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अक्सर हम लोग आत्मविश्वास के बारे में अनेक बातें सुनते रहते हैं। वैसे आत्मविश्वास चीज ही ऐसी हैै। अगर आप आत्मविश्वास से भरपूर हैं और फौलादी इरादों वाले हैं,तो शायद ही कोई कठिनाई आपके मार्ग में बाधा बने। आत्मविश्वास वह सुरक्षा कवच है,जो आने वाली प्रत्येक कठिनाई से आपकी रक्षा करता है और सदैव आपको सफलता के मार्ग की ओर अग्रसर करता है। लेकिन प्रश्न उठता है कि आत्मविश्वास पैदा कैसे हो ?
हाल ही में प्रकाशित प्रो.पी.के आर्य की पुस्तक ह्यआत्मविश्वासह्ण में कुछ ऐसी ही चीजों को समाहित किया गया है,जिनसे आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और व्यक्ति उसी पथ पर चलकर अपने लक्ष्य या परिणाम को पा सकता है। पुस्तक में कुल 7 खंड हैं। पुस्तक के खंड ह्यआत्मविश्वास का महत्वह्ण में लेखक ने लिखा है कि जीवन में सफलता अर्जित करने के लिए आत्मविश्वास सबसे पहली व अनिवार्य शर्त है। अगर आपको सफल होना है तो स्वयं अपने अंदर झांक कर देखने तथा खुद पर विश्वास करने का हौसला पैदा करना होगा। जिस दिन आपके अंदर यह शक्ति आ जायेगी उस दिन दुनिया की कोई भी ताकत नहीं है,जो आपको आपके लक्ष्य से डिगा दे। चीन में एक लोकप्रिय कहावत प्रचलित है- कि जो अपनी कीमत स्वयं नहीं लगा सकता वह दूसरे की कीमत नहीं जान सकेगा। प्रख्यात पाश्चात्य लेखक स्वेट मार्डेन ने आत्मविश्वास को लेकर कहा है कि ह्यआत्मविश्वास सर्वोत्तम पूंजी है। इससे अधिकांश बाधाएं दूर हो जाती हैं तथा अधिकतर कठिनाइयों पर स्वत: ही विजय प्राप्त हो जाती है। आत्मविश्वास द्वारा जितने महान साहस के कार्य संपन्न होते हैं,उतने अन्य किसी भी मानवीय गुण के कारण नहीं होते।ह्ण पुस्तक के खंड ह्यमानसिक संवेगों से प्रभावित होता है आत्मविश्वासह्ण पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। यह अध्याय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें बताता है कि कौन-कौन सी चीजंे हमारे आत्मविश्वास को प्रभावित करती हैं। लेखक ने इनको दो श्रेणियों में बांटा है-नाकारात्मक व सकारात्मक नकारात्मक में ईर्ष्या, चिन्ता, दुख, भय, हीन भावना, क्रोध, असुरक्षा, हिंसा, निंदा, छल, प्रपंच, षड्यंत्र जैसी चीजें हमारे आत्मविश्वास को उत्पन्न ही नहीं होने देतीं। वहीं सकारात्मक संवेग शान्ति, स्नेह, सौहार्द, प्रेम, दान की भावना, ईश्वर के प्रति श्रद्धा, समर्पण, संयम, उत्साह, निष्पक्षता, निर्भीकता आदि व्यक्ति के अंदर विराजमान हैं तो यह सभी उसके सफलता के मार्ग प्रशस्त करती हंै। समाज में हम देखते हैं कि सकारात्मक विचार वाले लोग अन्य व्यक्तियों के मुकाबले अधिक सफल, लोकप्रिय व प्रभावशाली होते हैं। लोग उनकी स्वयं ही मदद करने को उत्सुक रहते हैं। उनके बड़े से बड़े व जटिल कार्य भी कुछ ही प्रयासों से सिद्ध हो जाते हैं।
सबसे प्रमुख बात यह है कि आत्मविश्वास बढ़ता कैसे है? पुस्तक के खंड ह्यरचनात्मकता से बढ़ता है आत्मविश्वासह्ण में महात्मा गांधी द्वारा कही बात से अध्याय की श्ुारुआत होती है,जिसमें उन्होंने कहा है कि ह्यआत्मविश्वास बढ़ाने की रीति यह है कि तुम वह काम करो,जिसे तुम करते हुए डरते हो। इस प्रकार तुम्हें उस कार्य में ज्यों-ज्यों सफलता मिलती जाएगी, तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ता जाएगा।ह्ण
