अतिथियों का रूठना-मनाना
|
अतिथियों का रूठना–मनाना
मृदुला सिन्हा
परिवारिक जीवन में सभी रिश्तों का मान होता है। भिन्न-भिन्न रिश्ता, भिन्न-भिन्न तासीर अपने रिश्ते के अनुसार उनका मान भी होता है। यूं तो सभी रिश्ते दूसरों से मान की अपेक्षा रखते हैं। उन्हें यथोचित मान भी दिया जाता है। चाहे वे एक-दूसरे से कितने भी दूरी पर बैठे हों। रिश्ते के बड़े-छोटे होने के अनुसार ही अभिवादन के प्रचलित शब्द भी हैं।
इन रिश्तों का मान-मनौवल, रूठना-मनाना, कोई भी उत्सव या यज्ञ के समय अधिक देखा जाता रहा है। जिस किसी के घर में विवाह या किसी भी प्रकार का आयोजन होता है। उससे उनके रिश्तेदारों की अपेक्षाएं बहुत बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में उत्सव करने वाला परिवार कितना भी सक्षम हो उसकी परीक्षा की घड़ी रहती है।
रिश्तों में बहन या बुआ का रिश्ता बड़ा ही होता है। वह घर में उम्र में भले ही भाइयों से छोटी हो, मायके में किसी भी यज्ञ में उसका महत्त्व बढ़ जाता है। कहा, देखा और समझा जाता रहा है कि मायके में कोई भी यज्ञ हो, बेटी का आना यज्ञ में शोभा बढ़ाना होता है।
उपनयन संस्कार 16 संस्कारों में आठवां संस्कार है। इस अवसर पर केवल अपने पारिवारिक और रक्त संबंध के रिश्तेदारियों का ही महत्त्व नहीं होता, ग्रामीण जीवन में जितने भी विभिन्न पेशे की जातियां होती हैं, वो एक-दूसरे पर निर्भर होती है। गांव की नींव और महल परस्पर निर्भरता पर ही खड़ा होता है। उपनयन संस्कार के अवसर पर लोहार, बढ़ई, ब्राह्मण, माली, कुम्हार जैसे अनेकानेक जातियों के द्वारा निर्मित सामान की जरूरत होती है। उपनयन संस्कार की तिथि निर्धारित हो जाने पर सभी जातियों के लोगों को अपेक्षा रहती है कि यज्ञकर्ता परिवार की ओर से उन्हें निमंत्रण मिलेगा। यह निमंत्रण भी देश के अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग प्रकार से दिया जाता है। मिथिलांचल में पान और थोड़े पैसे रखकर सबों को निमंत्रण दिया जाता है। यदि भूल से भी एक घर छूट गया तो पूछिए मत। बहुत अपमानित महसूस करता है परिवार। मनाने के लिए बहुत मान मनौवल किया जाता है। गांव वालों को भी सहयोग करना पड़ता है।
मेरे बचपन में मेरे बड़े भाई का उपनयन संस्कार था। माली दूसरे गांव में रहता था। उसे निमंत्रण नहीं दिया गया। उसे यज्ञ की तिथि की जानकारी तो थी ही। पूछिए मत। उसी समय वह आ गया। खूब ऊधम मचाया। उसे मनाते हुए बाबूजी की स्थिति देखने लायक थी। वे बड़े विनीत भाव में अपनी भूल स्वीकार रहे थे।
भोज का निमंत्रण देते हुए भी दो घरों में निमंत्रण नहीं पहुंचा था। किसी के स्मरण दिलाने पर बाबूजी स्वयं उनके दरवाजे पर पहुंच गए। पर वे भोज खाने नहीं आए। बाबूजी क्या, हमारा सारा परिवार दु:खी हो गया। फिर तो उन परिवारों से हमारा भोज का रिश्ता ही टूट गया।
दो महीने बाद ही उनके परिवार में बेटे का विवाह हुआ, मेरे पिताजी न्योता मिलने पर भी नहीं माने। पूरे गांव में चर्चा का विषय रहा। एक वर्ष बाद मेरी बुआ की शादी थी। उन दोनों परिवारों के रूठे हुए सभी सदस्य शामिल हो गए। उनका कहना था कि 'बेटी के विवाह' में रूठा नहीं जाता। वह तो गांव की बेटी होती है, किसी एक परिवार की नहीं।
