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पतित पावनी गंगा, शस्य श्यामला यमुना और अंत:सलिला सरस्वती के पावन संगम स्थल 'प्रयाग' में इस वर्ष मकर संक्रांति (14 जनवरी) से कुंभ का योग बना है। माघ मास में बनने वाले इस अद्भुत संयोग को सर्व मनोकामना सिद्धि पर्व के रूप में मान्यता प्राप्त है। यही कारण है कि विश्वभर में हिन्दुओं को इस पर्व की प्रतीक्षा रहती है। साधु-संत हों या गृहस्थ, गरीब हों या अमीर, सबकी इच्छा होती है कि इस धार्मिक पर्व से लाभ प्राप्त करने के जो भी मानदंड शास्त्रों, पूज्य संतों, धर्माचार्यों या समाज द्वारा निर्धारित हैं, उनके अनुरूप कम से कम एक बार चलकर पुण्य प्राप्त किया जाए।
प्रयाग में इस पावन पर्व की शुरुआत कब हुई, इसका कोई प्रामाणिक अभिलेख नहीं है। लेकिन मान्यता है कि जैसे सृष्टि के प्रादुर्भाव से प्रयाग को महत्व मिला ऐसे ही समुद्र मंथन के बाद से प्रयाग सहित तीन अन्य नगरों हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में कुंभ पर्व का आयोजन शुरू हुआ। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि देवासुर संग्राम में समुद्र मंथन में निकले अमृत कलश (कुंभ) को छिपाने के लिए गरुण को मृत्युलोक से भी गुजरना पड़ा था। अमृत कलश छिपाने की हड़बड़ी में जहां जहां कलश रखना पड़ा अथवा जहां उस कलश में रखे अमृत की बूंदें छलकीं, वहां-वहां कुंभ पर्व मनाने की मान्यता चल पड़ी। 12 वर्ष बाद उक्त चारों स्थानों पर कुंभ पर्व के आयोजन के पीछे भी देवासुर संग्राम का तर्क दिया जाता है। माना जाता है कि वह संग्राम 12 दिन तक चला था अत: प्रत्येक स्थान पर कुंभ का आयोजन 12 वर्ष बाद होता है। प्रयाग में कुंभ के लिए ग्रहों तथा राशि का बड़ा योगदान है। माघ मास में जब बृहस्पति मेष राशि में तथा चंद्रमा व सूर्य मकर राशि में होते हैं, तब 12 वर्ष बाद प्रयाग में कुंभ पर्व का आयोजन होता है। उल्लेखनीय है कि बृहस्पति अपना राशि चक्र 11 वर्ष 11 माह 27 दिन में पूरा करता है, इसी कारण कुंभ 12 वर्ष बाद आता है।
स्नान पर्व और उनका महात्म्य
कुंभ के धार्मिक महत्व का ज्ञान हमें स्कंधपुराण, कूर्म पुराग, मत्स्य पुराण, शताध्यापी, प्रयाग महात्म्य, कृत कल्पतरु आदि प्रामाणित ग्रंथों में किसी न किसी रूप में प्राप्त होता है। इतिहास के आईने में कुंभ को खोजें तो इसे हम प्राचीन सिंधु घाटी के हड़प्पा और मोहन जोदड़ो से भी प्राचीन पाते हैं। माना जाता है कि ईसा पूर्व 3464 में माघ मास में अमावस्या के दिन संगम तट पर कुंभ योग में नागा संत स्नान के लिए एकत्र हुआ करते थे। कुंभ पर्व तो पूरे माघ मास चलता है लेकिन मुख्य स्नान पर्व तीन माने जाते हैं-इसमें पौष पूर्णिमा, माघ मास की अमावस्या तथा माघ मास की पूर्णिमा को स्नान का महत्व अलग-अलग महर्षियों द्वारा स्थापित किया गया है। सबसे पहले आदि शंकराचार्य द्वारा गठित नागा संन्यासियों के स्नान से अमावस्या का महत्व हुआ तो ईसा पूर्व 2382 में महर्षि विश्वामित्र ने माघ पूर्णिमा पर संगम स्नान का महत्व स्थापित किया। कालचक्र आगे बढ़ा तो ईसा पूर्व 1302 में महर्षि ज्योतिष ने पौष माह की पूर्णिमा को संगम स्नान के प्रमुख पर्वों में जोड़ दिया। इन प्रमुख पर्वों से इतर अब माघ मास की वसंत पंचमी भी प्रमुख स्नान पर्वों में शामिल हो गयी है। कुंभ में आने वाले अखाड़ों का अंतिम शाही स्नान इसी वसंत पंचमी को होता है।
