वीरव्रती महारानी दिद्दा
September 4, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम Archive

वीरव्रती महारानी दिद्दा

Written byArchiveArchive
May 28, 2012, 12:00 am IST
inArchive

वीरव्रती महारानी दिद्दा

दिंनाक: 28 May 2012 13:07:28

गौरवशाली

इतिहास-6

कश्मीर में उभरे विद्रोही स्वरों को कूटनीति और शक्ति से दबाने वाली

नरेन्द्र सहगल

आठवीं शताब्दी में कश्मीर में शांति और विकास के मसीहा कहे जाने वाले सम्राट अवंतिवर्मन के बाद उसका पुत्र शंकरवर्मन राजसिंहासन पर बैठा। अपने पिता के समय प्राय: बंद सैनिक अभियानों को फिर से प्रारंभ करके उसने ललितादित्य के समय में विजित प्रदेशों को फिर से कश्मीर में मिलाने का निश्चय किया। इसी उद्देश्य के साथ वह अपनी सेना के विजय अभियान हेतु कश्मीर से बाहर निकला और अनेक छोटे-बड़े राज्यों को विजित करता हुआ काबुल तक जा पहुंचा। उस समय काबुल पर एक हिन्दू राजा लल्लैया का ही राज था। लल्लैया विलासिता में डूबा रहने वाला अयोग्य शासक था। काबुल की प्रजा की सहायता से शंकरवर्मन विजयी हुआ और काबुल कश्मीर के आधिपत्य में आ गया।

लोकप्रिय सम्राट शंकरवर्मन

शंकरवर्मन के समय में कश्मीर राज्य सैनिक एवं आर्थिक दोनों दृष्टियों से मजबूत हुआ। उल्लेखनीय है कि सम्राट ललितादित्य के समय कश्मीर राज्य सैनिक दृष्टि से शक्तिशाली बना। सम्राट अवंतिवर्मन के समय कश्मीर आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हुआ। परंतु सम्राट शंकरवर्मन के शासन काल में कश्मीर इन दोनों क्षेत्रों में प्रगति की मंजिलें पार करने लगा। शंकरवर्मन ने एक सफल राजनेता के नाते अपनी प्रजा से सीधा सम्पर्क स्थापित कर लिया। उस समय कश्मीर की राजभाषा संस्कृत थी। शंकरवर्मन द्वारा कश्मीरी भाषा को प्रोत्साहन देने से वह जन-जन का प्रिय राजा बन गया।

शंकरवर्मन के बाद जब गोपालवर्मन ने कश्मीर का शासन संभाला तो उसने काबुल के लोगों के वीरव्रती एवं स्वाभिमानी स्वभाव को समझकर अपनी नीतियों में परिवर्तन करके कूटनीति का परिचय दिया और काबुल की जनता को साथ लेकर प्रशासन को न्यायप्रिय बनाया। परिणामस्वरूप कश्मीर और काबुल के रिश्ते प्रगाढ़ हो गए।

शंकरवर्मन के समय कश्मीर एवं काबुल के दो राजवंशों के पारिवारिक संबंध भी बने। हिन्दू राज्य काबुल के राजा भीमदेव की पौत्री दिद्दा का विवाह कश्मीर प्रदेश के राजा क्षेमगुप्त से हुआ। काबुल का यह राजा भीमदेव कश्मीर में कुछ वर्ष रहने भी आया। उसने विष्णु का एक विशाल मंदिर बनवाया। 'भीमकेशव' नामक यह मंदिर आज भी मटन (श्रीनगर के निकट) में एक गांव बुमजु में है। परंतु अब यह एक मुस्लिम जियारत मानी जाती है, जिसका नाम है 'बमदिनसाहब'।

