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वालमन-तीन वरदान

Written byArchiveArchive
Dec 1, 2012, 12:00 am IST
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दिंनाक: 01 Dec 2012 16:44:52

हारू नाम का एक बेडौल लड़का था। वह नाटे कद का था और उसकी नाक मोटी और छोटी थी। वह सदा ही गंदे और फटे-पुराने कपड़े पहने रहता था, क्योंकि वह बहुत गरीब था और विधवा बूढ़ी मां के अलावा उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था।

वह अनपढ़ होने के कारण कड़ी मेहनत के उपरान्त भी अपनी आवश्यकतानुसार नहीं कमा पाता था। उसकी मां फिर भी उस थोड़ी कमाई से अपना काम चला लेती थी, इसलिए हारू खुश था। उसकी छोटी नाक के कारण गांव के बच्चे उसे चिढ़ाते थे, जिसके कारण वह दु:खी रहता था।

जैसे दिन बीतते गये, हारू जवान हो गया। अपनी मां की मृत्यु पर हारू अत्यन्त दु:खी हुआ और उसके सिरहाने बैठकर रोता हुआ बोला- 'ओ मां! अब तुम मुझे छोड़कर चली गई हो, अब मेरी देखभाल कौन करेगा! मुझे कौन खिलायेगा?' पड़ोसी उसे समझाने आये। बड़े बुजुर्गों ने कानाफूसी की और फिर हारू को समझाने के लिए एक ओर ले गए।

'देखो हारू तुम्हारी मां अब नहीं रही,' मुखिया ने कहा, 'और अब तुम्हारे घरबार को देखने वाला कोई नहीं है, इसलिए अब तुम शादी कर लो। तुम्हारी क्या इच्छा है?'

यद्यपि वह शरमा गया पर उसे यह बात अच्छी लगी।

'साहब', वह हकलाते हुए बोला 'मैं आपको सोचकर कल जवाब दूंगा।'

अपनी स्वर्गवासी मां का क्रियाकर्म करके वह वापस घर लौटा। वह अकेलापन महसूस कर रहा था। 'मुझे विवाह करना ही पड़ेगा।' वह फिर बाहर ड्योढ़ी पर बैठकर अपने विवाह के बारे में विचार करने लगा।

दिनभर हारू अपने विवाह के बारे में सोचता रहा। उसने सोचा कि मुझे किसी सुन्दर लड़की से विवाह करना चाहिए, पर दूसरे ही क्षण उसे विचार आया, 'क्या यदि वह भी इन शैतान बच्चों की तरह मेरी छोटी नाक पर हंसेंगी तो! ना बाबा ना! मैं तो सुन्दर लड़की से विवाह नहीं करूंगा।' वह दुबारा सोचने लगा और काफी समय बाद नतीजे पर पहुंचा।

दूसरे ही दिन वह मुखिया से मिला और आदरपूर्वक कहा, 'मैं शादी के लिए तैयार हूं। पर उस लड़की की भी छोटी-सी नाक होनी चाहिए।'

उस वृद्ध आदमी ने पूछा, 'पर हारू, तुम ऐसी पसन्द क्यों कर रहे हो?'

हारू जमीन में अपनी नजर गड़ाता हुआ बोला, 'नहीं तो, साहब, वह मेरी छोटी नाक की हंसी उड़ायेगी।'

वह बुजुर्ग मुस्कराता हुआ बोला, 'खैर, हारू, मैं प्रसन्न हूं कि तुम शादी के लिए तैयार हो गए हो। मैं तुम्हारे लिए तुम्हारी पसन्द की लड़की ढूंढ़ने की चेष्टा करूंगा।'

एक दूर गांव में छोटी नाक वाली उपयुक्त कन्या ढूंढ़ी गई और हारू उससे शादी करके बड़ा खुश हुआ। पर उसका यह सुख क्षणिक था क्योंकि अब गांव के बच्चे उन्हें 'नकटे पति-पत्नी' कहकर चिढ़ाने लगे।