हिन्दू धर्म शास्त्रों में कुंभ के साथ साथ प्रयाग, संगम, गंगा तथा माघ मास में गंगा या संगम स्नान के महत्व का विशद् वर्णन मिलता है। पुराणों में कहा गया है कि-
सहस्रं कार्तिके स्नानं, माघे स्नान शतानि च,
वैशाखे नर्मदाकोटि: कुंभ स्नानेन तत्फलम्
अर्थात कार्तिक मास में एक हजार बार, माघ मास में सौ बार गंगा स्नान, वैशाख में नर्मदा में करोड़ बार स्नान से जो फल प्राप्त होता है वह प्रयाग में एक बार कुंभ पर्व पर स्नान करने से प्राप्त होता है। इसी क्रम में पुराणों में यह भी उल्लेख है कि एक हजार अश्वमेघ यज्ञ, सौ बाजपेय यज्ञ तथा एक लाख बार पृथ्वी की परिक्रमा करने से जो फल मिलता है उससे कहीं अधिक फल प्रयाग में कुंभ में स्नान करने पर प्राप्त हो जाता है।
राशि गणना के अद्भुत संयोग से होने वाले कुंभ पर्व में स्नान, ध्यान, दान आदि का कितना विशेष फल प्राप्त होता है इसका सहज आकलन पद्म पुराण में वर्णित इस तथ्य से किया जा सकता है जिसमें माघ मास में ही संगम स्नान को जीवन के लिए धन्य बताया गया है-
'पापानि सर्वाणि विलोप्यलीलया,
नूनं प्रयाग: स: कथं न सेव्यते।'
माना जाता है कि माघ मास में तीन पावन नदियों का संगम होने के कारण इस स्थान का महत्व बढ़ जाता है। माघ मास में यमुना स्नान करने से सूर्य लोक की प्राप्ति होती है। सरस्वती के जल में स्नान से पापों का नाश और ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है तथा गंगा में स्नान से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। प्रयाग ही एकमात्र स्थल है जहां तीनों नदियों का पावन संगम है। यहां स्नान करके एक साथ तीनों पुण्य लाभ अर्जित किये जा सकते हैं। धर्म शास्त्रों में कुंभ, प्रयाग और संगम को मिले महत्व ने एक धार्मिक आयोजन का रूप ले लिया। समय के साथ इस आयोजन का स्वरूप परिवर्तित और विशद् होता गया। आदि शंकराचार्य उन प्रमुख और अग्रणी विभूतियों में हैं जिन्होंने तमाम साधु-संतों को एक साथ यहां उपस्थित होने के लिए प्रेरित किया और इसे महा सम्मेलन या मेले का स्वरूप प्रदान किया। आदि शंकराचार्य द्वारा धर्म रक्षा के लिए गठित संन्यासियों की सेना की परंपरा में अब अखाड़े कुंभ में आकर्षण के प्रमुख केन्द्र होते हैं।
अद्भुत, अप्रतिम शोभा
कुंभ पर्व पर संगम की रेती पर आने वाले पूज्य शंकराचार्य, विभिन्न मत-पंथों से जुड़े धर्माचार्य, आचार्य, साधु-संत, संन्यासी, श्रद्धालु तो आकर्षण और कौतुहल के विषय होते ही हैं, लेकिन पूरे विश्व के हिन्दू समुदाय को प्रतीक्षा रहती है नागा संन्यासियों के शाही स्नान की। एक समय ऐसा था जब ये नागा संन्यासी ही कुंभ पर्व की पूरी व्यवस्था संभालते थे। सबसे पहले नागा संन्यासी ही डुबकी लगाते थे, लेकिन 16वीं शताब्दी के बाद इसमें परिवर्तन आया। अब नागा संन्यासियों के अखाड़ों के लिए क्रमवार समय निर्धारित है। स्नान के लिए जाते नागा संन्यासियों और साधु-संतों के अखाड़े अपने पूरे वैभव का प्रदर्शन करते हैं। अखाड़ों की धर्म ध्वजा लिये नागा संन्यासी, उनके पीछे भव्यता से सजे रथों पर आचार्य, मण्डलेश्वर, महा मण्डलेश्वर, श्रीमंत अपने परंपरागत वाद्य यंत्रों, साधु-संतों तथा श्रद्धालुओं के विशाल समूह के साथ आते हैं। इसे देखने के बाद मुंह से बरबस यही निकलता है-अद्भुत, अप्रतिम, अकल्पनीय।