कुशल प्रशासिका रानी दिद्दा

सन् 950 ई. में दिद्दा का पति सम्राट क्षेमगुप्त कश्मीर के राज सिंहासन पर बैठा। यह राजा राज्य संचालन में पूर्णतया अयोग्य था। दिद्दा ने अपनी वाक्‌पटुता और सौंदर्य से राजा क्षेमगुप्त को प्रभावित करके उसे अपने वश में इस हद तक कर लिया कि राजकाज के प्रत्येक क्रियाकलाप पर दिद्दा का मार्गदर्शन जरूरी समझा जाने लगा। सेना के कमांडरों और प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति से लेकर, व्यापार, कृषि और उद्योग तक सभी क्षेत्रों पर दिद्दा का सिक्का जम गया। दिद्दा ने सम्राट क्षेमगुप्त एवं प्रशासन की डोर इतनी व्यवहार कुशलता से पकड़ी हुई थी कि लोग सम्राट को दिद्दाक्षेम कहने लग गए।

आठ वर्षों तक दिद्दा ने सम्राट की पत्नी के रूप में कश्मीर राज्य की बागडोर थामे रखी। सम्राट क्षेमगुप्त की दूसरी पत्नी चन्द्रलेखा प्रधानमंत्री फाल्गुन की बेटी थी। दिद्दा ने उसे भी पुचकारकर अपने नियंत्रण में रखा हुआ था। सन् 958 ई. में सम्राट क्षेमगुप्त की मृत्यु हो गई। उसका पुत्र अभिमन्यु यद्यपि छोटा था, परंतु दिद्दा ने बड़ी सूझबूझ का परिचय देते हुए पूरे राजकीय वैभव के साथ उसका राज्याभिषेक करवाकर शासन को अपने सुदृढ़ हाथों में ले लिया।

देशद्रोहियों को मौत की सजा

दिद्दा ने देशभक्त एवं योग्य लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करके देशद्रोहियों एवं अक्षम प्रशासनिक अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाया। इस शक्तिशाली रानी ने अनेक संदेहास्पद लोगों को अपराधी घोषित करके उन्हें उम्रकैद तथा मृत्युदंड तक दिए। कश्मीर राज्य की सुरक्षा के लिए ऐसा करना आवश्यक था। दिद्दा को जहां इतिहासकारों ने निष्ठुर-निर्दयी कहा, वहीं इस रानी को कुशल प्रशासिका भी कहा गया।

रानी दिद्दा ने चौदह वर्षों तक राजा की मां के रूप में कश्मीर पर राज किया। सन् 972 में राजा अभिमन्यु की मृत्यु हो गई। दिद्दा ने उसके पुत्र नंदीगुप्त का राज्याभिषेक करवाया और शासन के सूत्र अपने पास ही थामे रखे। स्वभाव से कर्कश एवं निष्ठुर दिद्दा का ध्यान अब राज्य के विकास पर केन्द्रित हो गया। अपने पुत्र राजा अभिमन्यु की मृत्यु के बाद दिद्दा के स्वभाव में कुछ सौम्यता तथा लचीलापन भी आया। उसके अंतर में छिपा नारी स्वभाव कुछ समय के लिए जाग्रत हो गया।

नारी शिक्षा एवं उत्थान

दिद्दा ने नारी शिक्षा एवं उत्थान के अनेकों प्रकल्प शुरू करवाए। कई विकास योजनाएं प्रारंभ हुईं। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अनेक योग्य लोगों को निर्माण कार्यों में दायित्व दिए गए। एक बड़ी योजना के अधीन कई नगर एवं गांव बसाए गए। दिद्दा ने मठ/मंदिरों के निर्माण में भी पूरी रुचि ली। श्रीनगर (कश्मीर) में आज भी एक मोहल्ला 'दिद्दामर्ग' के नाम से जाना जाता है। यहीं पर एक विशाल सार्वजनिक भवन दिद्दा मठ के नाम से बनवाया गया। इस विशाल मठ के खंडहर आज भी मौजूद हैं।

