गर्भ-अंशों को कुत्तों को खिलाया
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गर्भ-अंशों को कुत्तों को खिलाया

Written byArchiveArchive
Jul 7, 2012, 12:00 am IST
inArchive

राज्य

दिंनाक: 07 Jul 2012 15:27:04

महाराष्ट्र/ द.वा.आंबुलकर

शैतान डाक्टर का कारनामा

कन्या भ्रूण हत्या के गुनाहगार को  पवार कांग्रेस का साथ

महाराष्ट्र के जिला मुख्यालय बीड़ में एक चिकित्सक दंपति द्वारा गर्भ जांच कराकर कन्या भ्रूण का गर्भपात कराने के शर्मनाक धंधे का भंडाफोड़ हुआ है। उल्लेखनीय है कि गर्भ में लिंग की जांच को कानूनी तौर पर अपराध घोषित किया गया है। इसके बावजूद बीड़ शहर के चहल-पहल वाले इलाके में डा.सुदाम मुंडे और उनकी पत्नी डा.सरस्वती मुंडे द्वारा संचालित 'मुंडे अस्पताल' में गर्भ की जांच कराकर सैकड़ों की संख्या में कन्या भ्रूण हत्या का मामला सामने आया है। कन्या भ्रूण हत्या के विशेषज्ञ डा. सुदाम मुंडे तथा डा. सरस्वती मुंडे का नाम तथा उनके कारनामे यहां तक कुख्यात हो गये थे कि सुदूर मुम्बई, नागपुर, पुणे, नासिक जैसे जिलों के अलावा पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक से भी लिंग परीक्षण कराने के लिए गर्भवती महिलाओं का उनके अस्पताल में तांता लगा रहता था। अपने काले कारनामों के द्वारा चिकित्सा पेशे पर काला दाग लगाने वाले डा.मुंडे दम्पति ने सारे कानून तथा नियमों को ताक पर रखते हुए गर्भवती महिलाओं के गर्भ में पल रही बच्चियों को गर्भ में ही मारने तथा उसके द्वारा पैसा बटोरने का धंधा खुलेआम चला रखा था। स्थिति यह थी कि मुंडे अस्पताल में 15 मरीजों का स्थान होने पर भी 100 से अधिक गर्भवती महिलाओं का इलाज चलता था, जबकि इस अस्पताल में शिशुओं के लिए जरूरी पालनों की संख्या मात्र 2 थी। इन आंकड़ों से भी पता चलता है कि डा.मुंडे के अस्पताल में गर्भवती महिलाओं  के इलाज के नाम पर क्या चल रहा था।

गर्भवती महिलाओं के गर्भ-गिराने के बाद उन गर्भ अंशों को रफा-दफा करने के लिए डा.मुंडे दंपति ने जो तौर-तरीका अपनाया, वह तो और भी दिल दहलाने वाला है। इन गर्भ-अंशों को डा.मुंडे शहर से दूर अपने खेत में भेज देता था तथा वहां विशेष रूप से पाले गये 6 कुत्तों के लिए वह खुराक बन जाती थी। स्थानीय किसानों एवं ग्रामीणों ने इसके खिलाफ आवाज अवश्य उठायी  थी, पर डा.मुंडे की राजनीतिक मिलीभगत के कारण कोई कार्रवाई नहीं हो पायी।

डा.सुदाम मुंडे तथा डाक्टर पत्नी डा.सरस्वती मुंडे के पापों का घड़ा तब भरा जब 18 मई को विजयमाला पाटेकर नामक गर्भवती महिला की गर्भपात करते समय हुई लापरवाही के कारण मृत्यु हो गयी। 'बेटी बचाव' जैसी स्वयंसेवी संस्थाओं और मीडिया द्वारा इस मामले को लगातार उठाने के कारण डा.मुंडे दंपत्ति को पुलिस ने गिरफ्तार तो किया, पर तुरंत रिहा भी कर दिया। डाक्टर मुंडे पति-पत्नी को जिस तरह गिरफ्तार और रिहा किया गया उससे उनकी राजनीतिक पहुंच का पता चलता है। वैसे भी डा.मुंडे ने कभी किसी कानूनी प्रावधान की चिंता नहीं की। उसके 'केबिन' में गर्भपात कराने की 'रेट सूची' लगी थी। आपरेशन के बाद गर्भ से मिले अंशों के कारण पर्यावरण पर कोई विपरीत परिणाम न हो, इस हेतु उसे विशेष तरीके से नष्ट करना जरूरी होता है। जबकि डाक्टर मुंडे दम्पत्ति अपने द्वारा गिराये गये गर्भ के अंशों को खुलेआम अपने खेत में अपने ही पालतू कुत्तों को खिलाने का घिनौना और अमानवीय कृत्य        करता रहा।

एक पत्रकार ने जब डा. मुंडे से यह पूछा कि क्या किसी गर्भवती महिला का गर्भ गिराते समय आप 'वह गर्भ कन्या अथवा बालक का है' इसकी जांच करते थे? इस पर डा. मुंडे ने उलटा सवाल किया कि क्या आपने किसी कसाई को कभी काटने से पहले गाय या बैल में फर्क करते हुए देखा या सुना है?

