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जयपुर में श्रीराम-जानकी सामूहिक विवाह समिति का आयोजन
सेवा भारती, राजस्थान से संबद्ध संस्था श्रीराम-जानकी सामूहिक विवाह समिति ने गत दिनों जयपुर में 27 गरीब कन्याओं का सामूहिक विवाह सम्पन्न कराया। इस अवसर पर त्रिवेणी धाम के पूज्य स्वामी नारायण दास महाराज नव दंपतियों को आशीर्वाद देने हेतु विशेष रूप से उपस्थित रहे। इनके अलावा और भी अनेक संत-महात्मओं ने कार्यक्रम में उपस्थित होकर समारोह की शोभा बढ़ाई।
सामाजिक समरसता एवं निर्धन परिवारों की सहायता हेतु आयोजित सामूहिक विवाह समारोह में सभी 27 वर बारात के साथ विवाह स्थल पर पहुंचे। वधू पक्ष के लोगों ने अपने-अपने वर तथा बारात का स्वागत किया। तत्पश्चात आचार्यों ने सम्पूर्ण विधि-विधान के साथ सभी 27 जोड़ों का विवाह सम्पन्न कराया। समारोह में समिति द्वारा बारातियों के भोजन की भी व्यवस्था की गई थी, जिसमें हजारों लोगों ने भोजन किया।
श्रीराम-जानकी विवाह समिति के मंत्री श्री हरिकिशन गोयल ने बताया कि समिति द्वारा आयोजित सामूहिक विवाह का आयोजन सफल रहा। हर किसी ने इसकी हृदय से सराहना की तथा आगामी दिनों में होने वाले ऐसे कार्यक्रमों में सहयोग करने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि आयोजन स्थल पर संत-महात्माओं ने प्रत्येक मंडप में जाकर वर-वधू को आशीर्वाद दिया तथा श्रीराम-जानकी का चित्र भेंट किया। श्री गोयल ने कहा कि समिति द्वारा प्रत्येक जोड़े को परिवार के लिए आवश्यक वस्तुएं भी भेंट स्वरूप दीं। समारोह में रा.स्व.संघ के अ.भा. सम्पर्क प्रमुख श्री हस्तीमल एवं अ.भा. सेवा प्रमुख श्री सुहासराव हीरेमठ भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। प्रतिनिधि
आईआईटी से पढ़ाई,
खेती से कमाइ
उच्च शिक्षित मनीष और शशांक अच्छी नौकरी छोड़कर कृषि और किसान के लिए काम कर रहे हैं।र्
आशीष कुमार 'अंशु'
छब्बीस-सताईस साल की उम्र क्या होती है? यदि इस उम्र में कोई युवक अपनी एक अच्छी-भली नौकरी को छोड़कर गांव में किसानों के साथ मिलकर काम करने की योजना बनाए, किसान और खरीददार के बीच की मुश्किलों को आसान करने और इस खरीद-बेच की पूरी प्रकिया को पारदर्शी बनाने की योजना पर कोई युवक काम करे, तो इसे आप क्या कहेंगे? और यदि वह युवक अकेला अपने अभियान में शामिल न हो तो, आप क्या कहेंगे? कुछ कहते नहीं बन रहा, तो कोई बात नहीं।
जिन दो युवकों का जिक्र ऊपर किया गया है, उनका नाम मनीष और शशांक है। इनकी जोड़ी एक और एक ग्यारह के बराबर की जोड़ी पहले से थी। अब इन दिनों इनके साथ एक तीसरे साथी आकर जुड़ गए हैं, अमरेन्द्र। अब यह तिकड़ी हो गई, एक सौ ग्यारह के बराबर। मनीष के लिए यह उल्लेखनीय है कि सामाजिक जीवन में प्रवेश करने की प्रेरणा उन्हें वनवासी कल्याण आश्रम से मिली। झारखंड में वे वनवासी कल्याण आश्रम के संपर्क में आए। बकौल मनीष- 'वहां जो सीखा, उसे जीवन में उतारने के लिए प्रयासरत हूं।' अब आगे बात करते हैं, शशांक और मनीष दोनों की। उन्होंने आईआईटी से पढ़ाई की। उसके बाद दोनों बहुत अच्छी नौकरी कर सकते थे, लेकिन दोनों ने अपने जीवन में कुछ और करने का निर्णय किया। वैसे शशांक ने 2008 में अपना बीटेक पूरा करने के बाद और पटना लौटने से पहले ढाई साल तक गुड़गांव में अच्छे पैकेज पर एक नौकरी की। अपनी नौकरी के दौरान वे एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कज्यूमर गुड्स) कंपनियां, मसलन ब्रिटानिया और पेप्सिको की समस्या सुलझा रहे थे। काम करने के दौरान ही शशांक ने जाना कि इन कंपनियों की वास्तविक परेशानी किसानों से कच्चा माल समय पर मंगाना है।
