकांश ने अपने-अपने तकोंर् के साथ अनुच्छेद 370 को हटाए जाने की मांग की। इसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हनुमंतैया और भगवत झा आजाद भी शामिल थे। मत विभाजन के समय कांग्रेस की व्हिप के कारण कांग्रेस के संसद सदस्य अनुच्छेद को हटाने के समर्थन में होने के बाद भी इसके विरुद्ध मतदान को विवश हुए। जिन लोगों ने अपने भाषण में इसे हटाने का समर्थन किया और इसके लिए मतदान भी किया, उनमें प्रमुख थे समाजवादी नेता मधु लिमये, राममनोहर लोहिया और वामपंथी नेता हीरेन मुखर्जी आदि। भाजपा का पूर्वावतार जनसंघ तब प्रभावी भूमिका में नहीं था। इसलिए यदि इस मुद्दे पर किसी को स्पष्टीकरण देना है तो वह भाजपा नहीं, बल्कि अन्य दल हैं।
70 के दशक में जब राजनीति को साम्प्रदायिकता की ओर धकेला गया तब मुस्लिमों का संबंध कश्मीर से, कश्मीर का संबंध अलगाव से और अलगाव का संबंध अनुच्छेद 370 से जोड़ने के विघटनकारी प्रयास हुए। वास्तव में यह उत्तर मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार जैसे समाजवादी और सीताराम येचुरी और प्रकाश करात आदि वामपंथी नेताओं को देना है कि उनकी विचारधारा के शीर्षस्थ नेताओं द्वारा अनुच्छेद 370 के विरोध में मतदान किए जाने के बाद वे किन परिस्थितियों में उनके रुख से हटे। साथ ही, क्या आज वे मानते हैं कि लोहिया और हीरेन मुखर्जी का रुख इस मुद्दे पर गलत था?
भाजपा का मत
भाजपा का मत इस मुद्दे पर स्थिर है। अनुच्छेद 370 की आड़ में राज्य में लागू किए गए ऐसे सभी प्रावधान, जो भारत के सभी नागरिकों के संविधानप्रदत्त अधिकारों को सीमित करते हैं अथवा ऐसे सभी प्रावधान, जो पूरे देश के नागरिकों को कुछ सुविधाएं अथवा अधिकार प्रदान करते हैं, किन्तु जम्मू-कश्मीर के नागरिक इनसे वंचित हैं, दोनों ही स्थितियों को बदला जाना चाहिए। देश के सभी नागरिकों को सभी संविधानसम्मत अधिकार मिलने चाहिए, यह सर्वमान्य तथ्य है। अनुच्छेद 370 के नाम पर होने वाले असंवैधानिक कामों की पड़ताल हो और इसके कारण पीडि़त होने वाले लोगों को न्याय मिले। अनुच्छेद अपने-आप में यदि इसके लिए उत्तरदायी है तो भी, इसके बारे में कोई निर्णय लेने से पूर्व इस पर पूरी बहस हो, यह आह्वान स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के पूर्व जम्मू में संपन्न अपनी सभा में किया था।
इसी प्रकार का मामला 'अफस्पा' के संदर्भ में है। किसी क्षेत्र में कानून-व्यवस्था नियंत्रण से बाहर हो गई है, यह स्वीकार कर कोई राज्य जब केन्द्र से सुरक्षा सहायता की मांग करता है तो वहां सैन्यबल तैनात किए जाने और उनको अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए आवश्यक संवैधानिक संरक्षण देने के लिए 'अफस्पा' लागू किया जाता है। यदि राज्य सरकार समझती है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधर गई है और इसके लिए अब सेना की उपस्थिति आवश्यक नहीं है तो जरूरत 'अफस्पा' को हटाने की नहीं, बल्कि स्थिति की समीक्षा कर सेना की उपस्थिति घटाने की है। यह आपसी समझ का विषय है न कि अडि़यल रुख अपनाने का।
राजनीतिक विरोधियों के बीच रुख का यह संघर्ष चल सकता है, किन्तु सत्ता के साझीदारों के बीच नहीं। उन्हें तो मतभेद के ऐसे सभी बिन्दुओं पर सहमति से ही आगे बढ़ना होता है। 50 और 60 के दशक की व्यक्तित्व केन्द्रित राजनीति का बोझ ढो रहे राजनीतिक दलों के लिए अधिक उपयुक्त यह है कि भाजपा को किन मूल्यों पर समझौता करना चाहिए और कहां नहीं, यह निर्णय वे उसके अपने कार्यकर्ताओं पर छोड़ दें और स्वयं इस बात पर चिंतन करें कि वे स्वयं क्यों अप्रासंगिक होते जा रहे हैं।
भारत की वैश्विक भूमिका को ध्यान में रख कर भविष्य की योजना बनाने और अपने सर्वसमावेशी चरित्र को रेखांकित करने की आवश्यकता आज भाजपानीत केन्द्र सरकार के सामने है। इस व्यापक संदर्भ में जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा की बनने जा रही सरकार परस्पर विश्वास और सौहार्द के साथ अपना कार्यकाल पूरा कर सकी तो भारत ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति को स्थिरता देने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है। -आशुतोष भटनागर

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