|
प्रशांत बाजपेई
अलकायदा की तरह आइएसआइएस (करकर) भी प्रचार माध्यमों का जबरदस्त उपयोग कर रहा है। 5 जुलाई, 2014 को आइएसआइएस द्वारा जारी वीडियो में उसके नेता अबू बकर अल बगदादी को मुस्लिम 'खिलाफत' के 'खलीफा' के रूप में उम्मा (मुस्लिम आबादी) को संबोधित करते दिखाया गया। मोसुल की मस्जिद में खलीफा के वेश में खड़े बगदादी ने मुस्लिमों से स्वयं का आदेश मानने और जिहाद में शामिल होने का आह्वान किया। बगदादी द्वारा खिलाफत के नाम पर की गई इस अपील के पीछे विश्व में जिहादी उन्माद जगाकर सुन्नी विश्व का समर्थन और ताकत हासिल करने की अपेक्षा और रणनीति है। विगत कुछ महीनों से समाचार जगत और इंटरनेट सीरिया और इराक में जारी रक्तपात की तस्वीरों से लाल है। इनमें से ज्यादातर चलचित्र व तस्वीरें स्वयं आइएसआइएस द्वारा जारी किए गए हैं। उद्देश्य है, इराक और सीरिया के शिया शासकों के खिलाफ और अपने पक्ष में सुन्नियों का तेजी से ध्रुवीकरण करना। ये युद्धकालीन प्रचार रणनीति है। विश्वव्यापी मुस्लिम उम्मा के सामने अपना वैचारिक आधार रखने के लिए 30 जून को आइएसआइएस द्वारा खिलाफत का नक्शा जारी किया गया। इस नक्शे में भारत, श्रीलंका, चीन का सिक्यांग प्रांत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक समेत पूरा अरब प्रायद्वीप, तुर्की, स्पेन, दक्षिणी यूरोप और मिस्र समेत उत्तरी अफ्रीका के देश शामिल हैं। आइएसआइएस झंडे के काले रंग से रंगे इस नक्शे का खलीफा है, अबू बकर अल बगदादी। 1 जुलाई को बगदादी का ऑडियो टेप जारी हुआ था।
19 मिनट के इस टेप में बगदादी ने सारे विश्व के मुसलमानों से आइएसआइएस की इस खिलाफत से जुड़ने को कहा। सभी स्नातकों, न्यायविदों, चिकित्सकों इंजीनियर और अन्य मुसलमानों से इस 'सच्चे' मुस्लिम राज्य के लिए काम करने को कहा और रमजान के महीने में जिहाद को बल देने की आवश्यकता बताई। वो कहता है-'हथियार उठाओ। हथियार उठाओ। इस्लाम के सिपाहियों! लड़ो। लड़ो।'
इसके बाद 5 जुलाई को आइएसआइएस का 'अदृश्य शेख' पहली बार किसी वीडियो में अवतरित हुआ। उसने मुजाहिदीन की इस जीत के लिए अल्लाह को धन्यवाद दिया। पारंपरिक अरबी में दिए गए लगभग भाव रहित इस भाषण का उद्देश्य मुस्लिम भाव जगत को झकझोर कर उसे ऐतिहासिक खिलाफत के स्वप्नलोक में ले जाना था, ताकि अतीत की ओर देख रही आंखें इस्लाम की शक्ति के उस 'स्वर्णकाल' को बगदादी की इस खिलाफत में एक बार फिर से साकार होता देखने लगें। इराक सरकार ने इस वीडियो की सत्यता पर सवाल उठाए हैं, परंतु बगदादी ने सफलतापूर्वक अपना संदेश दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचा दिया है।
विभाजन की गहरी खाई
खिलाफत अर्थात कुरान आधारित शासन पद्धति। परंतु कुरान में सिद्धांत हैं, जिनकी अलग-अलग व्याख्याएं हैं, अर्थात शासन चलाने की एक आचार संहिता तय करना संभव नही है। इस सीमित साहित्य से असीमित वास्तविकताओं के उत्तर कैसे ढूंढे जाते? इसलिए मोहम्मद की मृत्यु के तीन सदी बाद मोहम्मद ने जीवन में किस परिस्थिति में कब क्या कहा/किया/करवाया, इसे लिपिबद्ध किया गया। पर इसका कोई लिखित रिकार्ड नहीं था। प्रचलित मौखिक लोकोक्तियां थीं, जो विशाल अरब प्रायद्वीप में लाखों कंठों से हजारों रूपांतरों के साथ मुखरित थीं। इसे लिपिबद्ध करने के लिए लोग नियुक्त हुए, जिनकी योग्यता का कोई तय पैमाना और कोई निश्चित दिशा-निर्देशिका नहीं थी। फिर स्वाभाविक रूप से शिया और सुन्नी परंपराओं के एक ही मुद्दे पर भिन्न