| दिंनाक: 28 Feb 2015 15:30:25 |
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भारतीय बाङ्मय में फागुन को 'ऋतुराज' बसंत का माह कहा गया है, क्योंकि वह सभी ऋतुओं के मनोभावों को समेट कर चलता है, सभी के लिये अनुकूलता का बोधक है। उसकी गुनगुनाती धूप और मदमाती हवा शीतकाल की ठिठुरन के बाद जब शरीर को स्पर्श करती है तो रसिक जनों के लिये 'प्रेम और श्रृंगार' का मौसम बनता है। दैनिक जकड़न से मुक्ति के बाद चिंतन का वितान विस्तृत होता है, तभी तो ऋषि-मुनिजन 'चलो मन गंगा-जमुना तीर' के साथ पतित पावनी नदियों के तट पर 'कल्पवास' में जाकर चिंतन और उपदेशक का सत्व ग्रहण करते हैं। वैज्ञानिक ऋषि मुनि बारह वर्षों तक प्रकृति के सान्निध्य में रहकर जो आविष्कार करते हैं उसकी सामूहिक चर्चा प्रतिवर्ष माघ मेले में तथा कुम्भ मेले में भी होती है। इसी चिन्तन और मंथन से संसार के सार-असार, उसकी नश्वरता वैज्ञानिक दृष्टि और आत्मज्ञान का दरवाजा खुलता है। तृहरि जैसे तपस्वियों ने श्रृंगार, ज्ञान और वैराग्य का गंभीर चिन्तन शायद इसी वातावरण में किया होगा, जिससे उनके तीनों शतक युग-बोधक बन गये।
यह महत्वपूर्ण है कि मनीषियों ने इस ऋतु को देवी-देवताओं, विचारकों और ज्ञानी पुरुषों से जोड़कर स्मरणीय और अनुपालनीय बना दिया है। बुद्घि के देवता गणेश जी और विद्या की देवी मां सरस्वती से लोकनायक राम के जन्म इसी कालावधि में हए थे। कविवर तुलसी ने 'वन्दे वाणी-विनायकौ' की आराधना से ही रामचरितमानस का मंगलाचरण लिखा था। सरस्वती को यूनान में भी ज्ञान की देवी (मिनर्वा-गौडेस ऑफ लर्निंग) माना गया है। वे कलाओं की अधिष्ठात्री देवी हैं, साहित्य और वाणी की प्रतीक हैं। इसीलिये उनकी संतति को 'सारस्वत' कहा गया है। साहित्य और कला की परम्परा को 'सारस्वत-सम्मान' दिया जाता है। कलाओं के भेद-उपभेदों के सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' के प्रणेता तथा उपदेशक गुरुनानक की जयंती माघ पूर्णिमा को मनाते हैं। माघ के लगभग मध्य से चैत्र की नवरात्रि तक बसंत का विस्तार है, इसीलिये बसंत पंचमी से बासंतिक नवरात्रि तक 'बसंत ऋतु' मानी जाती है। इस अवधि में पड़ने वाला फागुन माह 'फगुनाई' का प्रतीक है। यह रसिकों के लिये इतना उत्प्रेरक है कि एक अवधी कवि ने 'फागुन मां बाबा देवर लागे' कहकर इसे रसिक भावों का मौसम कह दिया है।
ऐसे ही मौसम में चैत्र शुक्ल वर्ष 1898 को जन्मे बुन्देली के एक लोककवि ईसुरी श्रृंगार के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं, किन्तु यह उनका एकांगी परिचय है। वस्तुत: वे भतृहरि की परम्परा में हैं। उनके काव्य में श्रृंगार, ज्ञान तथा वैराग्य तीनों मनोभावों का व्यापक चित्रण है। जिस प्रकार कबीर का रहस्यवाद 'राम की बहुरिया' और 'प्रेम की चादर' से निर्गुण-ज्ञान की परम्परा तक जाता है, वैसा ही ईसुरी के काव्य में भी है। उनकी द्विअर्थी फागों को जो लोग श्रृंगारिक बताते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि उनके अंदर 'आत्मा से परमात्मा के मिलन और ब्रह्मलीनता के लिये' चल उड़ हंसा देश विरानो, का आभास भी है।
