मंथन - भारत के वोट गिद्धों की आत्मघाती मानसिकता
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मंथन – भारत के वोट गिद्धों की आत्मघाती मानसिकता

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Aug 16, 2014, 12:00 am IST
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दिंनाक: 16 Aug 2014 16:26:51

हिन्दू पर गुर्राओ, जिहाद पर दुम दबाओ

'बिल्ली के भाग से छींका टूटा', यह कहावत पुरानी होते हुए भी इस समय भारत के वोट गिद्धों पर पूरी तरह लागू होती है। 67 वर्ष से मुस्लिम वोटों को रिझाने के लालच में 'हिन्दू साम्प्रदायिकता' एवं 'बहुसंख्यकवाद' का राग अलापने वाले सत्तालोलुप राजनीतिज्ञ 2014 के चुनाव परिणामों से खुद को मूर्छित स्थिति में पा रहे थे। 'सबका साथ, सबका विकास', 'भारत पहले, पीछे मैं' जैसे सर्वसमावेशी और राष्ट्रवादी उद्घोष के वातावरण में वे अपनी विभाजनकारी राजनीति को खड़ा करने की जगह नहीं ढूंढ पा रहे थे। ऐसी दयनीय स्थिति में उनके कानों पर 'हिन्दू' शब्द पड़ गया और वह भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के मुंह से। बस फिर क्या था, उनके मूर्छित प्राणों में चेतना आ गई और वे लोकतांत्रिक पराजय की धूल झाड़कर खड़े हो गए। गुर्राने लगे कि 'संघ भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है, वह सभी भारतीयों को हिन्दू बनाने पर तुला हुआ है। भारत बहुधर्मी देश है। यहां अनेक उपासना पंथों के अनुयायी रहते हैं, उन्हें हिन्दू जैसे मजहबी शब्द से पुकारने का औचित्य क्या है? भागवत जी के भुवनेश्वर भाषण से संघ का छिपा एजेंडा सामने आ गया है।' आदि-आदि।
वैचारिक भटकाव का प्रमाण
हिन्दू विरोधी नेहरू और धर्म विरोधी मार्क्सवादियों के द्वारा उत्पन्न वैचारिक भटकाव की अब तक की दिशा-शून्य यात्रा का यह बोलता प्रमाण है। हिन्दू विरोध नेहरू को संस्कारों में मिला था। नेहरू को न भारतीय राष्ट्रवाद की समझ थी, न मार्क्सवादी विचारधारा की, इस्लाम के इतिहास को भी उन्होंने समझने का प्रयास नहीं किया था। भारतीय मार्क्सवादियों ने उन्हें अपने कंधों पर बैठाकर घुमाया और नेहरू ने गांधी जी की छत्रछाया में अर्जित लोकप्रियता का लाभ उठाकर भारतीय राजनीति में पारिभाषिक शब्दावली को विकृत कर डाला। उन्होंने पूरे विश्व को 'दारुल इस्लाम' बनाने का सपना देखने वाली असहिष्णु, हिंसा प्रधान व पृथकतावादी इस्लामी विचारधारा को भारत में पंथनिरपेक्षता की कसौटी बना दिया और 'वसुधैव कुटुम्बकम्', 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' तथा 'एकोहम् बहुस्याम:' की दार्शनिक आधारभूमि पर खड़े होकर विविधता में एकता का साक्षात्कार करने वाले, सर्वपंथ समादर भाव पर आधारित पंथनिरपेक्षता के आदर्श में निष्ठा रखने वाले हिन्दू समाज को साम्प्रदायिक व असहिष्णु बहुसंख्यकवादी घोषित कर दिया। मार्क्सवादी कंधों पर सवार नेहरू द्वारा उत्पन्न यह पारिभाषिक विकृति भारतीय राजनीति और मीडिया पर अब तक छायी रही है, जिसका परिणाम हुआ कि झूठी पंथनिरपेक्षता के आवरण में सत्तालोलुप अवसरवादी राजनीतिक नेतृत्व का उदय हुआ, जिसकी एकमात्र राजनीति भारतीय मुसलमानों के मन में हिन्दू बहुसंख्या का भय पैदा करना बन गई। किसी एक वंश की जेब में पड़े इन छोटे-छोटे राजनीतिक दलों के बीच स्वयं को पंथनिरपेक्ष सिद्ध करने की होड़ लग गई है और इस होड़ में आगे बढ़ने के लिए संघ व भाजपा का हौवा खड़ा करना उनका शगल बन गया।