कई बार हम देखते हैं कि आत्मविश्वास की कमी ही हमारी बहुत सी असफलताओं का कारण होती हैं,उसके पीछे एक कारण प्रमुख होता है वह है ह्यसाहसह्ण, जो कि जीवन में आने वाली अनिगिनत कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। पुस्तक के खंड ह्यसाहस से बढ़ता है आत्मविश्वासह्ण में लेखक ने लिखा है कि व्यक्ति को जटिल हालातों में भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। उसका डटकर साहस के साथ सामना करना ही उसका ध्येय होना चाहिए। आत्मविश्वास सफलता प्राप्त करने वाले मनुष्यों के लिए एक ब्रह्मास्त्र का रूप है। इस ब्रहाास्त्र द्वारा मनुष्य बड़ी से बड़ी बाधाओं को सरलता से पार कर लेता है। लेकिन ब्रह्मास्त्र का प्रयोग वही करते हैं,जो जीवन में सफल होना चाहते हैं। कुल मिलाकर पुस्तक प्रत्येक वर्ग के लिए पठनीय है। लेखक ने पुस्तक में अनेक लोगों के जीवन चरित को प्रस्तुत कर यह बताने का प्रयास किया है कि कैसे इन लोगों ने अपने आत्मविश्वास के चलते अपने लक्ष्य को न कि पाया बल्कि पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गए।
पुस्तक का नाम – आत्मविश्वास
लेखक – प्रो.पी.के. आर्य
प्रकाशक – प्रभात प्रकाशन
4/19 आसफ अली रोड,
नई दिल्ली-110002
मूल्य -125 रु., पृष्ठ – 99
विचारों और स्थितियों से अवगत करातीं कहानियां
भारत में कहानियां कहने की समृद्ध परंपरा है और यह चलन पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। शायद ही कोई भारतीय ऐसा हो, जिसने कहानियां न सुनी हों। कहानी की बात जैसे ही प्रारम्भ होती है सभी के मन में चाहे व वृद्ध हों या बच्चे उनको वह दिन और वे कहानियां याद आने लगती हैं,जो उन्होंेने अपने माता-पिता,भाई-बहन,बाबा-दादी या घर के अन्य बड़े बुजुर्गों से सुनीं थीं। वे सभी कहानियां हमें कुछ न कुछ सीख अवश्य दे जाती थीं।
प्रस्तुत पुस्तक ह्यवाह जिंदगी,वाह!ह्णलेखक सुनील हांडा की हाल ही में प्रकाशित ऐसी ही पुस्तक है,जिसमें 333 कहानियों को संकलित किया गया है। ये कहानियां प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से जुड़ी हैं और सीख देती हैं। पौराणिक कथाएं,लोक कथाएं,परी कथाएं और नीति कथाएं बहुत ही प्राचीन समय से अस्तित्व में हैं। वैसे हमारे जीवन पथ में यहीं कहानियां कई काम करती हैं-किसी बिन्दु को प्रभाव से कहती हैं,और समाज में हो रही विभिन्न चीजों को स्पष्ट करती हैं। कहानियां समाज के सामने व्यवहार और चरित्र के निश्चित आदर्श रखती हैं,जैसे-सत्यनिष्ठा, दयालुता, सौम्यता, क्षमादान, नम्रता, स्थिरता, वीरता, शांति, निर्भयता, आत्मसंयम आदि।
पुस्तक की कहानी ह्यसौ फीसद महत्वह्ण में लेखक ने गुरु और शिष्य की ऐसी ही एक कहानी को लिखा है- कि एक विद्वान गुरु के निधन के बाद नए गुरु ने एक दिन एक शिष्य से पूछा ह्यतुम्हारे गुरु जी ने सबसे ज्यादा अहमियत किस बात को दी?ह्ण इस बात पर शिष्य एक क्षण के लिए सोच में पड़ गया और फिर बोला वे जिस समय जो भी काम कर रहे होते थे उस काम को सौ फीसद महत्व देते थे।ह्ण