यहां यह बताना प्रासांगिक है कि बुन्देलखण्ड के झांसी जिले की मऊ रानीपुर तहसील के ग्राम मेडकी में जन्मे ईसुरी का पूरा नाम ईसुरी प्रसाद तिवारी था। बचपन ननिहाल में पोषित हुआ, आजीविका के लिये जमींदारों के कारिंदा रहे तथा रसिक-सम्बन्धों के कारण छतरपुर नरेश विश्वनाथ सिंह जूदेव के राज्याश्रय प्रस्ताव को भी उन्होंने ठुकरा दिया था। उन्होंने इच्छा की थी कि उनकी मृत्यु भले ही गंगा तट पर हो, चितादाह उनके प्रिय ग्राम बगौरा में हो। ईसुरी रीतिकाल के अंतिम चरण में हुए, इसलिये उनमें श्रृंगार का आधिक्य है तो आचार्यत्व के लक्षण भी हैं। वह 'चौकडिया फाग' नामक छंद के जनक हैं, जो ऐसा लोकप्रिय हुआ कि फागुन के मौसम में गेय फाग-साहित्य में अद्वितीय स्थान पर प्रतिष्ठित हुआ। बुन्देली फाग-काव्य की परवर्ती परम्परा में अधिकांश कवियों ने चौकडि़या छंद में ही फागें लिखीं। उनके अनुभव इतने व्यापक थे, जो युग को दिशा देने तथा दूसरों के मनोभावों को समझने में सहायक थे। तभी तो उन्होंने लिखा है –
हमने परखीं उड़त चिरैंया, कछू अनारी नैंया।
पैले सें हिरदै की जानत, का हौ आप करैंया॥
लोकप्रियता तथा श्रेष्ठता के कारण, उन्हें तुलसी और तानसेन के समक्ष गाथा पुरुष माना जाता है।
रामायन तुलसी कही, तानसेन ज्यांे राग।
सोई या कलिकाल में कहीं ईसुरी फाग।
उनकी फागें गेयता प्रधान हैं। उनके जीवनकाल में ही उनकी फागें उनके शिष्य धीरपण्डा गाते थे, जिन पर बेड़नी जाति की दो बहिनेंं गंगिया और सुन्दरिया 'राई नृत्य' करती थीं। इन फागों के रसिक भावों के साथ नृत्य के कारण 'राई नृत्य' वासना-प्रधान 'बासंतिक नृत्य' के रूप में लोकप्रिय है। ईसुुरी रसमयता तथा सर्वांगता के कारण, लोगों ने यह अनुभव किया कि फागों का सारा रस ईसुरी ने निचोड़कर 'मधु कोष' प्रस्तुत किया, शेष कवियों की फागें मात्र जूठन हैं। एक ग्रामीण कवि ने लिखा है कि-
फागें सुन आये सुख होई, देय देवता मोई।
इन फागन पै फाग न आवैं कइयन करी अनोई।
भौंर भखन कौ उगलन रे गऔ, कली कली कैं गोई।
बस भर ईसुर एक बची ना, सब रस लऔ निचोई॥
अर्थात-ईसुरी की फागें सुनकर सुख मिलता है, ईश्वर मुझे वही सुख देता रहे। अनेक कवियों ने प्रयास किया किन्तु इन फागों के समतुल्य कोई नहीं। जिस प्रकार भौंरा कलियों-कलियों का रस चूस कर औरों को खाने के लिये जूठन छोड़ देता है, उसी प्रकार ईसुरी ने फाग काव्य का समस्त रस निचोड़ लिया है। अन्य फागकारों के लिये कुछ नहीं बचा।
ईसुरी के एक अध्येता डॉ. लोकेन्द्र सिंह नागर के अनुसार देश के जाने-माने साहित्यकार के. एम. मुंशी ने ईसुरी की सभी रचनायें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा सरदार पटेल तक को सुनाई थीं। डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने ईसुरी की फागों से प्रभावित होकर स्वयं कुछ फागें लिखी थीं।
ईसुरी के पास कहने को बहुत कुछ है, अपने श्रोताओं तथा पाठकों को वे पास आने का आमंत्रण देते हैं-
ऐंगर बैठ लैओ कछु कानें, काम जनम भर रानें
बिना काम को कोऊ नैंया, कामें सबखौं जानें।
जौन काम कों जानें नइयां, ती कों करत बहानें।
जो जंजाल जगत कौ ईसुर, करत करत मर जानें॥
