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जिहादी आतंक – मनुष्य को जीवन का मौलिक अधिकार है

Written byArchiveArchive
Aug 16, 2014, 12:00 am IST
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दिंनाक: 16 Aug 2014 16:03:33

सभ्य समाज एक दिन में इस स्थिति में नहीं आया। सैकड़ों वषोंर् के विकास के कारण समाज इस स्थिति में पहुंचा है कि उसे सभ्य कहा जा सकता है। आपसी सौहार्द के नियमों में लगातार काट-छांट और बढ़ोत्तरी, प्रत्येक जीवन को समान महत्व देने के नियम, स्त्रियों के समान अधिकार, व्यक्ति या समूह के विशेषाधिकारों का निषेध, प्रजातंत्र और प्रत्येक व्यक्ति के वोट का समान महत्व जैसी अनेक बातों का अनुसरण करते-करते यानी जीवन शैली में लगातार परिवर्तन करते-करते समाज ऐसी स्थिति में पहुंचा है जिसे अपेक्षाकृत सभ्य कहा जा सकता है। ये बातें परंपरागत भी हैं और वर्तमान काल में तय की हुई भी। इन्हें विशेषकर इस कारण लिखित रूप दिया गया है ताकि कोई भी इनकी मनमानी अवहेलना न कर सके।
फिर भी सभ्य समाज को पीड़ा देने वाले व्यक्ति और समूह मिल ही जाते हैं। इसी कारण इन्हें असामाजिक तत्व कहा जाता है। इनकी असभ्यता की रोकथाम के दंड-विधान की व्यवस्था है। कभी-कभी ये आचरण इतने बुरे होते हैं, समाज मृत्यु-दंड की व्यवस्था करता है मगर ये दंड मनमर्जी पर नहीं होता। इसके लिये विभिन्न चरणों की सजग न्याय-प्रणाली होती है। मृत्यु-दंड भी विरले ही दिया जाता है। अब तो विभिन्न देशों में मृत्यु-दंड पर रोक लगायी जा चुकी है। इसका तर्क ये है कि मनुष्य को जीवन का मौलिक अधिकार है और ये अधिकार बुरे से बुरे मनुष्य से भी नहीं छीना जा सकता। अधिकतम उस व्यक्ति को उसकी अंतिम सांस तक जेल में बंद कर समाज से दूर रखा जा सकता है। ये सर्वमान्य और सर्वस्वीकृत
तथ्य हैं। सभ्य समाज की इस स्थिति के बावजूद, आइये अपनी जानकारी में कुछ बढ़ोत्तरी की जाये।
इराक में एक अल्पसंख्यक समूह है, जिसे वहां यजीदी पुकारा जाता है। यजीदी समाज मूलत: कुर्द है। ये लोग उस क्षेत्र के सबसे पुराने निवासी हैं और पारसी, ईसाई और इस्लाम के संक्षिप्त रिवाजों को मानते हैं। उनके अनुसार ये रिवाज मूलत: उनके हैं जिन्हें दूसरे समाजों ने अपना लिया है। ये ईसाइयों की तरह बपतिस्मा करते हैं, मुसलमानों की तरह खतना करते हैं और पारसियों की तरह अग्नि को पूज्य मानते हैं। इन सब बातों के बाद भी ये अपनी जड़ें अरबी नहीं मानते। ये 'मलक ताऊस' अर्थात मोर फरिश्ते को भी पवित्र मानते हैं। इस समाज के पीछे इन दिनों आईएसआईएस के आतंकवादी पड़े हुए हैं और औरतों-बच्चों सहित 500 लोगों को कत्ल कर चुके हैं। इस समाज के लोगों की सामूहिक कब्रें मिली हैं। इन कब्रों में यजीदी लोगों को जीवित ही दफना दिया गया। ये दंड मुस्लिम सत्ता के काल में भारत में भी दिया जाता था। दसवीं पादशाही गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के दो साहबजादों को दीवार में चुन कर मार डाले जाने का प्रसंग प्रत्यक्ष है। ऐसा नहीं है कि ये हत्या कांड अभी हो रहे हैं। 18वीं, 19वीं शताब्दी में तुर्की खिलाफत के काल में, जिसे प्रथम विश्व युद्घ में खत्म कर दिया गया था और इसे वापस लाने के लिए कांग्रेस और गांधी जी ने भी जोर लगाया था, भी इनका 72 बार नरसंहार हुआ था। अब ये लाख से भी कम रह गये हैं। इन्हीं लोगों को आईएसआईएस के हत्यारे मार-धमकाकर उस देश से, जो मूलत: इनका ही है, भगा देना चाहते हैं। यही इस्लामी आतंकवादियों ने कश्मीर में किया था। यही बंगाल और असम के बंगलादेश से लगते सीमावर्ती क्षेत्रों में हो रहा है। सभ्य समाज इस स्थिति पर इन परिस्थितियों पर मौन है।