तथ्य एवं तर्क से उनकी राजनीति का कुछ लेना-देना नहीं है। उन्होंने यह नहीं सोचा कि यदि सरसंघचालक श्री भागवत भारत के प्रत्येक नागरिक को 'हिन्दू' नाम दे रहे हैं, तो स्पष्ट ही वे 'हिन्दू' शब्द को उपासनावाची अर्थ में नहीं देखते, क्योंकि यदि 'हिन्दू' शब्द उपासनावाची है तो अनेक उपासना पंथों के अनुयायियों पर 'हिन्दू' शब्द कैसे थोप सकते हैं? यह भी स्पष्ट है कि 'हिन्दू' शब्द 'हिन्दुस्तान' शब्द से पहले आया होगा, क्योंकि हिन्दुओं का स्थान होने के कारण 'हिन्दुस्थान' या 'हिन्दुस्तान' नाम प्रचलित हुआ। इतिहास के प्रति पूर्ण अज्ञान तो इस वोट केन्द्रित राजनीति की विशेषता ही है। उन्हें यह जानने की क्या आवश्यकता कि सर सैयद अहमद खान स्वयं को 'हिन्दू' क्यों मानते थे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री मुहम्मद करीम छागला अपनी आत्मकथा, 'रोजेज इन डिसेम्बर' में स्वयं को हिन्दू क्यों घोषित करते हैं? क्यों अरब एवं अन्य मुस्लिम देशों में भारतीय मुसलमानों को 'हिन्दू मुसलमान' कहा जाता था। 'हिन्दू' शब्द को उसकी भू-सांस्कृतिक परिभाषा से काटकर इस्लाम और ईसाइयत जैसे सुसंगठित उपासना पंथों के समकक्ष उपासनावाची परिभाषा कब, क्यों और किसने प्रदान की? यदि अपने देश के इतिहास में उनकी रुचि होती, यदि सत्य के अनुशीलन की उनमें भूख होती तो ये राजनीतिज्ञ और उनके बुद्धिजीवी मित्र दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में बैठकर पुरानी फाइलों की धूल फांकते तब उन्हें पता चलता कि 1857 की क्रांति के पहले की लगभग सभी ब्रिटिश फाइलों में इस देश का नाम 'हिन्दुस्तान' लिखा हुआ है, किंतु 1857 के बाद उन्होंने 'इंडिया' शब्द को प्रचलित किया और 'हिन्दू' शब्द को छोटा करने के लिए 'इंडियन' शब्द को उछाला। अंग्रेजी पढ़े हिन्दुस्तानियों ने कहना शुरू किया कि मैं 'हिन्दू' नहीं 'इंडियन' हूं। इस प्रकार 'इंडियन' शब्द राष्ट्रवाची बन गया और 'हिन्दू' शब्द उपासनावाची। इस परिभाषा परिवर्तन के रहस्य में प्रवेश करने के लिए ब्रिटिश जनगणना नीति का गहरा अध्ययन आवश्यक है।
ब्रिटिश नीति और हिन्दू
यह कम अर्थपूर्ण नहीं है कि ब्रिटिश जनगणना नीति का विकास 1857 की क्रांति के बाद ही हुआ। 1864-65 में उन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी, आगरा व अवध जैसे कुछ क्षेत्रों में व्यवस्थित जनगणना कराई। 1868 में पंजाब में दूसरी जनगणना हुई और 1871 से पूरे भारत में एक साथ दस वार्षिक जनगणना की नीति घोषित की। इसी समय उन्होंने जनगणना के फॉर्म में उपासना पंथों के कॉलम में 'इस्लाम' और 'ईसाइयत' के साथ-साथ 'हिन्दुइज्म' व 'एनीमिज्म' स्तंभों का भी श्रीगणेश किया। ब्रिटिश जनगणना प्रपत्रों में किसी नए वर्ग का नामोल्लेख करते समय उस नए वर्ग की व्याख्या करना आवश्यक माना जाता था। इसलिए 1871 से 1941 तक प्रत्येक जनगणना रपट में, चाहे वह अखिल भारतीय रपट हो या किसी प्रांत विशेष की रपट 'हिन्दू' शब्द की व्याख्या का प्रयास उपलब्ध है। मैंने कई वर्ष पूर्व इन सब जनगणना रपटों का अध्ययन किया था और उनमें से 'हिन्दू' शब्द की व्याख्या से संबंधित सभी संदर्भों के नोट्स बनाने का प्रयास किया था। ये सभी नोट्स मेरे पास अब भी सुरक्षित हैं। किंतु अपनी अव्यवस्थित एवं अनेक विषयों में बौद्धिक जिज्ञासा के कारण मैं उन्हें पुस्तक रूप नहीं दे पाया। पर दु:ख की बात यह है कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' नीति की चर्चा तो बहुत हुई, किंतु उसके बौद्धिक उपकरणों में कोई व्यवस्थित शोध नहीं हुआ। कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं आया। जिस संगठन प्रवाह ने 