| दिंनाक: 19 Aug 2014 12:33:14 |
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अगर इस समय भारत में दो विचारधाराओं में परस्पर संघर्ष हो रहा है तो संघर्षरत उन दो विचारधाराओं के नाम हैं, हिंदुत्ववादी विचारधारा और पश्चिमपरस्त भारत-विमुख विचारधारा। दोनों विचारधाराओं में परस्पर संघर्ष जिन अनेक मूल्यों, अनेक विचार-सरणियों एवं जीवन-मानकों को लेकर चल रहा है उसके बीच में हिंदू खड़ा है। हिंदुत्ववादी विचारधारा हिंदू को भारत का केंद्रबिंदु मान कर चलती है, तो पश्चिमपरस्त भारतविमुख विचारधारा भारत के बारे में सोचते वक्त हिंदू को नकार कर चलती है, उसका मजाक उड़ाते हुए चलती है, या फिर उसका घनघोर विरोध करते हुए चलती है। यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि फिलहाल बुद्घिजीवी कहे जाने वाले तत्वों में हिंदुत्ववादी विचारधारा लगभग पराजित हुई पड़ी है। जबकि उसके अलावा भारत के संपूर्ण जनसामान्य में हिंदुत्व न केवल स्वीकार्य है, बल्कि सारा देश उसी भावना के आधार पर चलता भी है।
अगर सारा देश हिंदुत्व के आसपास ही अपना जीवन चला रहा है, अगर सारे देश के मन और भावनाओं में हिंदू संस्कार वैसे ही बसे हैं जैसे पानी में ठंडक और आग में तपिश बसे रहते हैं, तो फिर प्रश्न यह है कि इस देश का बुद्घिजीवी हिंदुत्वपराङ्मुख क्यों हुआ? स्पष्ट है कि अगर देश का बुद्घिजीवी हिंदुत्व से विमुख है, हिंदू शब्द सुनते ही उसके तन-बदन में आग लग जाती है या फिर हिंदू परंपराओं में नकारात्मकता ढूंढते रहने में ही जिसकी प्रतिभा का अपव्यय होता रहता है, तो यह असफलता उस विचारधारा की ही मानी जायेगी जो जनसामान्य की भावनाओं की प्रतिनिधि होने के बावजूद इन पश्चिम परस्त भारतविमुख बुद्घिजीवियों को अपने तकोंर् से सहमत नहीं करा पायी। प्रश्न है, क्यों नहीं करा पायी?
इस प्रश्न का उत्तर इस निष्कर्ष में निहित है कि हिंदुत्व विचारधारा के पुरोधाओं पर जो दायित्व था उसे वे उतनी तत्परता से नहीं निभा पाये जिस तत्परता की अपेक्षा इस देश को उनसे थी, अभी भी है, और आने वाले समय में भी बनी रहेगी। इसे समझने की जरूरत है। हिंदू परंपरा में प्रत्येक को दर्शन और उपासना के स्तर पर अपना मार्ग चुनने का मानो अधिकार जैसा मिला हुआ है, पर उस अधिकार का दुरुपयोग इस हद तक हुआ है कि हर नया मार्ग चुनने वाले ने अपने को हिंदू कहना ही बंद कर दिया। राजनीतिक भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि हर नये मार्ग चुनने वाले को निहित स्वाथोंर् द्वारा यह समझा दिया गया कि तुम जो भी हो, हिंदू नहीं हो। तुम 'क' हो, तुम 'ख' हो, तुम 'ग' हो, पर तुम हिंदू नहीं हो। परिणाम हमारे सामने है। जैसे एक ही वर्णमाला की विभिन्न आकृतियां हैं, वैसे ही देश में विभिन्न स्थानों पर प्रचलित विभिन्न संप्रदाय एक ही हिंदुत्व विचारधारा की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं, वैसे ही आकृतियां हैं, विभिन्न पद्धतियां हैं, विभिन्न रूप हैं। उनको यह समझाने में हिंदुत्व विचारधारा कहीं न कहीं असफल तो हुई है, क्या इसमें संदेह के लिए कोई अवसर है?