इस प्रकार दिद्दा ने राजा की दादी के रूप में कश्मीर का शासन संभाला। 975 ई. में दिद्दा ने अभिमन्यु के दूसरे पुत्र (दिद्दा का पौत्र) भीमगुप्त को राज्य की सत्ता सौंप दी। अब दिद्दा के स्वभाव की पुरानी निष्ठुरता फिर लौट आई। राजा भीमगुप्त यह सब कुछ विवशता के घूंट पीकर सहन करता रहा। दादी की कृपा से राजगद्दी पर बैठा भीमगुप्त चाहते हुए भी कुछ न कर सका। शासन के अधिकारियों, सेना के कमांडरों और प्रजा के प्रभावशाली वर्ग पर दिद्दा का कठोर निमंत्रण था।

राष्ट्रहित सर्वोपरि बन गया

राजा भीमगुप्त इसी नियंत्रण से मुक्त होकर कश्मीर राज्य का सर्वेसर्वा शासक बनना चाहता था। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उसने कुछ अराष्ट्रीय तत्वों का सहयोग लेने के लिए तुष्टीकरण की नीति का रास्ता पकड़ लिया। राजा ने अपनी दादी के समर्थकों का भी तुष्टीकरण प्रारंभ कर दिया। भीमगुप्त ने समझ लिया कि अपनी राजसत्ता को निरंकुश बनाने के लिए किसी विशेष वर्ग (आज की भाषा में वोट बैंक) का तुष्टीकरण जरूरी होता है। राजा भीमगुप्त ने यह भुला दिया कि इस प्रकार के तुष्टीकरण के समक्ष राष्ट्रहित गौण पड़ जाते हैं और देश-समाज का पतन प्रारंभ हो जाता है।

राजा ने जब अपनी दादी एवं कुशल प्रशासिका रानी दिद्दा का तनिक विरोध किया तो दादी दिद्दा ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर सख्त कार्रवाई की। दिद्दा ने देशभक्त शासनाधिकारियों के सहयोग से अपने पौत्र राजा भीमगुप्त को गिरफ्तार करके कारावास में डाल दिया। कारावास में ही भीमगुप्त का निधन हो गया। सन् 980 ई. में दिद्दा स्वयं कश्मीर की साम्राज्ञी बन गई। अब दिद्दा ने स्पष्ट रूप से संवैधानिक प्रमुख के रूप में सत्ता संभाली और एक शक्तिशाली तानाशाह के रूप में कश्मीर प्रदेश पर शासन करने लगी। उस समय कश्मीर पर गढ़ रही विदेशप्रेरित शक्तियों की गिद्ध दृष्टि को कुचलने के लिए ऐसी ही दृढ़निश्चयी साम्राज्ञी की आवश्यकता थी।

एक चरवाहा बन गया प्रधानमंत्री

शासन सूत्रों को अपने अनुभवी हाथों में लेकर दिद्दा ने कश्मीर प्रदेश की जनता की सुख-सुविधा एवं सीमाओं की रक्षा के लिए प्रशासनिक एवं सैनिक ढांचे का पुनर्गठन सख्ती से प्रारंभ कर दिया। देश की सुरक्षा, प्रशासन की सुचारू व्यवस्था और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा इन तीनों ने साम्राज्ञी दिद्दा की कार्य पद्धति को पूरी तरह प्रभावित किया। राजतरंगिणी में वर्णित एक कथा के अनुसार महारानी ने एक साधारण व्यक्ति, जिसका नाम तुंग था, को अपने राज्य का प्रधानमंत्री बना दिया। तुंग नामक यह व्यक्ति बाल्यकाल में एक चरवाहा था, परंतु जवानी एवं वृद्धावस्था तक आते-आते एक कुशल राजनीतिज्ञ, योग्य प्रशासक एवं शक्तिशाली सैनिक बन गया।

