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देवेन्द्र स्वरूप
इससे अधिक हास्यास्पद स्थिति क्या हो सकती है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के जिस निर्णय का एकमात्र उद्देश्य भारतीय संस्कृति परंपरा की वाहक संस्कृत भाषा की रक्षा करना था उसे जर्मन भाषा के विरोध का रंग देकर अन्तरराष्ट्रीय विवाद के क्षेत्र में धकेल दिया गया है। गत 27 अक्तूबर को केन्द्रीय विद्यालय संगठन के बोर्ड की एक बैठक मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। उस बैठक में यह प्रश्न उठा कि भारत सरकार द्वारा संचालित-नियंत्रित 1100 केन्द्रीय विद्यालयों में से 504 विद्यालयों में छठी से आठवीं कक्षाओं के 70,000 छात्रों को त्रिभाषा फार्मूले के अन्तर्गत संस्कृत भाषा के स्थान पर जर्मन भाषा पढ़ाई जा रही है जो त्रिभाषा फार्मूले की मूल धारणा के विरुद्ध है। विषय आने पर प्रश्न उठा कि यह हुआ कैसे? संस्कृत का स्थान जर्मन भाषा को कब, क्यों दिया गया? चर्चा में से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। छह वर्ष पूर्व 2009 में केन्द्रीय विद्यालयों को पांच विदेशी भाषाओं- जर्मन, फ्रेंच, चीनी, स्पेनिश आदि को अतिरिक्त भाषा के रूप में पढ़ाने की छूट दी गई। इस छूट का लाभ उठाकर 29 सितम्बर, 2011 को केन्द्रीय विद्यालय बोर्ड ने जर्मनी की गेटे इंस्टीट्यूट और मैक्समूलर भवन संस्थाओं के साथ एक सहमति पत्र (एम.ओ.यू.) पर हस्ताक्षर कर दिए जिसके अन्तर्गत इन जर्मन संस्थाओं ने केन्द्रीय विद्यालयों के संस्कृत शिक्षकों को अपने खर्चे पर जर्मनी ले जाकर जर्मन भाषा का शिक्षण देने का वचन दिया। इस सहमति पत्र का लाभ उठाकर केन्द्रीय विद्यालयों के सैकड़ों शिक्षक जर्मनी जाकर जर्मन भाषा का शिक्षण प्राप्त कर भारत लौटे और केन्द्रीय विद्यालयों ने उन्हें अनुबंध पर जर्मन भाषा सिखाने के लिए अपने यहां नियुक्त कर लिया। इस स्थिति को संस्कृत शिक्षक संघ नामक संगठन ने चुनौती दी और मई, 2013 में दिल्ली उच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध एक जनहित याचिका दायर कर दी।
लिक्खाड़ों को मिला मसाला
सितम्बर, 2014 में गेटे इंस्टीट्यूट और केन्द्रीय विद्यालय बोर्ड के बीच हस्ताक्षरित सहमति का कार्यकाल समाप्त हो गया। इसीलिए 27 अक्तूबर, 2014 को नई मानव संसाधन विकास मंत्री की अध्यक्षता में केन्द्रीय विद्यालय बोर्ड की बैठक में त्रिभाषा फार्मूला के अन्तर्गत संस्कृत के स्थान पर विदेशी भाषा जर्मन को पढ़ाने का निषेध कर दिया गया। इस निर्णय को लागू करने के लिए मंत्रालय की ओर से 11 नवम्बर, 2014 को आदेश पत्र (सर्कुलर) जारी किया गया जिसे लेकर मीडिया में हो-हल्ला मच गया और इस निर्णय को जर्मन भाषा और उससे भी आगे बढ़कर जर्मन देश का विरोध का रंग दे दिया गया। यह पूरा विवाद शिक्षा के क्षेत्र से हटकर विदेश मंत्रालय के क्षेत्र में पहुंच गया। भारत में जर्मन राजदूत माईकेल स्टीनर ने इसे जर्मन राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जोड़ कर विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से पूछताछ की। इस विवाद का सम्मानजनक हल खोजने को कहा। संयोग से इन्हीं दिनों आस्ट्रेलिया के ब्रिसवेन शहर में जी-20 राष्ट्रों की शिखर बैठक आयोजित थी। उसमें जर्मन राष्ट्रपति अंजेला मार्केल और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मिलने वाले थे। भारत के मीडिया ने खबरें बनाईं कि जर्मन राष्ट्रपति मार्केल इस विषय को भारतीय प्रधानमंत्री से अपनी भेंट में उठाने वाली हैं।