'हिन्दू' शब्द को राष्ट्रवाची अर्थों में पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया, वहां तो यह विचार नहीं हुआ कि लम्बे प्रयोग के कारण किसी शब्द का अर्थान्तरण हो जाने पर उसे उसके पुराने अर्थों पर पुन: प्रतिष्ठित करना सरल कार्य नहीं होता, उसके लिए बौद्धिक आधारभूमि तैयार करके पूरे राष्ट्र के मानस को बदलना पड़ता है। विशेषकर स्वाधीन भारत में जिस ब्रिटिश संवैधानिक रचना को हमने अपनाया उसमें ब्रिटिश जनगणना नीति ने सत्ताकांक्षी राजनेताओं को जाति, क्षेत्र और भाषा की विभाजनकारी राजनीति खेलने का खुला अवसर प्रदान कर दिया। इस सिद्धांतहीन सत्तालोलुप राजनीति में तथाकथित हिन्दू बहुसंख्या को तो जाति, क्षेत्र व भाषा पर आधारित अनेक छोटे-छोटे दलों में विभाजित कर दिया, जिसके फलस्वरूप वोट राजनीति का 'रिमोट' मजहबी कट्टरता पर पले मुस्लिम वोट बैंक के हाथों में पहुंच गया और उसने उसका पूरा लाभ उठाया। पहली बार 2014 के लोकसभा चुनाव में भारत की राष्ट्रवादी चेतना ने आत्मरक्षा की भावना से प्रेरित होकर राष्ट्रवाद की प्रवक्ता भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत दे दिया। किन्तु इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि भाजपा को केवल 31 प्रतिशत मत मिले। 69 प्रतिशत मत इधर-उधर बिखर गए। 2014 की पराजय से आहत मुस्लिम कट्टरवाद बाट जोह रहा है कि कब झूठी पंथनिरपेक्षता के नाम पर जातिवादी, क्षेत्रवादी छोटे-छोटे दलों के हिन्दू राजनेता भाजपा के विरुद्ध गोलबंद हों और कब उनके कंधों पर सवार होकर मुस्लिम कट्टरवाद व पृथकतावाद भारतीय राजनीति पर हावी हो सके।
ये सत्तालोलुप नेता
पीड़ा की बात यह है कि व्यक्तिगत सत्ताकांक्षा के बंदी हिन्दू राजनेताओं ने न तो इतिहास से कोई सबक सीखा है और न ही वे विश्व राजनीति पर छाए जिहादी खतरे को पहचान रहे हैं, वे केवल सत्ता के अपने खेल में मगन हैं। यही कारण है कि अपनी मुस्लिम वोट बैंक राजनीति के पोषण के लिए संघ के मंच पर 'हिन्दू' शब्द का राष्ट्रवादी अर्थों में उल्लेख होते ही वे संघ और भाजपा पर गुर्राने लगे हैं। खबरिया चैनलों पर इस विषय पर गरमागरम बहस होने लगी है। इराक में जिहादी हिंसा यहूदियों, ईसाइयों और शियाओं पर जो जुल्म ढा रही है उससे इन्हें कोई दर्द नहीं है। सीरिया और इराक में सुन्नी बहुसंख्या शिया अल्पमत पर हिंसा करवा रही है, बगदादी ने स्वयं को नया खलीफा घोषित कर दिया है। विश्व राजनीति में सातवीं शताब्दी के खलीफा पद की वापसी, इन सत्तालोलुपों की चिंता का विषय नहीं है। भारत के भीतर भी सपा के आजम खां और शिया नेता कल्बे जावेद के बीच जो गाली-गलौज हो रही है, वह दो व्यक्तियों का झगड़ा नहीं है, अपितु सन् 661 से चले आ रहे शिया-सुन्नी संघर्ष का ही हिस्सा है। जो विचारधारा कुरान और पैगम्बर के प्रति आस्था रखने वाले शिया, अहमदी और इब्राहिमी सम्प्रदायों को सहन नहीं कर सकती, उनके कत्लेआम करने पर उतारू है, उस विचारधारा को भारत में पंथनिरपेक्षता की कसौटी मानने वाले इन हिन्दू राजनीतिज्ञों को क्या कहा जाए- मूर्ख या मानवद्रोही स्वार्थी?
यदि उनके अंदर शांति और लोकतंत्र के प्रति थोड़ी भी निष्ठा होती तो वे पूरे विश्व पर मंडरा रहे खिलाफत की स्थापना के लिए जिहादी आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक लड़ाई में सम्मिलित होते, किंतु सत्ता के कुछ टुकड़ों से आगे जिनकी दृष्टि जाती ही नहीं, उनसे ऐसी अपेक्षा करना व्यर्थ है। -देवेन्द्र स्वरूप

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