विविध – श्रद्धाञ्जलि : आचार्य गिरिराज किशोरधर्म और राष्ट्र को समर्पित जीवन
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गत 13 जुलाई की रात को 9:15 बजेे विश्व हिन्दू परिषद् के मार्गदर्शक आचार्य गिरिराज किशोर का दिल्ली के आर.के.पुरम स्थित विश्व हिन्दू परिषद् के मुख्यालय पर निधन हो गया। वे 95 वर्ष के थे। आचार्य जी का कार्यकर्ताओं के साथ बड़ा ही स्नेहपूर्ण सम्बंध रहता था। देशभर के कार्यकर्ता उनसे मिलते थे और अपनी बात सुनाते थे। वे कार्यकर्ताओं से संगठन की बात तो करते ही थे,साथ ही घर-परिवार का भी हाल-चाल पूछते थे। इससे कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ता था और वे दुगुने उत्साह के साथ कार्य करते थे। कार्यकर्ताओं का मान रखने के लिए ही वे इस उम्र में भी विभिन्न कार्यक्रमों और कार्यकर्ताओं के सुख-दु:ख में भाग लेते थे, जबकि वे चलने में असमर्थ थे। किसी कार्यक्रम में वे व्हीलचेयर पर ही बैठते थे। उनके निधन का समाचार फैलते ही रात्रि में ही विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता उन्हें श्रद्धाञ्जलि देने के लिए आर.के.पुरम पहंुचने लगे थे। 14 जुलाई की दोपहर तक उन्हें श्रद्धाञ्जलि दी गई। श्रद्धाञ्जलि देने वालों में प्रमुख थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी, सह सरकार्यवाह श्री सुरेश सोनी व श्री दत्तात्रेय होसबोले और श्री इन्द्रेश कुमार, भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, महामंत्री (संगठन) श्री रामलाल, विश्व हिन्दू परिषद् के संरक्षक श्री अशोक सिंहल, अन्तरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ. प्रवीणभाई तोगडि़या, अन्तरराष्ट्रीय महामंत्री श्री चम्पत राय व केन्द्रीय उपाध्यक्ष श्री ओमप्रकाश सिंहल, केन्द्रीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज, जहाजरानी मंत्री श्री नितिन गडकरी, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, सांसद श्री अनन्त कुमार व श्री मनसुखभाई वसवा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री सुनील अम्बेकर, पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी अनुभूतानन्द जी, दीदी मां साघ्वी ऋतम्भरा, महंत नवलकिशोर दास, महंत सुरेन्द्रनाथ अवधूत, आचार्य धर्मेन्द्र व नेपाल से पधारे पूज्य बाल सन्त महेशशरण देवाचार्य जी आदि। इसके अलावा देशभर के अनेक धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक संगठनों के पदाधिकारियों ने आचार्य जी को श्रद्धाञ्जलि दी।
14 जुलाई को दोपहर बाद उनके पार्थिव शरीर को दधीचि देह दान समिति के संस्थापक श्री आलोक कुमार के माध्यम से आर्मी मेडिकल कॉलेज, दिल्ली को दान कर दिया गया। अचार्य जी के संकल्पानुसार 13 जुलाई की रात्रि को ही उनके नेत्रों को भी दान कर दिया गया था। आचार्य जी जीवनभर देश, धर्म और राष्ट्र की सेवा में समर्पित रहे।
आचार्य गिरिराज किशोर का जीवन बहुआयामी था। उनका जन्म 4 फरवरी, 1920 को एटा (उ़ प्ऱ) के मिसौली गांव में श्री श्यामलाल एवं श्रीमती अयोध्या देवी के घर में मंझले पुत्र के रूप में हुआ। हाथरस और अलीगढ़ के बाद उन्होंने आगरा से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की। आगरा में श्री दीनदयाल उपाध्याय और श्री भव जुगादे के माध्यम से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और फिर उन्होंने संघ के लिए ही जीवन समर्पित कर दिया।