और अक्सर विरोधी दृष्टिकोण थे। शियाओं ने पहले तीन खलीफाओं को झूठा खलीफा माना। उन्होंने इन तीनों तथा मोहम्मद की पत्नी आयशा द्वारा कही गई बातों को अमान्य कर दिया, तो सुन्नियों ने अली की बतलाई गई बातों को अस्वीकार किया। इस प्रकार अनेक रूपों में, प्रकारांतरों में मोहम्मद के जीवन की घटनाओं को लिखा गया, जिसे हदीसें (शाब्दिक अर्थ परंपरा) कहा गया। इसी के आधार पर मुस्लिम कानून शरिया बनाया गया। शरिया का आधार है, कुरान और हदीसों की शिक्षा। मुसलमानों के अलग-अलग संप्रदायों की अपनी अलग हदीसें हैं, और कुरान की आयतों की अपनी अलग व्याख्याएं हैं। इसीलिए परस्पर विरोधी फतवे भी देखने में आते हैं। शरिया कानून की यह स्थिति खिलाफत के संविधान की भी भिन्न व्याख्याएं करती हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है, कि बगदादी और आइएसआइएस की इस तथाकथित खिलाफत की स्वीकार्यता का गणित और भूगोल क्या है? क्या इसका फैलाव इराक और सीरिया के कुछ इलाकों तक सीमित रहेगा या ये अरब प्रायद्वीप में भी फैल सकेगा।

दलदली फर्श और धुएं की दीवारें
इस्लामिक जगत में सिद्धांतो और इतिहास के ये भेद बौद्धिक चर्चाओं या बहसों तक सीमित नहीं हैं। खिलाफत के प्रारंभिक दिनों से ही इन वादों व विवादों का निपटारा लाशों की गिनतियों के आधार पर किया जाता है। मस्जिदों से लेकर समाज तक बंटवारा है। पाकिस्तान, बंगलादेश से लेकर इंडोनेशिया तक अहमदी मुसलमानों का जीना दुश्वार है। हर एक स्वयंभू सच्चा और शेष झूठे हैं। शिया-सुन्नी शत्रुता हर जगह धरती के हर कोने में यथावत है। ईरान, इराक, लेबनान व बहरीन शिया बहुल हैं,तो शेष मुस्लिम देश सुन्नी हैं। इराक में पिछले 100 में से 90 सालों में कम संख्या वाले सुन्नी बहुसंख्यक शियाओं पर शासन करते रहे। सद्दाम के पतन के बाद शिया पिछले 10 सालों से सत्ता में हैं,जो भेद रहित शासन देने में पूर्ववर्ती सुन्नी शासकों की ही तरह नाकाम रहे। अब उन्हे सुन्नी उग्रवाद से चुनौती मिल रही है। सऊदी अरब में 10 प्रतिशत शिया भेदभाव के शिकार हैं। मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक भी सार्वजनिक रूप से शियाओं पर उंगली उठाने से कभी नहीं चूके। यमन और बहरीन में शिया-सुन्नी तनाव है। जार्डन भी अछूता नहीं है। सुन्नी बहुल सीरिया में शिया तानाशाह शासन कर रहा है। यमन के बहुसंख्यक सुन्नी शफी कहलाते हैं, वे वहां के अल्पसंख्यक शियाओं, जिन्हे जैदी कहते हंै, से संघर्षरत हैं। यमन में शियाओं के कई नरसंहार हुए हैं। यमन सरकार अमरीका परस्त है, तो शिया ईरान समर्थक। पाकिस्तान व अफगानिस्तान में शियाओं के जघन्य हत्याकांड जारी हैं। इस बुरी तरह बंटे हुए मुस्लिम परिदृश्य में इराक के सुन्नी आतंकी किस खिलाफत के साथ हैं? वे सैद्धांतिक रूप से प्रथम तीन खलीफाओं की खिलाफत के पैरोकार हैं। उनके अनुसार तब इस्लाम अपने वास्तविक रूप में व्यवहार में लाया जा रहा था। वे सब शिया विरोधी हैं परंतु आपस में बंटे हुए हैं।

और भी हैं मैदान में
सीरिया व इराक में जारी इस सुन्नी जिहाद में और भी आतंकी तंजीमें शामिल हैं। ये समान उद्देश्य के लिए लड़ रहे हैं, पर इनमें आपसी मतभेद व खूनी रंजिशें पल रही हैं। फिलहाल ये सब मिलकर शियाओं की हत्याएं कर रहे हैं, उनके पूजा स्थलों को बारूद लगाकर उड़ा रहे हैं, पर आगे क्या होगा? इराकी जिहाद के इन प्रमुख खिलाडि़यों पर संक्षेप मंे दृष्टि डालना अच्छा होगा।
प्रारंभ में इराक से आ रही खबरों में सारी सुर्खियां आइएसआइएस ने चुरा लीं, पर धीरे-धीरे तस्वीर साफ हुई और दूसरे झंडे भी दिखाई देने लगे। आइएसआइएस ज्यादातर जगहों पर नेतृत्व कर रहा था, परंतु सोशल मीडिया पर प्रचार अभियान में सिर्फ वही छाया था। आर्थिक संसाधनों की बहुलता के कारण भी उसे लाभ मिला। आइएसआइएस ने स्थानीय कबीलों को साथ मिलाने में भी तत्परता दिखाई। आइएसआइएस का सिद्धांत है-'बने रहो। विस्तार करते रहो।' आज सुन्नी जिहादियों के कब्जे वाले इराक में ज्यादातर जगह इसका कब्जा है, परंतु ये हर इलाके के हिसाब से कठोर या अपेक्षाकृत नरम इस्लामी कानून लागू कर रहा है। आइएसआइएस का विरोधी जमात अंसार अल शाम इराक के किर्कुक, मोसुल व सलाहुद्दीन में प्रभाव रखता है और आइएसआइएस के खिलाफत के दावे को स्वीकार नहीं करता। दोनों के बीच खूनी झड़पें हुई हैं, तो दूसरी ओर मोसुल में जमात के आतंकी आइएसआइएस में शामिल भी हुए हैं। सद्दाम के वफादार बाथिस्ट पार्टी के सदस्य और नक्शबंदी गुट आइएसआइएस से अलग रहते हुए उसके साथ तालमेल बिठाए हुए हैं। ये भी भविष्य में सत्ता में भागीदारी और अपना अलग स्थान मांगेंगे। 10 साल पुराना जैश अल मुजाहिदीन और सुन्नी अरब एका समर्थक इस्लामिक आर्मी ऑफ इराक भी शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में झुकाने का प्रयास कर रहे हैं। इन 5 प्रमुख संगठनों के अलावा भी अनेक आतंकी संगठन सक्रिय हैं। सऊदी अरब, तुर्की, जार्डन, कतर आदि देश अलग-अलग संगठनों का साथ दे रहे हैं।
शतरंज की बिसात
पश्चिम एशिया में बाजी उलझी हुई है। यहां की क्षेत्रीय राजनीति में सुन्नी देश हावी रहे हैं। पर इनकी ताकत एक खोखलापन बनकर रह गई, क्योंकि इन देशों के तानाशाही शासक वर्ग अपनी जनता से कटे रहे। इनमें सबसे प्रभावशाली सऊदी अरब है, जो तेल का सबसे बड़ा निर्यातक है, पर इस अकूत संपत्ति के बाद भी भू-राजनैतिक शक्ति नहीं है। शाही परिवार की सुरक्षा की गारंटी अमरीका देता है। 1979 में क्रांति के बाद ईरान क्षेत्रीय शक्ति बनकर उभरा। ईरान-इराक युद्ध के बाद वो और मजबूत हुआ। पश्चिम द्वारा तमाम प्रतिबंधों के बावजूद ईरान अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। फारस की खाड़ी में आज वो सबसे बड़ी ताकत है। इराक में सद्दाम के बाद शिया सत्ता में आए, तो ईरान के प्रभाव वाली ईरान-इराक-सीरिया और लेबनान की शिया पट्टी उभरी। सऊदी अरब व अन्य सुन्नी अरब इससे असहज हुए। अरब स्प्रिंग के बाद जब सीरिया में सुन्नी जिहादी लामबंद होने लगे, तो क्षेत्र में ईरान को कमजोर करने की फिराक में लगे अमरीका व पश्चिमी देश जिहादियों की मदद करने लगे।
सीआईए ने उन्हें हथियार व प्रशिक्षण देना शुरू किया, पर सीमित दायरे में, क्योंकि उन्हें पता था कि असद के जाने के बाद सीरिया दूसरा अफगानिस्तान बन जाएगा। इजराइल की स्थिति आगे कुआं पीछे खाई की हो गई। असद के जाने से उसका पुराना दुश्मन ईरान कमजोर होता था, पर असद के बाद उसके पड़ोस में तैयार होने वाला सुन्नी जिहादियों का स्वर्ग उसकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा था। सऊदी अरब सबसे ज्यादा उत्साही था। पर उसके पास सीरिया तक जाने की जमीन नहीं थी। सीरिया से 4 देशों की सीमाएं लगती हैं-लेबनान, तुर्की, इराक व जार्डन। लेबनान व इराक तो शिया शासन के कारण कोई काम के नहीं थे। तुर्की इस झंझट में पड़कर उसके यहां के इस्लामी अतिवादियों को प्रोत्साहित नहीं करना चाहता था। ले देकर बचा जार्डन, जो सऊदी अरब पर कई कारणों से निर्भर था। तो सऊदी अरब ने सीरिया में असद के खिलाफ सुन्नी बागियों की मदद के लिए जार्डन की बांह मरोड़नी शुरू कर दी। ईरान व रूस असद का साथ देते रहे। इस बीच आइएसआइएस व दूसरे सुन्नी आतंकी चौंकाने वाली तेजी से इराक पर चढ़ आए, तो अचानक सारे समीकरण उलट गए।
