धनवान नहीं, कंगाल! दिंनाक: 29 Dec 2012 13:29:21 घमंडीलाल अग्रवाल हम हुए धनवान इतने हम बने कंगाल! बेच आंखों की शरम दी खो दिया विश्वास, स्वर्ण-मुद्राएं जमा कर लिख रहे इतिहास, कोई रोता है भला क्यों हम न पूछें हाल! प्रीति को विधवा बनाया बांह झूमे बैर, स्वार्थ को पूजा हमेशा अब पिता भी गैर, जिंदगी में हैं लबालब नफरतों के ताल! कुछ चलें, थोड़ा रुकें फिर इस तरह की सोच, पंछियों के पर कतर दें देह डालें नोच, झूठ के घर में गुजारें दिन, महीने, साल! काम करने में तलाशें क्या नफा-नुकसान, दें बना उसको कठिनतम जो रहे आसान, हों बला से खूब महंगे नून, आटा, दाल! हम हुए धनवान इतने हम बने कंगाल!