कहानियां सदैव से हमारी भावनाएं,जैसे प्रेम करुणा,क्षमा समर्पणभाव को जगाती हैं और साथ ही बच्चों से लेकर बड़ों तक में मूल्यों को विकसित करती हैं। ये सृजनशक्ति बढ़ाती हैं एवंं उन्हें नये-नये विचारों से अवगत कराती हैं।
आज के समय प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की खोज में स्थान-स्थान पर भटकता है, लेकिन फिर भी उसको ईश्वर के दर्शन नहीं होते। इसी से जुड़ी एक कहानी हैंह्यअसली ईश्वर तो माता-पिता हैंह्ण में वर्णित है कि सभी को ईश्वर के दर्शन या उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए? वैसे तो इनके अनेक रास्ते हैं,लेकिन जो सबसे आसान, बिना मेहनत का तरीका है,वह यह है कि हम अपने माता-पिता का सम्मान करें और उनकी देखभाल करंे। क्योंकि माता-पिता ही साक्षात् भगवान होते हैं और उनकी सेवा करके ही हम सही मायनों में ईश्वर दर्शन कर सकते हैं। प्रत्येक कहानी हमें कुछ न कुछ सीख और शिक्षा अवश्य दे जाती है। कहानी का अपने आप में अर्थ भी यही होता है कि उससे शिक्षा लेकर हम भविष्य में कोई भी ऐसा कार्य न करें जिससे हानि हो। ह्यसच्चे मन से काम ह्ण ऐसी ही एक मूर्तिकार की लगन और मेहनत को दर्शाती हुई कहानी है।
एक मूर्तिकार ने लकडि़यों से सरस्वती जी की मूर्ति तैयार की , मूर्ति को जो भी देखता वह उस मूर्ति व कलाकार की प्रशंसा किये बिना नहीं रह पाता। यह समाचार राज्य के राजा को पता चला तो उसने भी उसकी कला को देखा और प्रशंसा की । लेकिन अंत में राजा ने उस मूर्तिकार से पूछा कि अन्य लोग जो इस काम को करते हैं ,उनके पास तुमसे अधिक आधुनिक यंत्र हैं, लेकिन फिर भी वह इतनी सुन्दर मूर्ति नहीं बना पाते,आखिर कारण क्या है ? तो उस मूर्तिकार ने कहा कि ह्यजब भी मैं कोई मूर्ति बनाना शुरू करता हूं तो मैं दिमाग को शान्ति देने के लिए दो दिन तक ध्यान करता हूं और इस बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचता कि मुझे क्या इनाम या कितना पैसा मिलेगा । जब मैं पांच दिन तक ध्यान करता हूं तो इस बात की परवाह नहीं रह जाती कि कौन तारीफ करेगा या कौन निंदा और जब मैं सात दिन तक ध्यान करता हूं तो मैं अपने आप को ही भूल जाता हूं । इस सबके बीच अगर कुछ बाकी रहता है तो वह है मेरा कौशल। इन सभी चीजों के बाद मेरा हाथ कार्य करना शुरू कर देता है। फिर मैं कहां होता हूं इसका मुझे पता नहीं। और उसके बाद जो कलाकृति तैयार होती है वह सुन्दर ही होती है।ह्ण यह कहानी शिक्षा देती है कि जो भी कार्य मन और लगन से किया जाता है वह उत्कृष्ट होता है। कुल मिलाकर पुस्तक में लेखक द्वारा अनेक विषयों,प्रमुख चरित्रों के प्रसंगों का सहारा लेकर कहानियों को प्रस्तुत किया गया है। सुख-दुख,लाभ-हानि,उन्नति-अवनति और हर रंग की छटा लिए प्रेरणादायक कहानियां जीवन में आमूलचूल परिवर्तन की क्षमता रखती हैं।
अश्वनी कुमार मिश्र
पुस्तक का नाम – वाह जिंदगी, वाह!
लेखक – सुनील हांडा
प्रकाशक – प्रभात प्रकाशन
4/19 आसफ अली रोड,
नई दिल्ली-110002
मूल्य -300 रु., पृष्ठ – 231