तुंग को प्रधानमंत्री बनाने से पूर्व दिद्दा ने जहां अपने भरोसेमंद सहयोगियों से सलाह मशविरा कर लिया, वहीं संदेहास्पद शासनाधिकारियों को इसकी हवा तक नहीं लगने दी। देशहित में किए गए महारानी दिद्दा के इस तनिक अधिनायकवादी व्यवहार से अनेक मंत्री एवं अधिकारी अथवा सैन्य कमांडर रुष्ट भी हुए, पंरतु किसी में इतना दम नहीं था कि वह महारानी के द्वारा उठाए गए किसी कदम का विरोध करता।

खामोश हुए अलगाववादी स्वर

दिद्दा की राजनीतिक कार्यशैली की यह विशेषता थी कि प्रशासनिक अथवा सैन्याधिकारियों को अपनी सामूहिक या संगठनात्मक गतिविधियों के लिए कभी अवसर ही नहीं मिलता था। एक अवसर पर जब महारानी के इस कठोर व्यवहार के विरुद्ध विद्रोह के स्वर उभरे तो महारानी ने अपने विश्वस्त प्रधानमंत्री तुंग की सहायता से पूरी ताकत लगाकर इन स्वरों को खामोश कर दिया। सभी विद्रोही पराजित हुए और अलगाववाद की ज्वालाएं शांत हो गईं।

इस संदर्भ में दिद्दा को एक सफल अधिनायक की संज्ञा दी जा सकती है। इतिहास में दिद्दा की सफलताओं, उसकी कठोर शासन व्यवस्था और अपने विद्रोहियों (अलगाववादियों) को ठिकाने लगाने की उसकी क्षमता के उदाहरण तो मिलते हैं, परंतु उसके चरित्र पर जो लांछन इतिहासकारों ने (विशेषतया साम्यवादी और कुछ मुस्लिम लेखकों) ने लगाए हैं उनका कोई ठोस आधार नहीं मिलता। कुछ अपवाद उसकी अनेकविध योग्यताओं एवं राष्ट्रनिष्ठाओं के समक्ष अवश्य हैं।

प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति

पचास वर्षों तक शासन पर निरंतर एक महिला का अधिकार रहना अपने आपमें उसकी क्षमता, सफलता और प्रबल इच्छाशक्ति का मापदंड है। विश्व के इतिहास में अन्यत्र ऐसा उदाहरण मिलना कठिन है। पहले रानी के रूप में, फिर पुत्र और पौत्र की संरक्षक के रूप में और अंत में प्रत्यक्ष शासिका के रूप में वह कश्मीर पर अपना अधिपत्य जमाए रही। दिद्दा भारत के इतिहास के उन महत्वपूर्ण चरित्रों में से है, जिन्होंने षड्यंत्रों और हत्याओं की राजनीति पर निरंतर विजय प्राप्त की। इस वीरव्रती साम्राज्ञी ने विद्रोहों एवं कठिनाइयों से ग्रस्त कश्मीर राज्य को अपने साहस और योग्यता से संगठित रखा।

पराक्रमी लोहरवंश के एक अति यशस्वी सरदार सिंहराज की पुत्री दिद्दा ने एक शक्तिशाली कूटनीतिज्ञ के रूप में पचास वर्षों तक अपना वर्चस्व बनाए रखा। लोहरवंश के ख्याति प्राप्त राजाओं ने कश्मीर के इतिहास में अपना गौरवशाली स्थान अपने शौर्य से बनाया है। इस वंश का केन्द्र स्थान लोहटिन जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में है। स्थानीय लोग आज भी लोक कथाओं में दिद्दा की हिम्मत और कुशलता का गुणगान करते हैं।

