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अक–बका गए लोग सब, जब सुना कि एक हेक्टेयर में 22.4 क्विंटल धान उगा है। और वह भी भारत के सबसे पिछड़े समझे जाने वाले बिहार में। दावे पर यकीन ही नहीं हुआ तो देश–विदेश के कृषि वैज्ञानिक और पत्रकार दौड़े गए उस छोटे से गांव तक। चीन भला कहां पीछे रहने वाला था, आखिर उसका 19.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर धान पैदा करने का विश्व रिकार्ड टूट गया था। खूब छाना–फूंका, पर निकला खरा सोना, सुमन्त के खेत में 22.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर धान ही उगा था। भारत के कृषि मंत्री शरद पवार ने संसद में इसकी घोषणा कर वाहवाही लूटी। पर संकोची– शर्मीले सुमन्त बस अपनी खेती में जुटे हैं। नीतिश ने भी आलू उगाकर कीर्तिमान रचा यहां प्रस्तुत है उनकी कामयाबी की दास्तान–
प्रतियोगी भाव से युवा कुछ अच्छा करने के संकल्प में जुट जाएं तो नए कीर्तिमान रचे ही जाते हैं। ऐसा ही कुछ हो रहा है दरवेशपुरा में। नालन्दा जिले में नदी के किनारे बसे इस अकेले गांव से दो-दो विश्व कीर्तिमान बने हैं। धान और आलू के उत्पादन में इस गांव के दो किसानों ने विश्व गगन पर अपना परचम फहरा दिया है। सुमन्त कुमार और नीतिश कुमार को पता ही नहीं था कि धान और आलू उगाने से कोई कीर्तिमान भी बनता है। पर राज्य सरकार ने तीन-तीन बार जांच की और घोषित कर दिया सुमन्त के खेत में 22.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर धान और उन्हीं के पड़ोसी नीतिश के खेत में 19.6 क्विंटल हेक्टेयर धान पैदा हुआ है। गांव के और भी युवा किसान हैं जिनके खेत में 17 से लेकर 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक धान उगा। पास के मानंद गांव के धनंजय सिंह भी 19.5 क्विंटल तक उगा चुके हैं। वहां सामान्यत: प्रति हेक्टेयर धान का उत्पादन 2.5 से 3 टन तक होता था। 3 क्विंटल से 20 क्विंटल, हो गया न करिश्मा।
उधर नीतिश ने आलू भी बोया था। आलू उगा तो सब चकरा गए। 700-800 ग्राम का एक-एक आलू। खबर फैली तो जिला प्रशासन और कृषि विभाग के लोग आ डटे। सबके सामने हुई आलू की खुदाई और निकला 72.9 टन प्रति हेक्टेयर आलू। बन गया एक और कीर्तिमान।
इस सबकी शुरूआत कैसे हुई पूछने पर सुमन्त बताते हैं, 'हमारे बाप-दादा कहते थे कि 'हमार आलू और मरिचा (मिर्च) बाम्बे तक जात रहल। बित्ता-बित्ता (हाथ का पंजा) भर का होता था मरिचा। हमनी का कब्बो दूसरा के लेबर नाहीं रहनी।' उनकी बातें सुनकर मुझे लगता था कि हम भी वैसा क्यों नहीं कर सकते। क्यों हम अपने खेतों की पैदावार बढ़ाकर खुशहाल नहीं हो सकते। लिहाजा नौकरी छोड़ी और कुछ प्रयास किए तो पता चला कि धान उगाने की नई विधि आयी है, जिसे मेडागास्कर या श्री विधि कहते हैं। कृषि सलाहकारों से सब जानकारी जुटाकर जब श्री विधि से 5 साल पहले पहली बार फसल बोई तो साथियों ने ही कहा -'बुडबक कब्बो पेड़ पर धान लागेला' (बेवकूफ कभी पेड़ पर धान लगता है।) पर उसी साल अकेले पौधे पर जैसा धान उगा तो बाकी सब भी इसे अपनाने लगे और आज देखिए पूरा गांव खुशहाल है। हर घर में ट्रैक्टर से लेकर आधुनिक कृषि उपकरण आ रहे हैं।'
सुमन्त आगे की भी सोच रहे हैं। कहते हैं, 'रासायनिक उर्वरक के प्रयोगों से धरती बेकार हो रही है। हम नई तकनीकी के साथ परम्परागत जैविक कृषि का भी प्रयोग कर रहे हैं, इसलिए अधिक सफलता मिल रही है। मैंने अपने खेत में गोबर की खाद का अधिक प्रयोग किया। प्रयास यह कर रहे हैं कि रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के स्थान पर कचरे, गोबर और केंचुए आदि की खाद का ही प्रयोग करें और गोमूत्र से बनने वाले कीटनाशक भी आजमाएं।
उल्लेखनीय है कि धान पैदा करने की पारम्परिक तकनीकी में धान की रोपाई करते समय पौधों को पानी से भरे खेतों में रोपा जाता है। लेकिन श्री पद्धति में केवल पौधों की जड़ों में नमी रखना ही पर्याप्त होता है। इस तकनीकी से धान की खेती में जहां भूमि, श्रम, पूंजी और पानी खपत कम होती है वहीं उत्पादन कई गुना तक बढ़ जाता है। उल्लेखनीय यह भी है कि खाद्य की दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक क्षेत्र में खाद्यान्न का मुख्य भाग चावल ही है। ऐसे में दरवेश्पुरा के सुमन्त ने किसानों को एक नई राह दिखाई है। उस राह पर चलकर किसान न केवल देशवासियों के लिए अधिक अन्न उपजाकर अपना कर्तव्य निभा सकेंगे बल्कि उनके अपने घर भी धन-धान्य से भरे रहेंगे। बदहाल- कर्जदार किसान वाली छवि निश्चित रूप से बदलेगी।
क्या है श्री विधि
l पारम्परिक तरीके से अलग, इसमें 10 से 12 दिन नर्सरी में उगाने के बाद पौधा रोपा जाता है। l पुरानी पद्धति में 4-5 पौधे एक साथ बोए जाते थे। l इसमें एक-एक पौधा कम से कम 25 सें.मी. दूर रोपना होता है। l इससे खरपतवार आसानी से साफ किया जा सकता है। l लगातार पानी की जरूरत नहीं होती l कम खाद और कम कीटनाशक का प्रयोग l विश्व के 40 देशों में इसी विधि से धान उगाया जा रहा है।
ऐसे समय में, जब विश्व का हर सात में से एक व्यक्ति भूख की मार झेल रहा है, चावल की मांग उसकी कुल पैदावार से अधिक है, उसमें प्रति हेक्टेयर इतना उत्पादन उम्मीद की एक नई किरण है।
–जान विडाल
पर्यावरण सम्पादक, गार्डियन (इंग्लैण्ड)
अगर श्री पद्धति से पूरे क्षेत्र में धान की फसल लगायी जाए तो पूरे भारत में चावल की आपूर्ति इस पूर्वी क्षेत्र से ही हो सकती है। इस पद्धति से धान के उत्पादन में भारी वृद्धि होती है।
–कृष्ण मोहन सिंह
वैज्ञानिक, भारतीय कृषि अनुसंधान :- जितेन्द्र तिवारी