नौकरी के दौरान ही शशांक ने तय कर लिया था कि उन्हें वापस बिहार आना है और उन्होंने नौकरी छोड़ दी। वैसे शशांक और मनीष दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि खेती की रही है। इसलिए उन्हें अपने नए काम में काफी मदद मिल जाती है।
जब शशांक दिल्ली आईआईटी में पढ़ाई कर रहे थे, उस वक्त कॅरियर के लिए कई सारे विकल्प उनके सामने खुले हुए थे। लेकिन कृषि क्षेत्र में कुछ विशेष करना उनका निर्णय था। यहां मसला सिर्फ अपने कॅरियर से जुड़ा हुआ नहीं था, बल्कि बिहार के किसानों के लिए कुछ करने से भी जुड़ा था। शशांक और मनीष दोनों मानते हैं कि इस देश में कृषि को उपेक्षित क्षेत्र बनाया गया है। जबकि काम करने की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
मनीष ने आईआईटी खड़गपुर से पढ़ाई की है। शशांक के साथ आने से पहले उनके पास आईबीएम कम्पनी ने उनके सामने एक बहुत अच्छी नौकरी का प्रस्ताव रखा था, जिसे ठुकरा कर वे शशांक के साथी बने। इन दोनों ने मिलकर एक कंपनी बनाई 'फार्म एंड फार्मर्स'।
मनीष और शशांक का कहना है कि अपनी तरह की सोच रखने वाले और बिहार के किसानों के हित में सोचने वाले युवाओं का वे स्वागत करते हैं। शुरुआत नए जुड़े साथी अमरेन्द्र से हुई है।
किसानों के बीच जाकर ये लोग अब उन्हें मिट्टी की गुणवत्ता से लेकर कब कौन सा अनाज बोएं तक का पाठ पढ़ा रहे हैं। साथ ही साथ अनाज को मंडी में कैसे बेचें जिससे उपज की अच्छी कीमत मिल सके, का भी ज्ञान ये लोग किसानों को दे रहे हैं। इस काम में ये समूह बिहार के लगभग दो दर्जन वरिष्ठ कृषि विज्ञानियों से मदद ले रहा है। इन युवाओं का उत्साह देखकर कृषि वैज्ञानिक भी सहर्ष मदद के लिए तैयार हो गए।
इस काम से होने वाली आमदनी पर बात करने पर मनीष कहते हैं, अभी तीन साल तक हम आमदनी की बात सोच भी नहीं रहे हैं। उसके बाद भी कम से कम आमदनी लेकर अधिक से अधिक सेवा का हमारा लक्ष्य है। वैसे बिना किसी आमदनी के काम करते हुए भी किसानों के बीच शुरुआत में इन युवकों को थोड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा, क्यांेकि भोले-भाले किसान पहले भी कई बार ठगी के शिकार हो चुके हैं। अब धीरे-धीरे किसान इन युवकों पर भरोसा करने लगे हैं, इस उम्मीद के साथ कि इस बार धोखा नहीं होगा।
खान–पान
प्रोमिला पोपली
चावल का उपमा
कई बार ऐसा होता है कि लोग बचे हुए पके चावल, जिसे भात कहते हैं, को फेंक देते हैं। अन्न को फेंकना तो उसका अपमान है। महंगाई के इस दौर में अन्न फेंकना तो महापाप भी है। आइए इस बार यह जानने का प्रयास करते हैं कि पके हुए चावल को किस प्रकार स्वादिष्ट बनाया जाए और उसे घर वालों को खाने के लिए लालायित किया जाए।