लिक्खाड़ों को मसाला मिल गया और अखबारों में लम्बी रपटें व लेख आने लगे, जिनमें वर्तमान सरकार के इस निर्णय को संकीर्ण दृष्टि का परिचायक बताते हुए भूमंडलीकरण के इस युग में भारतीय बच्चों के दिमागों की खिड़कियां विदेशी भाषाओं की शिक्षा के द्वार खोल देने का उपदेश दिया गया। इस बौद्धिक आक्रमण के विरुद्ध हमारे मानव संसाधन मंत्री की ओर से जो स्पष्टीकरण आया वह मात्र इतना था कि केन्द्रीय विद्यालय बोर्ड ने अपनी अधिकार सीमा के बाहर जाकर मंत्रालय की पूर्व सहमति प्राप्त किए बिना ही विदेशी संस्थाओं के साथ यह सहमति पत्र तैयार कर लिया। अत: यह सहमति पत्र गैर-कानूनी है। दूसरे त्रिभाषा फार्मूले का उल्लंघन है क्योंकि उसमें किसी भारतीय भाषा की जगह विदेशी भाषा को पढ़ाने का प्रावधान नहीं है। जर्मन या किसी भी अन्य विदेशी भाषा को एक अतिरिक्त भाषा के रूप में पढ़ाया जा सकता है, त्रिभाषा फार्मूला के अन्तर्गत नहीं।
जर्मन भाषा की वकालत
क्या सचमुच मानव संसाधन मंत्री को यह जानकारी नहीं दी गई कि 11 सितम्बर, 2011 को यह सहमति पत्र केन्द्रीय विद्यालय संगठन के आयुक्त और गेटे इंस्टीट्यूट-मैक्समूलर भवन के क्षेत्रीय निदेशक के बीच हस्ताक्षरित हुआ था और उस समय मानव संसाधन राज्यमंत्री ई.अहमद तथा जर्मन फेडरल फोरेन ऑफिस के राज्यमंत्री कार्नेलिया पाईपर मौजूद थे। अर्थात् उस समय के मानव संसाधन मंत्रालय की जानकारी में यह सहमति पत्र तैयार किया गया। (इंडियन एक्सप्रेस, 19 नवम्बर, 2014)। उसके एक दिन पहले 18 नवम्बर, 2014 के इंडियन एक्सप्रेस में पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने संस्कृत भाषा के स्थान पर जर्मन भाषा की शिक्षा देने पर सहमति पत्र की वकालत करते हुए गर्वोक्ति की है कि आज के भूमंडलीकृत विश्व में बच्चों को विदेशी भाषाएं सीखने की बहुत आवश्यकता है। श्री सिब्बल ने वर्तमान भारत सरकार को एक विशिष्ट संकीर्ण विचारधारा का प्रतिनिधि बताया है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आपका इशारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर है तो उन्होंने बड़े लालबुझक्कड़ी अंदाज में उत्तर दिया कि मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता किंतु इस सरकार की नीतियों और नियुक्तियों में वह छाप बहुत स्पष्ट है। एक कदम और आगे बढ़कर उन्होंने दावा किया कि केन्द्रीय विद्यालयों में जर्मन भाषा को पढ़ाने का निर्णय दो समाजों में एकात्मता स्थापित करने की भावना से प्रेरित है। कपिल सिब्बल के ये उद्गार राष्ट्रहित और भारत-जर्मनी संबंधों के इतिहास के प्रति अज्ञान का सूचक हैं। शायद उन्हें यह इतिहास पता नहीं है कि 18वीं शताब्दी में जब जर्मनी नामक राष्ट्र अनेक छोटे-छोटे राज्यों में बिखरा हुआ था और फ्रेंच भाषा यूरोप की सबसे विकसित और समृद्ध भाषा के रूप में फ्रांसीसी विस्तारवाद का वाहक बनी हुई थी उस समय संस्कृत भाषा और भारतीय ज्ञान भंडार की गोद में बैठकर जर्मन राष्ट्रवाद ने एक बौद्धिक आंदोलन को जन्म दिया था। जर्मन बौद्धिकों ने संस्कृत भाषा का गहन अध्ययन कर भारत के ज्ञान भंडार में गोते लगाए थे। एक जर्मन प्राच्यविद् हेनरिक हेग ने लिखा था, ' जब फ्रांस, हालैंड और इंग्लैंड आदि देश भारत से जहाजों में भरकर भौतिक संपदा ला रहे हैं, तब हम जर्मनवासी भारत से ज्ञान और दर्शन का खजाना ला रहे हैं, हमें इससे अधिक कुछ नहीं चाहिए।' ग्रिम्स बंधुओं ने 1812 में एक ग्रिम्स लॉ बनाकर जर्मन भाषा को संस्कृत भाषा के सांचे में ढालने की व्यवस्था की। यह बोध जर्मन राजदूत स्टीनर को तो है पर भारत के पूर्व मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को नहीं है। जर्मन राजदूत स्टीनर के लेख (इंडियन एक्सप्रेस, 19-11-2014) को उन्हें पढ़ना चाहिए।
हम सिब्बल साहब से तो यह कहने की गुस्ताखी नहीं कर सकते कि वे लगभग पचास वर्ष पूर्व 2 अप्रैल, 1972 के पाञ्चजन्य में प्रकाशित 'संस्कृत के गर्भ से जन्मा जर्मन राष्ट्र' शीर्षक लेख पढ़ंे क्योंकि वह लेख तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक के ही एक संकीर्ण मस्तिष्क से निकला है। किंतु वह प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। सिब्बल साहब का दिमाग तो हर क्षण भूमंडलीकरण के धरातल पर उड़ता है इसलिए वे 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' जैसे वाक्यों का उद्घोष करने वाली संस्कृत भाषा को महत्व क्यों देंगे?
