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भारतीय संस्कृति के दर्शन का एक अत्यंत सरल सा सूक्त है- 'अंत में आपको वही मिलता है जिसके आप अधिकारी हैं। लोक-परलोक के साम्य-संतुलन को सहजता से परिभाषित करती, पूरे समाज को सही दिशा में साधने वाली यह बात अपने यहां पढ़े-बेपढ़े, धनी-दरिद्र सब समझते हैं। अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में यूपीए सरकार भी यह बात समझ रही है और इसीलिए सहमी हुई है। जो बोया उसे काटने का वक्त सरकार के लिए कष्टकारी है।
सरकार के लिए इससे ज्यादा दु:ख की बात क्या होगी कि उसके होनहार वारिस अपने नाम की मुनादी से पहले ही जनता दरबार से खारिज कर दिए गए और उसका सबसे उजला चेहरा 2जी और कोयला घोटाले में धुंधला गया। सबसे पुरानी पार्टी की बातें आज जनता के मन में असर नहीं जगातीं बल्कि अश्रद्धा ही बढ़ाती हैं। अपनी तीसरी आकस्मिक प्रेस वार्ता में जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि 'मैंने हमेशा ईमानदारी से काम किया' तो उनके करीबी सहयोगी भी उनकी बात पर भरोसा करने को तैयार नहीं दिखते। लेकिन जब यही बात अशोक खेमका जैसे अधिकारी के मुंह से निकलती है तो लोगों को पता होता है कि बात में कितना दम है।
सरकार उस असहायता के भंवर में है जहां हर शमन रोग को और भड़का देता है। बांहें चढ़ाते युवराज जब भ्रष्टाचार के विरुद्ध भंगिमा बनाते हैं तो वाड्रा प्रकरण की प्रेतछाया वीरभद्र तक खिंची चली आती है और उनके अपने ही सैनिकों में खीझ और हताशा बैठा देती है। अध्यादेश फाड़कर वे जिस कालिख से पीछा छुड़ाते दिखना चाहते हैं, '…अयोग्यता कानून' का वह पहला शिकार ही बिहार उनकी ओर समर्थन का हाथ बढ़ाता दिखता है। गलतियां सबक लेकर आती हैं और अवसर बड़े हौले से दस्तक देते हैं, यह ऐसी सामान्य सी बात है जिसका ध्यान राष्ट्रहित के अहम फैसले लेते वक्त रखा जाना चाहिए था। किन्तु यूपीए कार्यकाल की विडंबना रही कि यहां अवसरों को देश की बजाय व्यक्तियों और कुछ खास तिजोरियों से जोड़ दिया गया। इससे भी बड़ी बात यह कि गलती लगातार दोहराई गई। भूल की माफी हो सकती थी परंतु इस दोहन और दोहराव ने बताया कि गलती अब अपराध है और दोष ना मानना अपराधी की आदत। संभवत: कालिख पुती कांग्रेस की यही ढिठाई यूपीए का जहाज डूबने की वजह साबित होने जा रही है और इसी आहट से सत्ता पाले में बौखलाहट का माहौल है। वैसे तो, अनुभव बड़ी चीज है और सरकार के पास राजनीति के कई पुराने चेहरे हैं, मगर लहरों के लगातार थपेड़े माहिर नाविकों को भी डरा देते हैं। भ्रष्टाचार के काले बादलों, बदलाव की लहरों और जनाक्रोश की कड़कती बिजलियों के बीच यूपीए के खेवनहारों के हाथ-पांव फूले हुए हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी विदाई की घोषणा के साथ ही साथियों का डर और बढ़ा दिया है। देखते रहिए, जो सत्ता-यात्रा वंश का कुंभ पूजते शुरू हुई थी अब जनज्वार में खोती दिखती है।