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प्रचारक के नाते आचार्य जी मैनपुरी, आगरा, भरतपुर, धौलपुर आदि जगहों पर सक्रिय रहे। 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगने पर वे मैनपुरी, आगरा, बरेली तथा बनारस की जेल में 13 महीने तक बंद रहे। वहां से छूटने के बाद संघ कार्य के साथ ही आचार्य जी ने बी़ ए़ तथा इतिहास, हिन्दी व राजनीति शास्त्र में एम़ ए़ किया। साहित्य रत्न और संस्कृत की प्रथमा परीक्षा भी उन्होंने उत्तीर्ण कर ली। 1949 से 58 तक वे उन्नाव, आगरा, जालौन तथा उड़ीसा में प्रचारक रहे।
इसी दौरान उनके छोटे भाई वीरेन्द्र की अचानक मृत्यु हो गयी। ऐसे में परिवार की आर्थिक दशा संभालने हेतु वे भिण्ड (म़ प्ऱ) के अड़ोखर विद्यालय में सीधे प्राचार्य बना दिए गए। इस काल में विद्यालय का चहुंमुखी विकास हुआ। एक बार डाकुओं ने छात्रावास पर धावा बोलकर कुछ छात्रों का अपहरण कर लिया। आचार्य जी ने जान पर खेलकर एक छात्र की रक्षा की। इससे चारों ओर उनका सम्मान बढ़ने लगा। यहां तक कि डाकू भी उनका सम्मान करने लगे।
आचार्य जी की रुचि सार्वजनिक जीवन में देखकर संघ ने उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और फिर संगठन मंत्री बनाया। नौकरी छोड़कर वे विद्यार्थी परिषद् को सुदृढ़ करने में लगे। उनका केन्द्र दिल्ली था। उसी समय दिल्ली विश्वविद्यालय में पहली बार विद्यार्थी परिषद् ने अध्यक्ष पद जीता। फिर आचार्य जी को भारतीय जनसंघ का संगठन मंत्री बनाकर राजस्थान भेजा गया। आपातकाल में वे 15 मास भरतपुर, जोधपुर और जयपुर जेल में रहे।
1979 में मीनाक्षीपुरम कांड ने पूरे देश में हलचल मचा दी। वहां गांव के सभी 3,000 हिन्दू एक साथ मुसलमान बन गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इससे चिंतित होकर डॉ. कर्ण सिंह को कुछ करने को कहा। उन्होंने संघ से मिलकर 'विराट हिन्दू समाज' नामक संस्था बनाई। संघ की ओर से श्री अशोक सिंहल इसमें लगे। दिल्ली तथा देश के अनेक भागों में विशाल कार्यक्रम हुए। मथुरा के 'विराट हिन्दू सम्मेलन' की जिम्मेदारी आचार्य जी पर थी; पर धीरे-धीरे संघ के ध्यान में आया कि इंदिरा गांधी इससे अपनी राजनीति साधना चाहती हैं। अत: संघ ने हाथ खींच लिया। ऐसा होते ही वह संस्था भी ठप्प हो गई। इसके बाद 1982 में श्री अशोक सिंहल तथा 1983 में आचार्य जी को विश्व हिन्दू परिषद् के काम में लगा दिया गया।
इन दोनों के नेतृत्व में संस्कृति रक्षा योजना, एकात्मता यज्ञ यात्रा, राम जानकी यात्रा, रामशिला पूजन, राम ज्योति अभियान, राम मंदिर का शिलान्यास और फिर बाबरी ढांचे के ध्वंस आदि अभियानों ने विश्व हिन्दू परिषद् को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं। संगठन विस्तार के लिए आचार्य जी ने इंग्लैंड, हालैंड, बेल्जियम, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, रूस, नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, इटली, मॉरीशस, मोरक्को, गुयाना, नैरोबी, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, सिंगापुर, जापान, थाइलैंड आदि देशों की यात्रा की। स्व. आचार्य गिरिराज किशोर को पाञ्चजन्य परिवार की ओर से भावभीनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित है। – प्रतिनिधि











