| दिंनाक: 21 Dec 2013 15:15:20 |
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एक दिन की बात है। उस नदी में एक हाथी नहाने आया। हाथी धीरे-धीरे, झूम-झूम कर नदी की ओर बढ़ रहा था कि अचानक रुक गया। थोड़ी देर रुकने के बाद वह फिर नदी की ओर बढ़ने लगा। नंदू यह सब बड़े ही ध्यान से देख रहा था। उसने हाथी को आवाज दी, हाथी काका, सुनिए जरा।
हाथी नंदू के पास आकर बोला, क्या बात है बन्दर भाई?
मैं आपसे एक बात जानना चाहता हूं।
नंदू ने कहा।
बोलो भाई क्या बात जानना चाहते हो?
हाथी ने कहा तो नंदू ने पूछा, हाथी काका आप नदी की ओर जाते-जाते अचानक थोड़ी देर के लिए रुक क्यों गए थे?
बस इतनी सी बात। अरे भाई, मेरे रास्ते में चींटी रानी आ गई थी और अगर मैं नहीं रुकता तो वह बेचारी मर जाती।
यह सुनकर नंदू को बहुत खुशी हुई क्योंकि जैसा दोस्त वह चाहता था वह उसके सामने खड़ा था। अपने दोस्त के स्वागत में नंदू ने एक कटहल हाथी की ओर उछाला। यह सोचकर कि हाथी कटहल पाकर बहुत खुश होगा और मुझसे दोस्ती करने को तैयार हो जाएगा। परन्तु हुआ कुछ और। हाथी कटहल को पकड़ नहीं पाया और वह सीधे उसके सिर पर जाकर लगा। अब तो नंदू बहुत डर गया। वह सोचने लगा, अब क्या होगा? हाथी ने नाराज होते हुए कहा, क्यों भाई, तुमने मुझे कटहल फेंक कर क्यों मारा?
माफ करिए हाथी काका, मुझसे गलती हो गई। मैं आपको कटहल मारना नहीं, भेंट करना चाहता था।
नंदू ने डरते हुए बताया।
यह सुनकर हाथी काका बोले, कोई बात नहीं। तुमने अच्छे विचार से कटहल उछाला था, वैसे भी मुझे चोट नहीं आई। क्या तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते हो?
हाथी के क्षमा कर देने से नंदू बहुत प्रभावित हुआ। उसे चाहिए भी था ऐसा ही दोस्त। उसने तुरन्त ही हां कह दिया।
अब क्या था, नंदू और हाथी काका की दोस्ती हो गई। अब तो रोज हाथी नदी के किनारे आता और नंदू से घंटों बातें करता, नंदू को अपनी पीठ पर बैठा कर घुमाने ले जाता। नंदू भी हाथी काका को कटहल खिलाता और भी कई फल खिलाता। दोनों खूब खेलते। खूब मजे करते।
धीरे-धीरे समय बीता और बारिश का मौसम आ गया। आज बहुत बारिश हो रही थी। नंदू उदास बैठा था क्योंकि बारिश के कारण हाथी काका नहीं आए थे। नंदू सोच रहा था कि अगर इसी तरह बारिश होती रही तो नदी में बाढ़ आ जाएगी और अगर कहीं तूफान आ गया तो मेरा कैथे के पेड़ पर बना घर भी टूट जाएगा। यही सोच-सोच कर वह परेशान था।
हुआ भी वही जिसकी नंदू को आशंका थी। तूफान में नंदू का घर टूट गया। नदी में बाढ़ आ गई। चारों ओर पानी ही पानी था। नंदू अपने कैथे के पेड़ पर बैठा पानी में भीग रहा था। सर्दी से कांप रहा था। उसे विश्वास था कि उसे बचाने हाथी काका जरूर आएंगे। इसी आशा से वह बार-बार दूर-दूर तक देख रहा था। कुछ देर बार उसने देखा दूर से हाथी काका चले आ रहे थे। सूंड उठाकर जैसे कहते हुए डरो मत नंदू मैं आ रहा हूं।
हाथी काका नंदू के पास पहुंचे। झट से नंदू उनकी पीठ पर बैठ गया और हाथी काका नंदू के साथ बाढ़ से दूर चल पड़े। नंदू बहुत खुश था। वह बार-बार हाथी काका को धन्यवाद दे रहा था और मन ही मन सोच रहा था कि उसके सच्चे दोस्त ने सचमुच दोस्ती निभाई। आशीष शुक्ला