डा.मुंडे अपने काले कारनामों पर सफेदी पोतने के लिए हमेशा चौकन्ना रहता था। वह किसी भी मरीज या उनके साथ आये लोगों को कैमरा अथवा कैमरे वाला मोबाइल फोन भी नहीं रखने देता था। उसके अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के परीक्षणों का विवरण लिखते समय मात्र अंग्रेजी में 16 तथा 19 अंकों का प्रयोग किया जाता था। जिसमें 16 का मतलब लड़का और 19 का मतलब लड़की होता था। यह सारी परिभाषा डा.मुंडे दम्पति को ही पता होती थी।

मुंडे दम्पत्ति की गिरफ्तारी और तुरंत रिहाई के कारण उसके राजनीतिक आकाओं का भी अब पर्दाफाश हो गया है। पता चला है कि डा. मुंडे की गिरफ्तारी के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस की विधायक विद्या चव्हाण ने स्थानीय पुलिस अधिकारियों से संपर्क कर मामले में ढिलाई बरतने को कहा था। हाल ही में संपन्न बीड़ जिले के केज विधानसभा उपचुनाव के प्रचार में डा.मुंडे तथा उनके परिवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस को विशेष रूप से समर्थन भी दिया। डा.सुदाम मुंडे के पुत्र व्यंकटेश मुंडे ने भी पहली बार सार्वजनिक तौर पर राष्ट्रवादी कांग्रेस का प्रचार व समर्थन किया तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस के बैनरों पर अपने चित्रों का खुलकर प्रदर्शन भी किया।

भाजपा के बीड़ से सांसद तथा लोकसभा में उप नेता गोपीनाथ मुंडे ने सार्वजनिक तौर पर यह मांग दोहराई है कि डा.सुदाम मुंडे तथा उनकी पत्नी के काले कारनामों तथा उनके राजनीतिक आकाओं को सामने लाने के लिए इस सारे मामले की उच्चस्तरीय जांच की जाए।

 

हरियाणा/डा. गणेश दत्त वत्स

प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में भाजपा ने हुड्डा सरकार को दिखाया आईना

हरियाणा में क्षेत्रवाद, भेदभाव और भ्रष्टाचार का बोलबाला

भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति ने अपनी दो दिवसीय बैठक में हरियाणा की कांग्रेस सरकार को आईना दिखाया और कहा कि प्रदेश में जो कुछ भी अच्छा प्रचारित किया जा रहा है, वस्तुत: सब कुछ उसके विपरीत हो रहा है। यह बैठक गत दिनों जगाधरी में आयोजित हुई थी। इसके साथ ही यमुना नगर में भी एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया था, जिसमें पूरे प्रदेश से हजारों लोगों ने भाग लिया। बैठक में भाजपा के प्रदेश प्रभारी डा. हर्षवर्धन, प्रदेशाध्यक्ष कृष्णपाल सिंह गुज्जर, कैप्टन अभिमन्यु, वीरकुमार यादव, प्रो. गणेशीलाल, रतन लाल कटारिया, रामविलास शर्मा, कंवरपाल गुज्जर, घनश्याम दास, धूमन सिंह किरमच सहित पूरे प्रदेश से कार्यसमिति के सदस्य मौजूद थे।

