| दिंनाक: 23 Aug 2014 15:11:24 |
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भारत में संस्कृति, परंपरा और पर्यावरण की विविधताओं के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में सैकड़ों वनवासी समुदाय निवास करते हैं। उनकी आर्थिक व्यवस्था अपने स्थानीय, सामाजिक, सांस्कृतिक, सांस्थनिक और तकनीकी अस्तित्व के साथ सामूहिक प्रयास में दिखाई देती है। इन्हीं के माध्यम से वे भौतिक और सामाजिक सरोकारों को प्राप्त करते हैं। जो कि प्रतिस्पर्द्धा की बजाय सहकारी ज्यादा दिखाई पड़ते हैं।
जिस पर्यावरण और पारिस्थितिकी में ये समुदाय रहते हैं उनमें परस्पर संवाद और उसका अभ्यास होता है जिस कारण वे आगे बढ़ते हैं। वनों के प्रति उनका बहुत अच्छा संबंध रहता है, उनके लिए वन किसी आराध्य से कम नहीं हैं।
कई वनवासी समुदायों का वनों के साथ आत्मीय संबंध होता है। वे केवल अपने आवश्यकताओं और अनिवार्यता के लिए ही वनों से संग्रह करते हैं, वे इससे ज्यादा कुछ नहीं लेते। वे भूमि को कभी वस्तु के रूप में बिक्री का साधन नहीं मानते। उनके बीच में व्यक्तिगत भूमि वितरण नहीं होता। वनवासी समुदाय में व्यक्तिगत स्वामित्व एक नई घटना है। इसके बाद भी वे उसे वस्तु के बजाय व्यावहारिक लक्ष्य की व्यवस्था की प्रतीक के रूप में मानते हैं। इनमें कई अपनी जीविका मिश्रित वन संसाधनों, कृषि और कभी-कभी वेतनभोगी मजदूर के रूप में चलाते हैं। उनकी कृषि बंटवारे के सिद्धांत पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए वे परस्पर एक-दूसरे की शारीरिक श्रम रूप में सहायता करते हैं- बीज बोने के रूप में, निराई-गोड़ाई, फसल कटाई, बीज बंटाई, ज्ञान बांटने और एक दूसरे से खेती संबंधी निर्णय इत्यादि पर राय मशविरा करने में करते हैं। अधिकतर यहां का खेती कार्य सामूहिक प्रयत्न का परिणाम होता है।
वनवासी समुदाय के लोग भूमि और वन देवों की पूजा करते हैं। मध्य भारत के कई भागों में वन देवता और वन देवी की आराधना प्रचलित है। जब शाल का फूल फलता है तो वे जो त्योहार मनाते हैं वह चैत्र पर्व कहलाता है। इसी प्रकार कृषि का मौसम शुरू होने से पहले वे धरती की धरणी देवी के रूप में पूजा करते हैं। बीज बोने से पहले वे प्रकृति देवी को बीज समर्पित करते हैं। यह पर्व विहान पर्व के रूप में मनाया जाता है। वे अपनी पहली फसल को प्रकृति देव और देवी को समर्पित करते हैं। उदाहरण के लिए ग्रामीण अरहर की दाल का उपयोग तभी करते हैं जब वे इसे कण्डूला पर्व के दिन प्रकृति को समर्पित करते हैं। वनवासी समुदाय के लोग महसूस करते हैं कि मानव समाज को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर रहना चाहिए। इसे प्रकृति का दोहन और संरक्षण सभी की भलाई के लिए करना चाहिए। सामूहिक और सामाजिक रूप से एकजुट होकर खेती करने की वनवासी समुदाय की परंपरा का आधुनिक, रासायनिक, कृषि प्रणाली ने बहुत प्रभावित किया है। अब आपसी संवाद कम हो गया है, जिसके कारण आपस में दूरियां बढ़ रही हैं।
स्वदेशी प्रणाली पर आधारित मिश्रित फसल वाली कृषि सबके लिए भोजन और पौष्टिक सुरक्षा उपलब्ध करवाने में सफल रही है। इसके बावजूद इसमें बदलाव लाया जा रहा है। तर्क यह दिया जाता है कि यदि एक फसल खराब हो जाती है उसकी जगह दूसरी का विकल्प अनिवार्य हो जाता है। और किसान भी कई प्रकार की फसलों की किस्मों के उत्पाद की ओर आकृष्ट हो जाते हैं। अब यह पूर्वानुमान लगाया जाता है कि जैव विविधता पर्यावरण के लिए ज्यादा खतरनाक होगी जोकि मानव जनित ऋतु परिवर्तन के कारण हो रहा है। जैसे-जैसे अलग-अलग प्रजाति और किस्म की फसलें एक ही खेत में उत्पन्न होंगी तो यह पारिस्थितिकी और पर्यावरण के साथ-साथ किसानों के लिए भी अहितकारी सिद्ध होगी। आज परंपरागत मिश्रित खेती प्रणाली ने आधुनिक रूप ले लिया है। शायद इसी कारण आज बीटी कॉटन, रासायनिक कीटनाशक और रासायनिक खाद खेती के रूप में कृषि को खत्म कर रही है। क्योंकि खेती की यह परंपरागत