जब महारानी दिद्दा वृद्धावस्था में पहुंचीं तो उसने अपने भाई लोहर के शासक उदयराज के युवा पुत्र संग्रामराज का स्वयं अपने हाथों से राज्याभिषेक कर दिया। आगे चलकर इसी लौहपुरुष सम्राट संग्रामराज ने काबुल राजवंश के अंतिम हिन्दू सम्राट राजा त्रिलोचनपाल के साथ मिलकर ईरान, तुर्किस्तान और भारत के कुछ हिस्सों में भयानक अत्याचार व लूटमार करने वाले क्रूर मुस्लिम आक्रांता महमूद गजनवी को पुंछ (जम्मू-कश्मीर) के लोहरकोट किले के निकटवर्ती जंगलों में दो बार पराजित    किया था।

Share
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

पुलिस मुठभेड़ के बाद घायल आरोपी

कौशांबी : अवैध पटाखा फैक्ट्री विस्फोट मामले में आदिल पुलिस मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार, दोनों पैर में लगी गोली

उत्तराखंड में धामी सरकार ने 4 अवैध मदरसों को किया सील, 2 रुड़की और 2 हल्द्वानी के मदरसे शामिल  

ओडिशा के मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण माझी जी और पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर जी

Odisha’s Udaan 2.0: ओडिशा में धर्मांतरण के खिलाफ CM मोहन माझी का प्लान क्या है? जानिए ‘पाञ्चजन्य’ से क्या-क्या कहा?

सुशासन संवाद: ओडिशा की उड़ान 2.0 में कायनात काजी और राहुल नील से ट्रैवल पर खास बातचीत

विदेश प्रवास पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत

मैडिसन स्क्वायर से श्री मोहन भागवत का संदेश: विविधता, सह-अस्तित्व और भारतीय मूल्यों से अमेरिका में बंधा नया सूत्र

लिंक्डइन की रिपोर्ट

Gen Z में प्रोफेशनल नेटवर्किंग की झिझक, लोग क्या कहेंगे का भी डर: लिंक्डइन रिपोर्ट में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

Load More

ताज़ा समाचार

पुलिस मुठभेड़ के बाद घायल आरोपी

कौशांबी : अवैध पटाखा फैक्ट्री विस्फोट मामले में आदिल पुलिस मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार, दोनों पैर में लगी गोली

उत्तराखंड में धामी सरकार ने 4 अवैध मदरसों को किया सील, 2 रुड़की और 2 हल्द्वानी के मदरसे शामिल  

ओडिशा के मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण माझी जी और पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर जी

Odisha’s Udaan 2.0: ओडिशा में धर्मांतरण के खिलाफ CM मोहन माझी का प्लान क्या है? जानिए ‘पाञ्चजन्य’ से क्या-क्या कहा?

सुशासन संवाद: ओडिशा की उड़ान 2.0 में कायनात काजी और राहुल नील से ट्रैवल पर खास बातचीत

विदेश प्रवास पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत

मैडिसन स्क्वायर से श्री मोहन भागवत का संदेश: विविधता, सह-अस्तित्व और भारतीय मूल्यों से अमेरिका में बंधा नया सूत्र

लिंक्डइन की रिपोर्ट

Gen Z में प्रोफेशनल नेटवर्किंग की झिझक, लोग क्या कहेंगे का भी डर: लिंक्डइन रिपोर्ट में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

संविधान की दुहाई, राष्ट्रभाव से दूरी

श्री अमित दुबे जी (साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ)

Odisha’s Udaan 2.0:‘डरेंगे तो फंसेंगे, लालच करेंगे तो लुटेंगे’, साइबर एक्सपर्ट अमित जी ने बताया फ्रॉड से बचने का मंत्र

दिल्ली में 11 सितंबर को बंद रहेंगे सरकारी दफ्तर, केंद्र सरकार ने जारी किया आदेश, जानिये क्या है मामला?

एयर वाइस मार्शल जितेंद्र मिश्रा (सेवानिवृत) और कांग्रेस नेता राशिद अल्वी

कांग्रेस ने फिर भारतीय सेना के शौर्य पर उठाए सवाल, ऑपरेशन सिंदूर और राम मंदिर के बहाने किया अपमान

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies