रोटी और चांद दिंनाक: 23 Feb 2013 14:26:09 राजेन्द्र 'निशेश' मायावी दुनिया में चांद को रोटी समझ लेता है भूखा पेट। यह सच है कि कभी आदमी रोटी को खाता है और कभी आदमी को रोटी, रोटी और चांद का पुराना रिश्ता है मुन्ने राजा को 'चन्दा मामा दूर के...' गाकर मां बहलाने का यत्न करती है तो बेटा करता है चांद को ही उसकी झोली में डालने की जिद्द, मां की हताशा की खाई में धकेल देता है उसका बाल हठ और मां थाली में उतार लाती है चांद को। किन्हीं के पास होती है रोटी बेहिसाब और किन्हीं के लिए रोटी बन जाती है कोई शाप, चांद कभी अपना अपनत्व नहीं छोड़ता कतरा-कतरा सहानुभूति का अमृत टपकाता रहता है अपनी संवेदना भरी आंख से। इस मायावी दुनिया में स्वयं ईश्वर मायावी लगता है।