अर्थात् हमारे निकट बैठ लो, कुछ कहना है, काम तो जीवन भर रहना है। ऐसा कोई नहीं जिसके पास काम न हो, सबको काम से जाना है। जिस काम को नहीं जाना है उसके लिये बहानेबाजी करता है। यह संसार ईश्वर का जंजाल है जिसमें करते-करते मर भी जाना है इसलिये पास बैठकर कुछ कह सुन लें। तो आइये, ईसुरी के साथ-साथ कुछ बैठ लें, उन्हें सुनें और समझें। श्रृंगार के प्रतिनिधि कवि होते हुए भी उनके काव्य में दर्शन, भक्ति, अध्यात्म, नीति तथा सामाजिक चिन्तन है। सृष्टि की नश्वरता तथा सार-असार का रहस्य है। उनका काव्य वाचिक परम्परा में होने के कारण उसके अनेक पाठभेद मिलना स्वाभाविक है। इस आलेख में अधिकांश उदाहरण मेरी पुस्तक 'बुन्देलखण्ड की फागें,' (प्रकाशक उ. प्र. संगीत नाटक अकादमी) से लिये गये हैं। आइये बात बसंत की फागों से शुरू करें-
अब रितु आई बसंत बहारन, पान, फूल, फल डारन
द्रमत मौर अम्बन के ऊपर लगे भौंर गुजारन।
तपसी तपत कन्दरन भीतर, है बैराग बिगारन,
फैल परे रितुराज ईसुरी, परे बादशा बागन।
अर्थात- अब बसंत ऋतु आ गई है। ऋतुओं के राजा ने राज्य विस्तार कर लिया है- जो बागों, पत्तों, फूल, फल और वृक्ष की डालों पर दिखाई दे रहा है। आम के वृक्षों पर मौर (मंजरी) आ गयी है, उस पर भौरें गुंजार करने लगे हैं। यह पर्वतों की कंदराओं के भीतर भी तपस्वियों के वैराग्य को भंग कर उनका संयम डिगा रहा है।
नायिकायें अपने प्रिय के दरसन हेतु कोई न कोई बहाना ढूंढती हैं। ताकि पनघट पर जाकर मार्ग में प्रिय को देखने का अवसर मिल जाये –
पानी भरन, यार के कारन हर-हर बेरां जानें।
भरौ भराओ लु़ड़का देवें, चांय होय ना चानें।
द्वारे बैठे देख आउत है, कराकर जेई बहानें।
नाँय से जातन जे हंस जावें मांय से वे मुस्कानें॥
अर्थात्- चाहे पानी की जरूरत हों या न हो, नायिका बार-बार पनघट पर जाती है। घर में रखे घड़े का पानी लुढ़का देती है, इसी बहाने द्वार पर बैठे प्रिय को देख आती है। इधर से यह मुस्करा देती है, उधर से वह मुस्करा देते हैं। एक नायिका प्रिय का निरंतर दरस-परस पाने के लिये उन्हें अपनी उंगलियों में छल्ला (अंगूठी) की तरह रखना चाहती है। –
जो कऊंछैल छला हो जाते, परे उंगरियन राते,
मौं पोंछत गालन से लगते, कजरा देख दिखाते।
घरी-घरी घूंघट खोलत में, नजर के सामें राते।
'ईसुर' दूर दरस के लानें, काए को तरसाते॥
अर्थात्- यदि कहीं छैल (प्रिय) अंगूठी (छल्ला) बन जाते तो सदैव अंगुलियों मेंे पड़े रहते, मुंह पोंछते समय गालों में उनका स्पर्श मिलता, अंगुलियों से काजल लगाते समय, नजर के सामने रहते। क्षण-क्षण में घूंघट उठाते समय, उंगलियों में पड़े प्रिय नजर के सामने रहते। दूर से दरसन के लिये क्यों तरसाते? प्रिय का निरंतर सामीप्य चाहने की इससे अधिक सहज-स्वाभाविक कल्पना क्या हो सकती है? इतनी चाहत होने के बाद भी प्रिय को एक दिन जाना पड़ता है, आत्मा को परमात्मा से मिलने, ब्रह्मलीन होने। –
इक दिन होत सबई कौ गौनों, होनों उर ऊनहौनोंं।
जानें परत सासरेंे सबकों, बुरौ लगै चांय नौनों।
आये लिबौआ बौ ना, माने चाँय बता दो सौनों।
'ईसुर' विदा हुये जौ जिदना, पिय के संग चलौनों।
अर्थात्-एक दिन सभी को प्रिय के घर जाना है। वह चाहे या न चाहे। चाहे अच्छा लगे या बुरा। लिवाने वाला (काल) आ गया है, वह नहीं मानेगा, भले ही उसे रिश्वत (सोना) आदि का प्रलोभन दो। जिस दिन विदा होगी, प्रिय के साथ चलना होगा।
ईसुरी की फागों में नश्वरता, रहस्यवाद और आध्यात्मिकता की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है-
बखरी रइयत है भारे की, दई दिया प्यारे की।
कच्ची भीत उठी माटी की, छाई फूस चारे की।