प्रदेश प्रभारी व दिल्ली के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने हरियाणा में कांग्रेस सरकार की जनविरोधी नीतियों और बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर भारी रोष जताया। उन्होंने कहा कि जबसे मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने प्रदेश की सत्ता संभाली है तब से हालात बद से बदतर हो रहे हैं। प्रदेश में क्षेत्रवाद व जातिवाद की राजनीति हावी हो रही है जो प्रदेश की सामाजिक संरचना, समरसता व आपसी भाईचारे के लिए घातक है। यही नहीं, रोहतक में 'अपना घर कांड', छछरौली में 'बालकुंज' की घटनाओं से सिर शर्म से झुक जाता है। महिलाओं में असुरक्षा की भावना पनप रही है। प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार के मामले में केन्द्र की  यू.पी.ए. सरकार से पीछ नहीं है। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष कृष्णपाल सिंह गुज्जर व कैप्टन अभिमन्यु ने भी कहा कि विकास के नाम पर सुनियोजित तरीके से भ्रष्टाचार को पनपने दिया जा रहा है और विकास कार्यों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। साफ है कि प्रदेश में प्रशासन कमजोर पड़ गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा-हजकां के गठबंधन के प्रति लोगों में विश्वास बढ़ रहा है और जनता भविष्य में एक सशक्त विकल्प के रूप में हमें देख रही है। उन्होंने जनता को विश्वास दिलाया कि भविष्य में जब भी चुनाव होंगे भाजपा-हजकां की सरकार बनेगी, जो जनता के हित में काम करेगी।

 

जम्मू–कश्मीर/ प्रतिनिधि

न घाटी में वापसी, न मंदिरों का रख–रखाव

किसे चिंता है कश्मीर की?

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में ही नहीं बल्कि कश्मीर घाटी में भी कई धार्मिक स्थलों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। कश्मीर में मंदिर, गुरुद्वारे तथा अन्य धार्मिक स्थलों का अस्तित्व तो है किंतु उनकी देख-रेख करने वाला कोई नहीं है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 'निजाम ए मुस्तफा' लाने के नाम पर अल्पसंख्यक हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों का सफाया तो शुरू के वर्षों में ही कर दिया गया था, किन्तु जो स्थल अभी तक मौजूद हैं, उनकी स्थिति दयनीय बनी हुई है। इनमें कई ऐतिहासिक महत्व के स्थान भी शामिल हैं। इनमें शारदापीठ विशेष रूप से उल्लेखनीय है जो किसी समय संस्कृत तथा अन्य भाषाओं की शिक्षा का एक अंतरराष्ट्रीय केन्द्र था।

कश्मीर घाटी में अलगाववाद तथा उग्रवाद पनपने के बाद वहां से अल्पसंख्यक हिन्दुओं व सिखों ने सामूहिक पलायन किया, किन्तु इन अल्पसंख्यकों, विशेषकर कश्मीरी पंडितों के मंदिर तथा अधिकांश धार्मिक स्थल अभी भी मौजूद हैं जिनमें से कुछ की मरम्मत भी सरकारी स्तर पर करवाई गई है। एक रपट के अनुसार 1989 में पलायन से पूर्व कश्मीर घाटी में 430 मंदिर थे, जिनमें से 266 ठीक स्थिति में हैं, 170 को नुकसान पहुंचा है। 90 मंदिरों की मरम्मत आदि करवाई गई है, जिन पर 33 लाख रुपए खर्च किए गए हैं। कश्मीर घाटी से पलायन के पश्चात अब वहां मात्र 808 कश्मीरी पंडित परिवार रह गए हैं। किन्तु गैरसरकारी आंकड़ों के अनुसार कई मंदिरों तथा अन्य धार्मिक स्थलों पर कुछ तत्वों ने अवैध अतिक्रमणों के  साथ ही उनकी  खरीद-फरोख्त भी की है। कश्मीर से विस्थापित हिन्दुओं की सम्पत्ति खरीदने-बेचने पर प्रतिबंध का कानून बना हुआ है, इसके बावजूद यह क्रम रुका नहीं है और लगभग 550 'सेल डीड' पंजीकृत भी हुए हैं। सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार 1990 में विस्थापितों के आवासीय ठिकानों की जो संख्या 23,278 थी, वह अब घटकर 10,397 हो रह गई है। कश्मीरी पंडितों की कृषि भूमि तथा बगीचे बहुत कम रह गए हैं।

मौखिक रूप से सत्तारूढ़ दल के कई नेता, जिसमें नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष व केन्द्रीय मंत्री डा. फारूक अब्दुल्ला प्रमुख हैं, यह बात कहते हैं कि 'पडितों के बिना कश्मीर अधूरा है', किन्तु वास्तविक रूप से कुछ और ही सामने आ रहा है। 22 वर्ष बीत जाने के बाद भी घाटी में उनकी वापसी तथा पुनर्वास की किसी भी परियोजना पर काम होता नहीं दिखाई देता। परिणामस्वरूप विस्थापितों को केन्द्र सरकार द्वारा दी जा रही सहायता राशि का खर्च प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है और इन विस्थापित परिवारों की संख्या भी रहस्यमय तरीके से बढ़ रही है।

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