ये बेचारी मांऐं दिंनाक: 05 Jan 2013 14:14:24 बेचारी मांऐं राष्ट्रबन्धु मां कहकर हमने गंगा को, किया प्रदूषित रौरव नर्क। वह बीमार हुई तो मांगे, खर्चा, चन्दा बेड़ा गर्क। गाय नहीं बन सकी कुमाता, हम कपूत दुख देते हैं। बाहर जाकर पेट भरे वो, बूंद-बूंद दुह लेते हैं।। स्व संस्कृति सर्व उपकारिणी, ज्ञान सन्देश देती 'गीता'। गंगा यमुनी भाषा प्यारी, आदर्श जननी देवी सीता।। भारत माता के बेटों ने, खूब चलाया है अभियान। बेच दिया अपना चरित्र है, हम स्विस बैंकों के धनवान।। माता बेचारी रोती है, हम उससे करते हैं द्रोह। कैसा ऋण सम्बन्धों में है, काम-वासना का विद्रोह।। बल की इच्छा दुर्गा माता, धन की इच्छा लक्ष्मी मां। हम सरस्वती के बेटे हैं, नहीं चूकते हां-हां-हां।। मां भी दूर-दूर रहती है, नहीं भावना में बहती है। मतलब के बेटों से माता, अब तो सावधान रहती है।।