बे-बन्देज, बड़ी बे-बाड़ा, जई में दस-द्वारे की।
एकऊ नईं किवार-किवरियां, बिना कुंजी तारे की।
'ईसुर' चांय निकारो जिदना, हमें कौन वारे की॥
अर्थात् – यह देह प्राण प्यारे (ईश्वर) द्वारा किराये पर दिया गया मकान है। इसमें कच्ची माटी (अर्थात पार्थिव शरीर) की दीवारें उठी हैं, घास-फूस (चारे) से छाई गई हैं अर्थात ऊपर केश हैं। इसमें दस (इंद्रियों के) दरवाजे हैं, कोई चहारदीवारी नहीं है, विस्तृत और अव्यवस्थित है। एक भी किवाड़-किवडि़यंा नहीं हैं, ताले या चाबी भी नहीं है। चाहे जिस दिन चाहो, इससे निकाल दो, हमें कोई लाभ-हानि नहीं है।
उनमें सामाजिकता का बोध है, पर्यावरण की चिन्ता है-
इनमें लगे कुलरिया घालन, मउआ मानस-पालन।
इनैं काटवो नईं चइयततौ काट देत जे कालन॥
ऐसे रूख भूंख के लाने, लगवा दये नंदलालन।
जे कर देत, नई सी 'ईसुर' मरी-मराई खालन॥
अर्थात्- इन वृक्षों को कुल्हाडि़यों से मत काटो, ये महुआ वृक्ष मनुष्यों को पालने वाले हैं, ये कष्ट के दिनों (काल) को काटने वाले हैं। ईश्वर (नंदलाल) ने ऐसे वृक्ष, भूख (क्षुधा-शान्ति) के लिये लगवा दिये हैं। ये वृक्ष (अपनी औषधीय संजीवनी से) मृत-प्राय शरीर को भी नवजीवन प्रदान करते हैं।
उल्लेखनीय है कि बुन्देलखण्ड में महुआ वृक्ष भोजन-कलेवा (आजीविका) का प्रमुख साधन है।
समाज की एक बड़ी विडम्बना है-जरूरी मामलों को लटकाये रखने की। प्रारम्भिक स्तर पर ही समस्या का निदान न होने पर कितने भयंकर परिणाम सामने आते हैं, इसे 'फोड़ा' की अन्योक्ति के माध्यम से व्यक्त किया गया है-
'होगऔ, फुनगुनियां से फोरा, पैलें हतौ ददोरा।
एक की जांगा, भऔ दूसरौ, दो के भये, दो जोरा॥
कोंचा फूट, हतैरी फूटी, फूट गये सब पौरा।
दवा होतरई दरद गऔ ना, एक मास दिन सोरा।
फोरा से भऔ खता ईसुरी, ऐसौ परौ बिलौरा॥
अर्थात्- पहले लालामी लिये सूजन (ददोरा) थी, फिर फुंसी निकल आई, फिर फोड़ा बन गया। पहले एक स्थान पर था (मवाद के रिसाव से) उसी के निकट दूसरा फोड़ा हो गया। फिर दो के चार हो गये। कोंचा में, हथेली में और फिर पोर-पोर (सारे शरीर) में फोड़े फूट आये। लम्बी अवधि तक दवा चलती रही, फिर भी दर्द नहीं गया। फोड़ा से नासूर बन गया, दर्द और बाधाओं का ऐसा घालमेल हुआ।
इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि ईसुरी का चिंतन व्यापक है। हिन्दी साहित्य को जिन लोकभाषायी कवियों ने समृद्घ किया है, उनमें ईसुरी का महत्वपूर्ण स्थान है। जो व्यक्ति ईसुरी को श्रृंगारी, कामुक और अश्लील कवि के रूप में देखते हैं उन्होंने सम्यक् मूल्यांकन नहीं किया। गांव-गलियों की रसभरी बातें होंगी तो लोक-काव्य का खुलापन होगा ही। रसिक, चिन्तक तथा उपदेशक के रूप में उनका काव्य इतना महत्वपूर्ण है कि वे विश्वविद्यालयोंे के उच्च-पाठयक्रमों में हैं। सागर विश्वविद्यालय तो उनके नाम पर शोध स्तरीय 'ईसुरी' पत्रिका का प्रकाशन करता है, उनका पुनर्मूल्यांकन अपेक्षित है।
ईसुरी मित्रता बनाये रखने का आग्रह करते हैं। वह संभलकर दोस्ती करने का परामर्श देते हैं- ऐसी दोस्ती, जिसमें दोनों पक्ष जी भरकर अपने मन की बात कह-सुन सकें।
यारी सदा निभाएं रइयो, करकें जिन बिसरइयो
जैसी राखी हाल दिनन में, ऐसई राखें रइयो।
सुनके बात जिया मोरे की, अपने जी की कइयो।
अबै कछू बिगारौ नईं ईसुर, बांय समर के गइयो। -अयोध्या प्रसाद गुप्त 'कुमुद'