अमरीका को दूसरा अफगानिस्तान दिखने लगा तो ईरान ने अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता का खतरा भांप लिया। रूस, अमरीका व ईरान-इराक सरकार की सहायता के लिए आगे आए। सऊदी अरब का शाही परिवार भी बगदादी में दूसरा ओसामा देखने लगा, जो उसकी सत्ता को चुनौती देने वाला था। आइएसआइएस के लड़ाके कहते पाए गए कि काबा व मक्का में जारी परंपराएं गैर इस्लामी हैं, और वो इन स्थानों का विध्वंस करेंगे। संभलकर चाल चलते हुए सऊदी अरब ने आइएसआइएस को आतंकी संगठन करार दिया, पर दूसरे बागियों को मदद देने में जुट गया। इसके लिए उसने पाकिस्तान से हथियार ले़ने का प्रयास भी प्रारंभ कर दिया। वैसे भी पाकिस्तान इस उथल-पुथल का मूकदर्शक नहीं था। पाक सेना के कई पूर्व फौजी व अनेक पाक आतंकी इराक में बागियों के साथ मिलकर लड़ रहे हैं। इसमें पूर्व आईएसआई प्रमुख हामिद गुल का भी हाथ बताया जा रहा है। अवसर देखकर इराक के कुदार्ें ने स्वतंत्र कुर्द देश की अपनी पुरानी मांग को दोहराना प्रारंभ कर दिया, तो इजराइल ने इसे तत्काल अपना समर्थन दे दिया। अमरीका इजराइल को इस युद्ध से दूर रखना चाहता है, क्योंकि इस यहूदी देश का नाम आने से ही मुस्लिम जगत के समीकरण उलट पलट होने लगेंगे। आज से दो दशक पहले खाड़ी युद्ध के दौरान जब अमरीका और उसके मित्र देशों ने इराक पर हमला किया, तो सद्दाम हुसैन ने मुस्लिम भावनाएं भड़काने के लिए चुपचाप बैठे इजराइल की शहरी आबादी पर स्कड मिसाइल बरसानी शुरू कर दी थीं। अमरीका ने इजराइल की सुरक्षा के लिए अपनी पैट्रियॉट मिसाइल तैनात की पर इजराइल को एक गोली भी नहीं चलाने दी। संक्षेप में कहें तो अरब प्रायद्वीप के समीकरण इतने जटिल हैं, कि कोई भी पक्ष स्पष्टता से सोच पाता नही दिख रहा है।
ऐसे में आइएसआइएस क्या और कितना कर पाएगा? कौन बढ़त हासिल करेगा? आइएसआइएस की ये रफ्तार बनी रह सकेगी। इसमें संदेह है। जब इराक सरकार ईरान, रूस व अमरीका की सहायता से प्रतिवार करेगी तब ये जिहादी गुट उसके सामने कितना टिकेंगे ये भविष्य के गर्भ में है। आइएसआइएस द्वारा जारी किए गए नक्शे रणनीतिक नहीं हैं, बल्कि प्रचार का हिस्सा हैं। परंतु इसका अर्थ ये कतई नहीं है, कि इसे हल्के में लिया जा सकता है। तालिबान के बाद ये दूसरा जिहादी आतंकी संगठन है, जिसने एक देश जितने बड़े भूभाग पर नियंत्रण स्थापित किया है। तालिबान के उलट ये संगठन आधुनिक, पूर्णतया आत्मनिर्भर तथा विश्व इतिहास का सबसे धनी आतंकी संगठन है, जिसके कब्जे में इराक के महत्वपूर्ण तेल स्रोत हैंं। ये संगठन सारी दुनिया से मुस्लिम युवकों को इस प्रकार आकर्षित कर रहा है, कि इसने अलकायदा की अपील को फीका कर दिया है।
गुरिल्ला युद्ध में महारत दिखाने वाले आइएसआइएस का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण हथियार है, उसका प्रचार तंत्र। खिलाफत प्रतीकात्मक है, परन्तु धरातल पर उसके परिणाम विनाशकारी रहे हैं। इस खिलाफत में गैर सुन्नियों, गैर मुस्लिमों के स्वतंत्र अथवा जीवित रहने के लिए कोई स्थान नहीं हैं। ऐतिहासिक खिलाफतों द्वारा किया गया लाखों गैर मतावलंबियों का नरमेध इस बात की गवाही दे रहा है।