यह तो गांव की बात हुई। रिश्तेदारियों में भी रूठना-मनाना खूब चलता है। यज्ञ करने वाला परिवार चाहता है कि उसके घर में यज्ञ होने पर सभी रिश्तेदारों को आना ही चाहिए। पर बहन और उसके परिवार का आना ज्यादा जरूरी होता है-
'बहिनिया बिनू ना शोभे मड़वा
बहनोइया बिनू ना शोभे दुअरा।'
उपनयन संस्कार में बहन (लड़के की बुआ) का मुख्य सहयोग मुंडन के समय लापर लेना है। मामा की आवश्यकता है कि वह झोली उठाता है। मंडप में टांगता है। दादी, मामी, चाची, बुआ, बड़ी दीदी और बच्चे की मां बच्चे की झोली में भिक्षा देती हैं। पुन: उसे अक्षत द्वारा आशीष देती हैं। इसलिए हर रिश्ते की जरूरत होती है। एक भी रिश्तेदार के नहीं आने पर सूना-सूना लगता है। किसी कारणवश किसी रिश्तेदार को न्योता भेजना छूट गया तो वह रिश्तेदार बहुत दु:खी हो जाता है। उनसे भी रिश्ता टूट सा जाता है। दूसरी ओर किसी दूर के या मुंह बोले रिश्तेदार को भी किसी यज्ञ का निमंत्रण मिल जाता है तो वह प्रसन्न हो जाता है।
मेरी एक बड़ी बुआ थीं। वे पास के गांव में ही रहती थीं। उन्हें अपने वृहद परिवार (पांच भाइयों का खानदान) में किसी शादी ब्याह की सूचना मिलने पर वे निमंत्रण (न्योता) के लिए बेचैन हो जातीं। किसी ने गलती से उन्हें न्योता नहीं भेजा तो वे रोया करती थीं। आसपास के लोग भी उन्हें चिढ़ाते थे। यहां तक कि गांव में भी किसी के घर यज्ञ हो तो वे आना चाहतीं थीं। कभी-कभी तो यज्ञ करने वालों को संवाद भिजवाती थीं।
शादी-ब्याह के अवसर पर रिश्तेदारों का रूठना-मनाना सुखद अनुभूति ही देता रहा है। कुछ लोगों का स्वभाव होता है कि अपने गांव या रिश्तेदारी में कोई यज्ञ होने पर वे जरूर रूठते हैं। उनका स्वभाव जानकर भी कोई उनकी अवहेलना नहीं करता। समाज के बंधन वाली बात होती है। दामाद और बहन-बेटी का रूठना तो सहज स्वभाविक होता है। मायके में जाकर बेटियां और ससुराल में बेटे दान-दहेज और नेग के लिए रूठते हैं। उन्हें मनाना भी घरवालों के लिए सुखद होता है। विवाह में दूल्हा रूठ जाए तो महिलाएं गाती हैं-
'मोटर लागी रूसल
छथीन लड़िला दामाद हे।
रुपया हई बाबू के पास,
अंगुलि धराई बाबू के
ले जायब बाजार हे।
लकड़ी के मोटर देबइन फुसलाय हे।'
मजाक भी किया जाता है। दामाद बुरा नहीं मानता। कभी-कभी तो महिलाएं गीत द्वारा उकसाती हैं-
'रूठु न पाहुन हमार हे, जरा रूठु रूठु
अच्छा घड़ी लागी रूठन लागू,
कागज के घड़ी देवे इनाम हे।'
भारतीय समाज में परिवारों के बीच सुमधुर संबंध बनाने में रिश्तेदारों के रूठने-मनाने का बड़ा योगदान है। किसी भी यज्ञ में एकत्रित होने पर लोग, विशेषकर बच्चे कितना सीखते हैं, अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इन संबंधों के बीच ही राष्ट्रीय एकता का सूत्र सबल होता है। इन आयोजनों को कायम रखना जरूरी है। सारे रिश्तेदारों के बीच रूठना-मनाना अपनी जगह है, लेकिन ये लोग सब काम में हाथ भी बंटाते हैं। तभी तो यज्ञ सफल होता है। यदि किसी यज्ञ में कोई रूठा नहीं तो मानो यज्ञ की शोभा ही नहीं बढ़ी।