प्रयाग कुंभ 2013 की तैयारी अब अपने अंतिम चरण में है। हमेशा की तरह इस वर्ष भी कुंभ में देश-विदेश से आने वाले करोड़ों साधु-संतों, श्रद्धालुओं, पर्यटकों के लिए संगम की रेती पर एक अलग अस्थायी नगर बसाया गया है, जिसे कुंभ नगर का नाम दिया गया है। कुल 8750 बीघे भूमि पर फैले इस नगर के प्रशासनिक, पुलिस, पेय जल, सड़क, चिकित्सा तथा अन्य सभी कार्यों के लिए संबंधित विभागों के अधिकारियों तथा कर्मचारियों की अलग से तैनाती की गयी है। मेलाधिकारी का एक पद अलग से सृजित किया गया है।
वैसे तो इस बार माघ मास भर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ इस नगर में बनी रहेगी लेकिन सर्वाधिक भीड़ माघ मास की अमावस्या को दिखायी पड़ेगी। आकलन है कि इस दिन करोड़ों लोग स्नान के लिए यहां आएंगे। देश के कोने-कोने से श्रद्धालुओं को लाने के लिए रेलवे के साथ साथ तमाम पड़ोसी राज्यों ने अपनी परिवहन बसें तैयार कर रखी हैं। मेले में मुख्य स्नान पर्व कुल पांच होंगे-
1-मकर संक्रांति-14 जनवरी, 2-पौष पूर्णिमा-27 जनवरी, 3-मौनी अमावस्या-10 फरवरी, 4-वसंत पंचमी-15 फरवरी और 5-माघी पूर्णिमा-25 फरवरी
कुंभ मेला परिसर को बसाने के लिए रेत और मिट्टी को समतल करके भूमि आवंटन का कार्य प्रारंभ हो गया है। कुंभ के आकर्षण अखाड़ों को सर्वप्रथम भूमि आवंटित की गयी है। सबसे बड़े अखाड़ों जूना तथा अग्नि और आवाहन ने तो भूमि पूजन करके मेला क्षेत्र में अपनी धर्म पताकाएं भी फहरा दी हैं। देश विदेश के लोग इन अखाड़ों का शाही स्नान निम्न तिथियों पर देख सकेंगे-
1. 14 जनवरी, मकर संक्रांति– प्रथम शाही स्नान 2. 10 फरवरी, मौनी अमावस्या– द्वितीय शाही स्नान 3. 15 फरवरी, वसंत पंचमी– तृतीय (अंतिम) शाही स्नान
संगम पर कल्पवास
अखाड़ों के बाद यदि किसी को महत्व दिया जाता है तो वे हैं कल्पवासी। संगम तट पर कल्पवास की परंपरा अपने आप में एक अनूठी और गृहस्थ के लिए एक बड़ी तपस्या है। कुंभ क्षेत्र में पूरे 11 माह निवास, दो समय गंगा स्नान, एक समय भोजन और शेष समय भजन व प्रवचन में व्यतीत करना। कल्पवास के लिए आने वाले अधिकांश श्रद्धालु 'प्रयागवाल', जिन्हें आम भाषा में 'पड़ा समाज' कहा जाता है, के शिविरों में निवास करते हैं। इस वर्ष 30 लाख कल्पवासियों के आने का आकलन किया जा रहा है जो लगभग 400 तीर्थ पुरोहितों के शिविरों में निवास करेंगे। तीर्थ पुरोहितों को इस बार 900 बीघा भूमि आवंटित की गयी है। कुंभ पर्व के आयोजन की व्यवस्था के लिए केन्द्र और राज्य सरकार ने 1100 करोड़ का बजट आवंटित किया है। भौगोलिक स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में इस बार गंगा नदी पर 18 पैन्टून पुल बनाये गये हैं जिससे कि तीर्थयात्रियों को ज्यादा न चलना पड़े। मेले में 100 बिस्तरों के केन्द्रीय अस्पताल के साथ साथ 20-20 बिस्तरों के अस्पताल 10 बड़े सेक्टरों में बनाये गये हैं। इस बार नदी में स्टीमर एम्बुलेंस भी तैयार रहेगी।