हारू ने उन्हें समझाने की भरसक कोशिश की। उसने अपनी बांह चढ़ाकर गलियों में उनका पीछा किया, उनके माता-पिता से शिकायत भी की, पर कोई फायदा नहीं हुआ। एक रात को वह बैठा-बैठा मन ही मन सोचने लगा, 'नहीं, कोई भी मेरी मदद नहीं करेगा, पर मुझे गांव में अपनी हंसी उड़वाते हुए अच्छा नहीं लगता। हाय! अब मैं क्या करूं?' अचानक उसे ख्याल आया-'परमात्मा ने ही तो हमें यह शरीर दिया है, मुझे सहायता के लिए उससे ही प्रार्थना करनी चाहिए। इसके अलावा और कोई उपाय नहीं है।'

प्रसन्नता से उसने अपनी पत्नी को पुकारा और कहा, 'जब तक मैं वापस न आऊं, तुम घर पर ही रहना,' दरवाजा अपने पीछे बंद करता हुआ वह जंगल की ओर चल दिया। घने जंगल में पहुंच कर उसे एक जमीन में गड़ा, बड़ा पत्थर दिखा। उस पर बैठकर वह ईश्वर को सहायता के लिए पुकारने लगा। सारा दिन बीत गया, वह ध्यान मग्न होकर बिना हिले-डुले और किसी चीज की परवाह किये बिना लगातार प्रार्थना करता रहा। उसकी लगन से कोई देवता प्रसन्न हुए और उसके सामने प्रकट हो गए। देवता को अपने सामने देखकर हारू का मन बाग-बाग हो उठा। बड़ी विनम्रता से उसने देवता को साष्टांग प्रणाम किया और फिर घुटनों के बल बैठकर हाथ जोड़कर करबद्ध निवेदन किया, 'प्रभो! प्रभो! मुझ पर कृपा कर मेरी प्रार्थना स्वीकार करो।' करुणानिधान प्रभु ने मुस्कुराते हुए उसे तीन बार गोटी फेंककर तीन वरदान मांगने को कहा।

हारू यह शुभ-संवाद अपनी पत्नी को सुनाने दौड़ा, 'सुनती हो!' वह चिल्लाया और जोर से दरवाजा खटखटाते हुए बोला, 'जल्दी खोलो।'

पत्नी ने जेसे ही दरवाजा खोलो, वह सीधा अपने पलंग पर जाकर राजा की तरह ठाठ से बैठ गया। उसकी पत्नी को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह इस व्यवहार को समझ नहीं पाई।

'जाओ और मेरे लिए एक गिलास पानी ले आओ'- हारू ने हुक्म दिया, पर उसकी पत्नी ज्यों की त्यों द्वार पर खड़ी-खड़ी उसे घूरती रही।

'क्या बात है?' हारू गुस्से से चिल्लाया, 'जल्दी करो और मुझे पानी दो!'

'हे मेरे प्यारे! यह तुम्हें क्या हो गया है? तुम्हें किसने पागल कर दिया?' अपने हाथों से सर पीटती, रोती हुई बोली।

'बस! बस! बंद करो', हारू चिल्लाया। फिर अचानक अपनी आवाज धीमी कर, फुसफुसाते हुए बोला, 'प्रिये, मेरी बात सुनो! मैं बड़ा भाग्यवान हूं…' और उसने अपनी सारी राम-कहानी उसे सुना दी।

उसकी पत्नी प्रसन्नता से नाचने लगी। फिर उसके पास आकर बैठती हुई खुशामद करने लगी, 'सुनो जी! पहली गोटी धन-दौलत के लिए फेंको।'

'ना, ना!' हारू ने विरोध किया, 'हमें धन से क्या प्रयोजन? हां! मैं तो कहता हूं कि हमें नाकों की सबसे अधिक आवश्यकता है। हमारी कुरूप नाकों पर लोग हंसते हैं। हम पहले सुन्दर, सुडौल नाकों के लिए ही गोटी फेंकें।'

पर पत्नी का मन पहले धन-दौलत पाने का था। उसने रोकते हुए उसका हाथ पकड़ा। इस पर हारू को बड़ा गुस्सा आया, और जबरदस्ती अपने हाथों को खींचकर एकाएक गोटी फेंकते हुए बोला, 'हम दोनों को सुन्दर नाक दो और कुछ नहीं, केवल नाक ही नाक।'

तुरंत ही उन दोनों के सारे शरीर पर नाक ही नाक उग गए। 'हे प्रभु! दया करो।' अपनी पत्नी की ओर देखते हुए हारू चिल्लाया, 'अरे!  तुम तो बहुत ही भद्दी लगती हो।' 'तुम भी तो!' उत्तर में वह भी चिल्लाती हुई बोली। वे एक-दूसरे के इस भयानक रूप को देख कर बड़े चकित हुए। उन्हें बेशक सुन्दर-सुन्दर अनगिनत नाक प्राप्त हो गईं पर वे इतनी कष्टदायक थीं कि उन दोनों ने दूसरी बार गोटी फेंककर उन नाकों को हटवाने का निश्चय किया।

वैसा ही हुआ, पर हाय! उनकी जो दो छोटी-छोटी नाक थी, वह भी गायब हो गयी। दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे की ओर विस्मित हो देखने लगे। वे पहले से और अधिक भद्दे लगने लगे।

'हे प्रिये!' हारू गिड़गिड़ाते हुए बोला, 'यह मैंने क्या किया। मुझे तुम्हारी बात मान लेनी चाहिए थी। अब बोलो, अपने लिए दो सुन्दर नाकों की मांग करें?'

पत्नी अपने नाकहीन मुंह को हाथों में छिपाते हुए बोली, 'प्राणनाथ, यदि हमें सुन्दर नाक मिल जायेगी, तो लोग अवश्य इस परिवर्तन का कारण पूछेंगे और जब उन्हें असलियत का पता चलेगा तो हमारी मूर्खता का प्रदर्शन होगा कि तीन वरदान पाकर भी हम अपनी हालत नहीं सुधार सके। और तो और, यदि हम अमीर भी हो जायें तो बिना नाक के जी नहीं सकते। तो चलो आपस में हम अपनी छोटी-सी नाक ही ठीक जगह पर लगा लें। और अब की बार बड़ी सावधानी बरतियेगा, यह हमारा आखिरी मौका है।'

अपनी गलती का आभास पा हारू अपनी बदनसीबी पर रोया, 'हाय! मैंने ऐसा सुन्दर मौका खो दिया। हाय! मैं भी कैसा मूर्ख हूं।' पर अब बहुत देर हो चुकी थी। अंत में उसने घुटने टेककर गोटी फेंकी और प्रार्थना की, 'हे भगवन्! हमें हमारी छोटी-ही नाक वापस दे दो।'

उसकी प्रार्थना सुन ली गई और दोनों को बड़ी ही उदास हंसी आ गई।

शिक्षा : अपने जीवन में आये हुए हर मौके का सोच-समझ कर ठीक-ठीक लाभ उठाओ।

(साभार: विवेकानन्द की बोध कथाएं)

कम्प्यूटर जी

कम्प्यूटर नन्हे मोनू से,

करने बैठा झगड़ा।

कहता तू है बुद्धू और मैं,

बुद्धिमान हूं तगड़ा।

मोनू ने समझाया उसको,

यह है केवल भ्रम।

बुद्धू नहीं जरा भी मैं हूं,

और न तुझसे कम।

मगर नहीं माना कम्प्यूटर,

उसको रहा चिढ़ाता।

कौन है बुद्धू, बुद्धिमान यह,

उलटा रहा पढ़ाता।

मोनू को भी आया गुस्सा,

किया स्विच को आफ।

हार मान कम्प्यूटर बोला,

मुझको करिए माफ।

-आशीष शुक्ला

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