राष्ट्रीय एकता पर कुठाराघात
पर, क्या भूमंडलीकरण के जोश में सिब्बल साहब राष्ट्रीय एकता की जड़ों पर भी कुठाराघात करना आवश्यक समझते हैं? क्या उन्हें मालूम नहीं कि त्रिभाषा फार्मूले का इतिहास क्या है? भारत की भाषायी विविधता में से उपजी भाषायी प्रतिस्पर्धा को शांत करने और राष्ट्रीय एकता की आधारभूमि तैयार करने के लिए ही त्रिभाषा फार्मूले का आविष्कार हुआ था। उस समय स्वाधीन भारत ब्रिटिश दासता की प्रतीक अंग्रेजी भाषा की जगह किसी एक भारतीय भाषा को पूरे देश की सम्पर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहता था। हिन्दी के पक्ष में संख्याबल के साथ-साथ उन्नीसवीं शताब्दी से स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा भी थी। हिन्दी आंदोलन का जन्म हिन्दी भाषी क्षेत्रों में नहीं, बंगाल, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे अहिन्दी भाषी प्रांतों से हुआ था। बंगाल के राजेन्द्र लाल मित्रा, केशवचन्द्र सेन, भूदेव मुखोपाध्याय एवं नवीन चन्द्र दास जैसे मनीषियों ने ही हिन्दी को भारत की संपर्क भाषा का गौरव प्रदान किया। स्वामी दयानंद ने देवनागरी लिपि को मराठी भाषा के लिए लागू किया, किंतु स्वाधीनता मिलने के बाद भाषा का प्रश्न राष्ट्रीयता से अधिक रोटी-रोजी और नौकरी का विषय बन गया। क्षेत्रीय भाषाओं के साथ जन्मे अहिन्दी भाषियों को लगा कि यदि अंग्रेजी को हटाकर हिन्दी को वह स्थान दे दिया गया तो हमारे लोग नौकरियों की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएंगे। उन्होंने प्रश्न उठाया कि हम ही हिन्दी क्यों सीखें, हिन्दी वाले हमारी भाषा क्यों न सीखें? यह मांग बिल्कुल न्यायोचित थी। इसका आदर करने के लिए ही त्रिभाषा फार्मूले का जन्म हुआ जिसमें 8वीं कक्षा तक हिन्दी और अंग्रेजी को अनिवार्य भाषाओं के साथ-साथ किसी भी एक क्षेत्रीय भाषा-विशेषत: किसी दक्षिण भारतीय भाषा को सीखने का आग्रह किया गया। 1968, 1986, 1992 आदि वर्षों में लागू की गयीं राष्ट्रीय शिक्षा योजनाओं में इस फार्मूले को स्थान मिला।
इसके साथ ही, स्वाधीनता आंदोलन के तिलक, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, गांधीजी, श्री अरविंद आदि सभी मनीषियों का आग्रह था कि संस्कृत इन सब क्षेत्रीय भाषाओं की जननी है, हमारे आत्मबोध को जाग्रत करने वाले प्राचीन वांगमय का प्रवेशद्वार तो संस्कृत भाषा ही हो सकती है। गांधीजी कहा करते थे कि प्रत्येक भारतवासी को संस्कृत भाषा सीखनी ही चाहिए। उनका कहना था कि मुस्लिम और ईसाई बच्चों को भी संस्कृत की शिक्षा देना आवश्यक है। गांधी जी ने 1930 में कारागृह में सरदार पटेल आदि सभी सहयोगियों को संस्कृत पाठन के लिए प्रेरित किया। महादेव भाई की डायरी और गांधीजी के पत्राचार में यह कहानी सुरक्षित है। संस्कृत की जगह जर्मन भाषा को बैठाने वाले मस्तिष्कों को न भारत के इतिहास का बोध है, न राष्ट्रीय एकता की चिंता है। स्वदेशी जड़ों से उखड़कर भूमंडलीकरण के गगन में उड़ना ही उनकी दृष्टि में प्रगति और महानता का लक्षण है।