यह बात तब और भी अधिक पीड़ा पैदा करती है जब हम इस बात को रेखांकित करते हैं कि हिंदू समाज के पुरोधाओं को अपनी विचारधारा के इस पहलू का भलीभांति पता था, इसके कारण उत्पन्न होने वाली विघटनवादी प्रवृत्तियों का संपूर्ण पूर्वाभास था और उन प्रवृत्तियों को कैसे संघटनवादी बनाया जाए, उसके लिए वृहत् प्रयास करने का पूरा संकल्प भी उनके पास था। प्रश्न उठता है कि फिर वह संकल्प पूरा क्यों नहीं हुआ। यदि संकल्प था तो उसे पूरा करने के लिये अपेक्षित प्रयास क्यों नहीं हो पाये? उदाहरण से समझा जाए।
सिख कहते हैं कि हम हिंदू नहीं हैं। जैन कहते हैं कि हम हिंदू नहीं हैं। नवबौद्घ कहते हैं कि हम हिंदू नहीं हैं। रामकृष्ण मिशन वाले कहते हैं कि हम हिंदू नहीं हैं। वीर शैव भी अपने को हिंदुओं से भिन्न दिखाना चाहते हैं। पश्चिमपरस्त बुद्घिजीवियों ने द्रविड़ों को, भीलों को, गोंदों को, अन्य समस्त वनवासियों और गिरिवासियों को यह समझाने में पर्याप्त सफलता प्राप्त कर ली है कि वे हिंदू नहीं हैं। इधर कुछ राजनीतिक दल राम और कृष्ण के वंशज क्षत्रियों और यादवों को और कुछ राजपूत जातियों को यह समझाने के मिशन में लग गये हैं कि वे भी हिंदू नहीं हैं। वंचित हिंदू नहीं हैं, इसे तो मानो एक राष्ट्रीय मिशन बना कर कई भारत-विरोधी धाराएं अपने भारत-विरोधी कृत्यों में लगी हुई हैं।
अब प्रश्न यह है कि इनके बीच में हिंदुत्ववादी विचारधाराओं का संकल्प किस रूप में अपनी पैठ जमा पा रहा है? पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान हुए मतदान के कुछ उदाहरणों को अपवाद मान लें तो हमें स्पष्ट दिखाई देता है कि हिंदुत्ववादी विचारधाराओं का संकल्प अपने परिणाम दिखा पा रहा है, ऐसा मानने के लिए कई दशक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, क्योंकि पिछले अनेक दशकों के परिणाम उत्साह पैदा करने वाले हैं, यह कहने के लिये पर्याप्त उत्साह जुटाना पड़ेगा।
यह कोई कठिन काम नहीं है। राम, कृष्ण और शिव को मानने वालों को यह समझाने के लिए कि 'तुम हिंदू हो', कोई वृहत् प्रयास नहीं करना पड़ता। हम सब एक ही परमात्मा की असंख्य आत्माएं हैं, और प्रत्येक आत्मा को अंतत: परमात्मा में ही मिलना है, इस अद्वैत को समझाने के लिए कि सी कोई शीर्षासन करने की दुविधा नहीं है। भारतीय धर्मावलंबी प्रत्येक भारतीय को, चाहे वह भारत में रह रहा हो या भारत से बाहर कहीं रहने को विवश हो, उसे ये सब बातें पहले से ही हृदयंगम हैं, हमें तो उसे केवल इतना भर बताना है कि यह जो तुम्हें हृदयंगम है वही हिंदुत्व है, उसी से तुम हिंदू हो। इतना भर करना है और वही हम नहीं कर पा रहे। कष्ट यह है कि दशकों से नहीं कर पा रहे हैं। ल्ल