विविधता का स्थान आधुनिक विविधता ने दिया जिस कारण वनवासी समुदाय को बहुत अधिक फसल खराब होने का खूब अनुभव मिल गया है। उदाहरण के लिए उड़ीसा में अधिक बारिश ने पिछले तीन वर्षों में कृषि के अभियान को बुरी तरह प्रभावित किया है। स्थानीय कृषक अपने खेतों को मई के अंतिम सप्ताह में पहली वर्षा में जोत रहे हैं। अब वर्षा 3-4 सप्ताह देर से आ रही है। इसी प्रकार वर्षा एक महीने देरी से फूलों के उत्पादन को ध्वस्त कर रही है। इस ऋतु परिवर्तन ने उनके भोजनतंत्र को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है।
भारत में सौ मिलियन लोगों को भोजन उपलब्ध कराने में वन प्रत्यक्ष स्रोत हैं। वनों से फलों और जड़ों के साथ वनस्पतियां, कीट, पक्षी, मशरूम और बांस इत्यादि प्राप्त होते हैं। वन ही जल के परंपरागत महत्वपूर्ण स्रोत रहे हैं। ये सूखे को दूर करते हैं।
हमारे कुल भोजन में लगभग 37 प्रतिशत, 30 प्रतिशत और 45 प्रतिशत योगदान गैर कृषि खाद्यान्नों का होता है। यह विविधता और मात्रा दोनों ही रूप में है। आज वाणिज्य वृक्षारोपण, मोनो संस्कृति, औद्योगिक और अन्य विकासात्मक गतिविधियों के कारण वनों की जैव विविधता निरंतर सिकुड़ रही है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार को सूचना के अधिकार के तहत पूछे गये आंकड़े के अनुसार देशभर में वनभूमि को प्रतिदिन 135 हेक्टेयर (लगभग 333 एकड़) बढ़ाया गया। वर्तमान में भूमि उपयोग और वन नीति खाद्य सुरक्षा नीति से मेल नहीं खाती। वन विभाग वास्तविक मूल्य की उपेक्षा कर हमेशा वृक्षारोपण पर ही जोर देता है। जबकि यह सत्य है कि भारत में वन पर आधारित परंपरागत खेती के माध्यम से पौष्टिक खाद्यान्नों की प्राप्ति होती है, रासायनिक खेती नहीं। उस परंपरागत स्वावलंबन और गौरव को केवल वनवासी समुदाय ही समझता आया है और आज भी रासायनिक खेती से बचाने के लिए उसी मार्ग पर जाने को तत्पर है।
हाल ही में खाद्य सुरक्षा के लिए वन विषय पर आयोजित सम्मेलन में यह बात वनों की महत्ता और इनसे जुड़े खाद्यान्नों पर महत्वपूर्ण ढंग से उभरकर आयी लाखों लोगों की सुरक्षा के लिए पौष्टिक भोजन के रूप में वनों पर आधारित खाद्यान्न बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसे संकट के दौर में जब रासायनिक खेती समूची दुनिया में संकट का प्रतीक मानी जाने लगी है। भारत का वनवासी समुदाय अपनी परंपरागत मिश्रित खेती का पुनरोदय करते हुए बदलते ऋतु परिवर्तन में भी अपने अस्तित्व को बचाए रखना चाहता है। वे अभी भी 53 से अधिक गैर फसलों का और 150 से भी अधिक विभिन्न किस्मों के अनाजों का उत्पादन कर रहे हैं।
उनकी फसलों को इन रासायनिक बीजों या उर्वरकों की आवश्यकता नहीं है। उन्हें यदि समय पर उचित खाद और पानी उपलब्ध हो जाए ते किसी सहारे की आवश्यकता नहीं। और ये सकारात्मक कृषि प्रणाली को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। अब वरिष्ठ ग्रामीणों ने युवाओं को भी सामाजिक, सांस्कृतिक तरीके से वनों के साथ जोड़ना प्रारंभ कर दिया है। परंपरागत वन आज भोजन, त्योहार व भोजन संस्कृति के आयोजन बन गए हैं। वनवासी समुदाय ने भूमि, वृक्ष, पशु और वन के साथ संबंध बनाते हुए पारिस्थितिकी संतुलन में निभाना शुरू कर दिया है। उन्होंने अनुपयोगी भूमि में भी वनों का संरक्षण करते हुए संवैधानिक और वैधानिक तरीके से वन अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत मान्यता प्राप्त कर ली है।
इस परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि जिस समाज ने स्वयं को भूख और कुपोषण के कारण बदतर कृषि प्रणाली के चलते अभाव झेले थे, अब वह पर्यावरण और पारिस्थितिकी का संतुलन बनाते हुए इन संसाधनों को अपनी खाद्य संस्कृति के लिए एक विशेष उपहार के रूप में आगे बढ़ा रहा है। ये छोटे समुदाय हमारे पूरे देश के लिए इस मायने में अनुकरणीय सिद्धहो
सकते हैं। -देवजीत षडंगी
लेखक वनवासी कल्याणकारियों में संलग्न कृषि विशेषज्ञ हैं