खामोशी या निस्तब्धता केवल कह पाने कि असमर्थता ही नहीं होती। सच के पक्ष में हाथ उठाने में भय की अनुभूति, समाज की नसों में शताब्दियों से प्रसारित और व्याप्त डर भी खामोश कर देता है। अन्यथा कोई कारण नहीं कि इराक के इन हत्याकांडों पर भारतीय प्रेस और राजनैतिक दल मौन रहें। इसी तरह अंग्रेजी प्रेस तो पीडि़तों के पक्ष को थोड़ा समझने का प्रयास कर भी रही है मगर हिंदी मीडिया को तो सांप सूंघ गया है। इतिहास के कूड़ेदान में फेंके जा चुके वामपंथी और तालिबानी मानसिकता वाले लोग हमेशा की तरह इस्लामी आतंकवादियों और आईएसआईएस के पक्ष में बोल रहे हैं।
सामान्य घरेलू तथा पड़ोस के झगड़े भी इस तरह शांत नहीं होते। और इस विषय में तो आक्रामक स्वयं को मनमाने तर्क से सही और दूसरे को गलत ठहरा रहे हैं। क्या मुझे अधिकार है कि मैं किसी के एकेश्वरवाद को गलत ठहराऊं? यदि नहीं तो आप मेरी उपासना पद्धति की आलोचना करने वाले और मुझे वाजिबुल-कत्ल ठहराने वाले कौन हैं। हम सबके जीवन में कुछ न कुछ ऐसा मिल जायेगा जो दूसरे की दृष्टि में गलत होगा। तो क्या सभ्य संसार ऐसी हत्यारी सोच को केवल इसलिए सहता रहेगा कि वह किसी की निजी उपासना पद्धति का हिस्सा है? यदि ये मौन रहने की जगह है तो सभ्य समाज ने नरमांस-भक्षण करने वाले समूहों को क्यों नष्ट कर दिया? उनकी सोच में और इस सोच में केवल मांस खाने का ही तो अंतर है अन्यथा मनुष्य की हत्या तो उससे भी कहीं अधिक अर्थात समूह की, की जा रही है। नरमांसभक्षी तो केवल खाने के लिये मारते थे, यहां तो इन हत्याकांडों के मजहबी ग्रन्थ में तर्क भी ढूंढे जाते हैं। ये कैसी आस्था-प्रणाली है जो अपने कुढब मापदंडों पर संसार को जांचती है, आंकती है और फिर उसे हांकती है? उसकी आस्थाएं तार्किक हैं या विचित्र, उसके मापदंड सभ्य हैं या जंगली, उसे इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता। चलिए ऐसा ही सही, चूंकि हर उत्पाती के पास अपने उत्पात को सही ठहराने के लिये तर्क होते हैं, मगर सभ्य समाज जो इससे प्रभावित है उसे क्या हो गया है? इतिहास के विद्यार्थियों को ध्यान होगा, माओ ने एक समय स्टालिन को एक बर्बर सलाह दी थी कि रूस को अमरीका पर हमला कर देना चाहिए। उसके पीछे उसकी सोच थी कि चीनी लोग विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या हैं। युद्घ के उपरांत जितने भी लोग बचेंगे उनमें चीनी लोगों का बाहुल्य होगा। अत: युद्घ के बाद संसार पर चीनी मूल के लोगों का शासन हो जायेगा। अब यही सोच सऊदी अरब के वहाबियों शासकों और उनसे पैसा पाने वाले अल कायदा, बोको हराम, लश्करे-तोयबा, आईएसआईएस, हमास जैसे संगठनों की है। तार्किक रूप से इस सोच को पराजित करने के साथ-साथ इनके जड़-मूल से नष्ट करने के अतिरिक्त सभ्य समाज के पास और कोई विकल्प नहीं है।
हत्वा वा प्राप्यसे स्वगंर् जित्वा वा भोक्षसे महीम
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्घाय त निश्चय: भगवद्-गीता

-तुफैल चतुर्वेदी

सम्पर्क-9711296239

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