| दिंनाक: 23 Aug 2014 14:39:11 |
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15 अगस्त 1947 को राजनीतिक सत्ता के हस्तांतरण के 68 वर्ष बाद इस बार लालकिले की प्राचीर पर स्वाधीनता दिवस समारोह में पुरानी लीक से हटकर जो नयी परंपराओं को नये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनाया, क्या उनके द्वारा वे संदेश देना चाहते हैं कि भारत की राजनीतिक संस्कृति में गुणात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया का श्रीगणेश हो गया है? एक लिखित उबाऊ भाषण में सरकारी योजनाओं की उपहार वर्षा करने के बजाए उन्होंने सत्तर मिनट के धाराप्रवाह भाषण में आम जनता की आम भाषा में रोजमर्रा की समस्याओं की चर्चा करके जनभावनाओं के साथ तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास किया और उन समस्याओं को हल करने की पूरी जिम्मेदारी सरकार के कंधों पर छोड़ने के बजाए समाज एवं उसके द्वारा निर्वाचित जन प्रतिनिधियों का सहयोग आमंत्रित किया। हर विद्यालय, हर घर में महिलाओं के लिए शौचालय के निर्माण को नारी सशक्तिकरण की समस्या से जोड़ कर उन्होंने प्रत्येक सांसद का अपनी एक वर्ष की सांसद निधि अपने क्षेत्र के प्रत्येक विद्यालय में शौचालय के निर्माण में खर्च करने का आवाहन किया। उन्होंने प्रत्येक जिले में एक आदर्श गांव के निर्माण का दायित्व भी सांसदों और विधायकों के कंधों पर डाला। सोवियत रूस के अनुकरण पर नेहरू द्वारा स्थापित राष्ट्रीय योजना आयोग को खत्म करके राज्यस्तर पर विकास की योजनाएं बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ करके उन्होंने सत्ता केन्द्रित नेहरू युग की समाप्ति की घोषणा कर दी। योजना आयोग का विकल्प क्या हो, इस बारे में नागरिकों के सुझाव आमंत्रित करके राष्ट्र निर्माण की दिशा में समूचे लोकतंत्र को सोचने के लिए प्रेरित किया। 'सबका साथ, सबका विकास' घोषणा का व्यावहारिक रूप देश के सामने रखा।
सच्चे लोकतंत्र की झलक
पिछले कुछ दशकों से स्वाधीनता दिवस का भाषण करते समय प्रधानमंत्री और श्रोताओं के बीच जो बुलेट प्रूफ बाड़ा खड़ा किया जाता था वह इस बार प्रधानमंत्री के आग्रह पर ठीक समय पर हटाना पड़ा ताकि विश्व को यह संदेश मिल सके कि सच्चे लोकतंत्र में अपने प्रतिनिधियों की सुरक्षा का दायित्व केवल सेना पर नहीं तो समूचे लोक ने संभाल रखा है। लोक स्वयं अपने तंत्र का सुरक्षा कवच है। भाषण समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री स्वयं सुरक्षा घेरे से बाहर निकल कर बच्चों के पास गये, उनके साथ हंसे-खेले। यह राष्ट्र के बच्चों के लिए एक आह्लादकारी क्षण था। स्वाधीनता दिवस के कार्यक्रम में अपने को लाया जाना उनके लिए दंड नहीं पुरस्कार बन गया।
इन नयी परंपराओं से सही संदेश गया। केवल राजनेताओं और उनसे बंधे बुद्धिजीवियों के एक छोटे से वर्ग को छोड़ दें तो प्रत्येक स्तंभलेखक और टीवी एंकर ने इस नयी शुरुआत का अभिनंदन किया। 'सबका साथ, सबका विकास' नारा भारतीय लोकतंत्र का नया सूत्र वाक्य बन गया। पर इसके साथ ही यह प्रश्न भी दिमागों में घूमने लगा कि भावी विकास का हमारा चित्र क्या रहेगा? प्रधानमंत्री मोदी ने प्रत्येक जिले में जिस आदर्श गांव को बनाने का आह्वान किया है वह गांव कैसा होगा? क्या गांधी के सपनों का? क्या रालेगणसिद्धि में अण्णा हजारे के प्रयत्नों में से निकला गांव? या नानाजी देशमुख के 'हर हाथ को काम, हर खेत को पानी' नारे पर आधारित गांव?
केवल भारत ही नहीं, समूचे विश्व के सामने यह प्रश्न मुंहबाये खड़ा हुआ है कि सभ्यता का भावी रूप क्या रहे? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में 'डिजिटल इंडिया' शब्द का उल्लेख किया। 'डिजिटल इंडिया' का अर्थ मैं समझ पाया हूं, ऐसा भारत जो कम्प्यूटर और मोबाइल से पूरी तरह जुड़ा होगा, जिसमें बुलेट ट्रेन चलेगी। मोदी जी ने जिन एक सौ 'स्मार्ट' नगरों की स्थापना की कई बार चर्चा की है, वे भी हमारी कल्पना को उसी दिशा में दौड़ाते हैं। इन शहरों का चित्र क्या रहेगा, यह समझना कठिन नहीं है। नरेन्द्र मोदी चाहते हैं कि भारत उत्पादन का केन्द्र बने और भारत में बना माल पूरी दुनिया के बाजारों पर छा जाए। वे चाहते हैं कि भारत में निर्मित माल को किसी दोष के कारण वापस न आना पड़े किंतु साथ ही उस माल से पर्यावरण को कोई नुकसान भी न पहुंचे। उत्पादन के लिए हाथ चाहिए, इससे भारत के बेरोजगार हाथों को काम मिलेगा पर आधुनिक शैली की उत्पादन प्रक्रिया के लिए विशेष प्रकार की कुशलता अर्जित करनी होगी। इसी कुशलता के लिए आजकल 'स्किल' शब्द प्रचलित हो गया है। हमें 'स्किल्ड लेबर' चाहिए। वैसी 'स्किल्ड लेबर' बनाने के लिए विशेष प्रकार की शिक्षा प्रणाली चाहिए। यहां सवाल खड़ा होता है तकनालॉजी का। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर तकनालॉजी हावी होती जा रही है। हम उससे बचना चाहते हैं, कभी-कभी हम उसके खतरों को देखते हैं पर महानगरीय सभ्यता की आवश्यकताएं हमें उस तकनालॉजी को अपनाने को मजबूर कर देती हैं। उसने हमें खंडित व्यक्तित्व का बना दिया है।
गांधी जी का ग्राम स्वराज
गांधी जी ने 1909 में हिन्द स्वराज लिखा। उसमें पश्चिम की मशीनी सभ्यता को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। उस छोटी सी पुस्तिका के अंत में उन्होंने लिखा, 'हमें न रेलवे चाहिए, न डाक्टर, न वकील।' वे शब्दों के धरातल पर इस चित्र पर अंत तक डटे रहे। अक्तूबर 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद सत्ता हस्तांतरण की संभावना स्पष्ट हो जाने पर उन्होंने अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर सूचित किया कि 'मैं हिन्द स्वराज के चित्र पर आज भी अडिग हूं।' जवाहरलाल नेहरू से उनकी बहस लगातार चलती रही कि आधुनिक तकनालॉजी का हम क्या करें? जवाहर लाल पूछते थे कि गांधी जी, हमें तकनालॉजी के किस बिन्दु पर वापस लौटाना चाहते हैं? क्या बैलगाड़ी के युग में? क्या रेलवे के युग में? या उड़ने वाले विमानों के युग में? इस बहस का कोई अंतिम समाधान गांधी जी भी प्रस्तुत नहीं कर पाए। उन्होंने ग्राम स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य बनाया, ग्राम सुधार को अपने रचनात्मक कार्यक्रम का अभिन्न अंग बनाया, पर उनके इन अथक प्रयासों में से क्या आदर्श ग्राम का कोई नमूना देश और विश्व के सामने खड़ा हो पाया?
नानाजी की संकल्पना
मुझे स्मरण आता है कि नानाजी देशमुख के मस्तिष्क में चित्रकूट में एक ग्रामोदय विश्वविद्यालय खड़ा करने का संकल्प उदित हुआ। वे चाहते थे कि उस विश्वविद्यालय से निकले छात्र शहर की ओर भागने के बजाए ग्राम में ही अपना जीवन व्यतीत करें। इसके लिए वे स्नातक स्तर से शिक्षा आरंभ करने की प्रचलित परिपाटी से अलग हटकर एक ऐसा विश्वविद्यालय खड़ा करना चाहते थे जो पूरी तरह आवासीय होगा, जहां शिक्षा का आरंभ नर्सरी कक्षा से होगा और जहां पूरी तरह ग्रामीण परिवेश में छात्रों का पालन पोषण और शिक्षण होगा। ऐसे अनोखे विश्वविद्यालय की रूपरेखा तैयार करने के लिए उन्होंने 1990 में चित्रकूट में दो दिन की एक संगोष्ठी आयोजित की, जिसमें प्रो.राजेन्द्र सिंह और हो.वे.शेषाद्रि जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ देश भर के प्रमुख रचनात्मक कार्यकर्त्ताओं को बुलाया गया था। पहले सत्र का विषय था, 'आदर्श ग्राम कैसा हो?' प्रश्न उठा कि इस विषय को कौन रखे? सौभाग्य से संगोष्ठी में तमिलनाडु के एक वयोवृद्ध गांधीवादी कार्यकर्त्ता भी पधारे थे, जिनका नाम इस समय मुझे स्मरण नहीं है। वे लगभग पचास वर्षों से गांधी जी के आदर्शों पर आधारित ग्राम पुनरर्चना के काम में लगे हुए थे।
नानाजी ने सोचा कि आदर्श ग्राम का चित्र उनसे अच्छा कौन रख सकेगा? उन्होंने मुझे आदेश दिया कि मैं उनसे विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करूं कि वे इस विषय को प्रस्तुत करें। मेरी प्रार्थना को सुनकर वे असमंजस में पड़ गये। उन्होंने कहा, मुझे धर्म संकट में क्यों डालते हो? ऐसा आदर्श ग्राम है कहां? मैं पचास साल तक इस दिशा में प्रयास करके यह कहने की स्थिति में नहीं हूं कि मैं ऐसा कोई गांव खड़ा कर पाया हूं। मैं अपने अनुभव बांट सकता हूं और वही उन्होंने किया। कुछ वर्ष बाद अण्णा हजारे के गांव रालेगण सिद्धि का नाम प्रकाश में आया। फौज से लौटकर अण्णा जी ने अपने गांव में नशाविहीन, व्यसन विहीन और 'हर हाथ को काम' का चित्र खड़ा करने का जो प्रयास किया उसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रचनात्मक दृष्टि को आकर्षित किया। संघ कार्यकर्त्ताओं की एक टीम वहां गयी। अण्णा जी की कल्पनाओं और कार्यशैली का सूक्ष्म अध्ययन किया। उस अध्ययन के आधार पर तत्कालीन सरकार्यवाह स्व.हो.वे.शेषाद्रि ने 'एक कर्मयोगी का गांव' पुस्तक लिखी। संघ ने स्वयं भी ग्राम विकास कार्यक्रम की देशव्यापी योजना बनायी। प्रत्येक विभाग में एक आदर्श गांव खड़ा करने के लिए कार्यकर्त्ताओं को लगाया। उस महत प्रयोग के अनुभव लिखित रूप में प्रकाशित हुए या नहीं, इसकी मुझे जानकारी नहीं है। संघ के एक पुराने कार्यकर्त्ता, श्री गोविंदाचार्य ने इस दिशा में बहुत अध्ययन व चिंतन किया है। जगह-जगह रचनात्मक काम में लगे जमीनी कार्यकर्त्ताओं को एकत्र लाकर उनके अनुभवों का निष्कर्ष निकालने की कोशिश भी की है।
पर लगता है इस बहस का कोई अंत नहीं है। यह बहस केवल भारत तक सीमित नहीं है, पूरे विश्व में चल रही है। मनुष्य की पहली चिंता है दुखों से मुक्त लम्बी आयु को जीना। यही चिंता देश, काल और प्रतिकूल मौसम पर विजय पाने वाले उपकरणों के आविष्कार की दिशा में उसे प्रवृत्त करती है। इन उपकरणों की खोज और निर्माण की प्रक्रिया ही तकनालॉजी है। तकनालॉजी हमारी सुख-सुविधा का उपकरण है, जो हमारे न चाहते हुए भी हमारी जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा बन जाता है। मोबाइल और कम्प्यूटर इसके उदाहरण हैं। हम जानते हैं कि इन उपकरणों की उत्पादन प्रक्रिया पर्यावरण नाशक है। मानव की बौद्धिक, मानसिक शक्तियों को क्षीण करती है, किंतु हम उनसे अलग रहकर जीने की कल्पना नहीं कर पाते।
तकनालॉजी का अंत कहां?
1972 में 'क्ल्ब ऑफ रोम' द्वारा डेनिस मीडोण के मार्गदर्शन में आयोजित कम्प्यूटर अध्ययन ने भविष्यवाणी की थी कि जनसंख्या वृद्धि, उपभोक्ता वस्तुओं की आवश्यकता और उत्पादन, उनके उत्पादन से जल, थल और वायु प्रदूषण में वृद्धि, प्राकृतिक संसाधनों का हृास और धरती की उर्वरा शक्ति के क्षीण होने की वर्तमान गति बनी रही तो सन् 2021 में सभ्यता के वर्तमान चक्र का समूल उच्चाटन अवश्यंभावी है। तभी से पर्यावरण रक्षा और सभ्यता को बचाने की बहस जारी है, किंतु यह बहस तकनालॉजी की रफ्तार को कुंठित नहीं कर पायी है। वह दिन दूनी-रात चौगुनी गति की दौड़ रही है। इसलिए अब इस विषय पर चर्चा निरर्थक लगने लगी है।
क्या हम यह मान लें कि सभ्यता के इस चक्र का विनाश अपरिहार्य है? यदि ऐसा है तो क्यों न हम तकनालॉजी के विमान पर सवार होकर उस विनाश के बिंदु पर जल्दी से जल्दी पहुंचने का प्रयास करें क्योंकि हमारे पुराणों के अनुसार सभ्यता के एक चक्र के विनाश के बाद ही अगला चक्र प्रारंभ हो सकेगा? अर्थात कलियुग के बाद ही सत्युग का आना संभव है। क्यों न हम स्वयं को मिटाकर सत्युग को निमंत्रण दें? देवेन्द्र स्वरूप