| दिंनाक: 23 Nov 2013 14:56:36 |
|
वर्षाकाल समाप्त होते ही देश के प्रमुख झीलों, नदियों, तालाबों और समुद्र तटों पर प्रवासी पक्षियों की चहलकदमी शुरू हो गई है। प्रवासी पक्षी प्रतिवर्ष जाड़े के दिनों में, जब उनके देश में बर्फ जमने लगती है, भोजन मिलना मुश्किल हो जाता है, तब भारत की ओर रूख करते हैं। फिर वसंत पंचमी के बाद अपने देश में लौट जाते हैं। इन दिनों गोधूली के समय आप देख सकते हैं कि कतार के कतार विभिन्न प्रकार के पक्षी आकाश मार्ग से कलरव करते हुए हिमालय की ओर से चले आ रहे हैं। प्रवासी पक्षियों में सर्वाधिक संख्या जलतटीय पक्षियों की होती है। इनकी कतार देखकर ऐसा लगता है मानो सैनिकों की पंक्तियां किसी युद्ध स्थल की ओर जा रही हैं।
मौसम बदलते ही सबसे पहले साइबेरिया के हंस और चीन से बतखों का आगमन होता है। इनकी मादाएं रास्ते में रुककर प्रजनन क्रियाएं मानसरोवर, पैगोंग, पाल्टी आदि झीलों के तट पर करती हैं। यहां कुछ दिनर रुककर अपने नवजात बच्चों के साथ मंजिल पर पहुंच जाती हैं। ये ऐसे पक्षी हैं जो प्रतिवर्ष निश्चित स्थान पर ही पहुंचते हैं। कुछ पक्षियों के पैरों में छल्ला पहनाकर देखा गया तो पता चला कि वे बिना भूल-चूक किये अगले वर्ष भी निर्धारित स्थान पर ही पहुंचे। इनके आने-जाने का समय और रास्ते निर्धारित हैं। अधिकांश पक्षी आसमान के नक्षत्रों से रास्ते का अनुमान लगाते हैं। कुछ पक्षी नदी-सरोवरों और घाटियों का सहारा लेते हैं। उत्तर से आने वाले पक्षी नैनीताल और दिल्ली के चिडि़याघर को ज्यादा पसन्द करते हैं। इस समय नई दिल्ली का राष्ट्रीय प्राणी उद्यान विदेशी पक्षियों से भरा हुआ है। इससे इस चिडि़याघर की शान निराली हो गई है।
राजस्थान का भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य विश्वभर के पक्षी प्रेमियों के लिए तीर्थस्थल बन गया है। यहां यूरोपीय देशों के पक्षी आते हैं। इस पक्षी विहार के मध्य भाग में एक झील है। यहां आने वाले पक्षियों में हंसावर, सारस, हवालिस, पनकौवा आदि प्रमुख हैं। यहां पक्षियों का प्रमाणिक अध्ययन किया जाता है। यूरोप से आने वाले पक्षी सर्वभोजी हैं। वे तालाबों के किनारे घूम-घूम कर मछलियां, घोघे, कछुए, मेढक आदि खाते हैं पर वे जल के भीतर तक नहीं जाते। गुजरात का नल सरोवर अमदाबाद के पास है। शीतकाल में यहां प्राय: 182 किस्म के पक्षी प्रवास पर आते हैं। तरह-तरह की बतखें, करकरा, खंजन, चूहा, जलकागा आदि। यहां कच्छ की दलदली भूमि पर एक साथ हजारों की संख्या में पक्षी बैठ जाते हैं तो लगता है पूरा कच्छ क्षेत्र अनगिनत प्रकार के कमल के फूलों से भर गया है। गुजरात में वन भी बहुत हैं और समुद्र का किनारा होने के कारण यहां बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा हो जाता है।
तमिलनाडु का वेदांतगत झील प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग है। यह झील 40 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। झील का एक तट समुद्र से मिला है। यहां 32 प्रकार के पक्षी डेरा डाल चुके हैं। यहां आने वाले प्रवासी पक्षियों में प्रमुख है- गल। इसे हिन्दी में गंगाचील कहते हैं। यह इंग्लैंड का खुबसूरत जलपक्षी है। इस झील के आस-पास बहुतेरे वृक्ष उनसे अच्छादित हो जाते हैं। वृक्ष के पत्ते तक ढक जाते हैं। इस समय यहां के बारहमासी पक्षी स्थान बदल लेते हैं। गल की पीठ और डैने राख के रंग के होते हैं, जबकि सिर, गर्दन और दुम सफेद रंग का होता है। इसी से मिलता-जुलता एक अन्य प्रवासी पक्षी है जिसे हंसावर कहते हैं। प्रतिवर्ष जाड़े के मौसम में भारत के सभी जलतट, पक्षी अभ्यारण्य और चिडि़या घरों को प्रवासी पक्षी बसेरा बना लेते हैं। वसन्त पंचमी के पश्चात यहां से प्रस्थान करते हैं।
पक्षी प्रवास का वैज्ञानिक अध्ययन सर्वप्रथम अरस्तू ने किया था। उनकी पुस्तकों में विशद् विवेचना है। उन्होंने लिखा कि यूनान के पक्षी नील नदी के उद्गम स्थान पर चले जाते हैं। महाकवि कालीदास ने अनेक प्रकार के हंसों में सवन हंस की चर्चा की है। इसकी बोली में अत्यधिक मिठास पाई जाती है। अंग्रेज लेखक स्टुअर्ट ने इसके स्वर को सुरीला और मधु बताया है। स्वाभाविक है कि ऐसे पक्षी को ही सरस्वती ने अपना वाहन बनाया जिसका स्वर इतना मधुर हो। उमेश प्रसाद सिंह