विधि: सरसों को भूनकर उसमें लहसुन, प्याज, मूंगफली, कढ़ी पत्ता मिला लें, फिर उसमें टमाटर और सूखे मसाले भी मिला दें। फिर उसमें उबले चावल मिलाकर चलाएं। उस पर आधा नीबू भी निचोड़ दें और गरम-गरम परोसें।
सामग्रीतेल – 1 चम्मच (बड़ा), उबले चावल- 1 कप, मूंगफली- 1 बड़ा चम्मच, लहसुन- दो कली, प्याज- 1 (बड़ा), टमाटर- 1 (बड़ा), कढ़ी पत्ता- 1 चम्मच, सरसों के दाने- आधा चम्मच, सूखी लाल मिर्च – एक, नमक, मिर्च और हल्दी स्वाद अनुसार ले सकते हैं
सृष्टि और भविष्य को संवारने वाली ऊर्जा है नारी
डा. आशा पाण्डेय
परिवार एक ऐसी आधारभूत एवं सर्वव्यापी सामाजिक संस्था है जो गुणदायिनी के रूप में अन्य संस्थाओं से तुलना में भारी पड़ती है। परिवार के प्रति नारी का गहन उत्तरदायित्व है। नारी के प्रत्येक क्रियाकलाप का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष प्रभाव परिवार पर पड़ता है। परिवार तथा समाज की निर्मात्री होने की वजह से नारी सर्वदा पूज्य है। भारतीय समाज में नारी को सर्वदा श्रेष्ठ स्थान पर स्वीकार किया गया है। वैदिककाल में अनेक विदुषी महिलाएं हुई हैं। लोपामुद्रा, मैत्रेयी, गार्गी आदि विदुषी महिलाओं ने ऋचाओं की रचना की है। किन्तु दुर्भाग्य से बाद का बहुत बड़ा कालखण्ड महिलाओं के लिए अन्धकारपूर्ण रहा। उनकी स्थिति दिनोंदिन गिरती गई। उनकी उपस्थिति, उनकी भावना, उनकी बुद्धि को पुरुषों के द्वारा नकारा जाने लगा। किन्तु स्वतंत्रता आन्दोलन नारी शक्ति के लिए पुन: वरदान सिद्ध हुआ।
स्वतंत्रता आन्दोलन के समय नारी फिर से साक्षर हुई और अपना भिन्न व्यक्तित्व लेकर समाज के समक्ष आई। नारीवादी आन्दोलनों ने नारी समस्याओं के प्रति ध्यान आकर्षित किया।
यह सर्वविदित है कि महिलाओं को सर्वाधिक अपनत्व अपने परिवार से होता है। उनके जीवन का कार्यफलक चाहे कुछ भी हो पर उनके चिन्तन का केन्द्रबिन्दु उनका परिवार ही होता है। इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बीच अपने परिवार को खड़ा करने के लिए नारी घर की दहलीज को लांघकर बाहर निकली है। घर की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ ही साथ वह अर्थोपार्जन में भी लगी है। नारी के इस कदम ने घर को आर्थिक रूप से मजबूत तो किया है, किन्तु परिवार के असहयोग से स्वयं नारी ही इस दोहरी भूमिका को निभाते-निभाते पल-पल टूट रही है। यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि नारी के परम्परागत दायित्वों का क्षेत्र तो बढ़ा है, किन्तु पति या परिवार-जन वही सदियों पुरानी भूमिका निभाना चाहते हैं। पतियों को घरेलू कामों से कोई सरोकार नहीं रहता है, उल्टे अगर कोई कमी दिखती है तो मीन-मेख निकालना भी नहीं भूलते हैं।
अगर पति अपनी पत्नी को घरेलू कार्यों में मदद करें, बच्चों की परवरिश में रुचि लें, उसकी बाहरी जान-पहचान का सम्मान करें तो पत्नी को बड़ी राहत मिलती है, नहीं तो काम का दबाव उसे चिड़चिड़ा और बीमार बना देता है। जिसका भयानक परिणाम परिवार एवं बच्चों को ही झेलना पड़ता है। वास्तव में पत्नी तभी स्वस्थ एवं अच्छी भूमिका निभा सकती है जब उसे पति की मदद, प्रोत्साहन, प्रशंसा और विश्वास मिले। महिलाओं के जीवन में विश्वास एवं प्रेम वह संजीवनी है जिसके भरोसे वे हर पीड़ा को हंसकर सह लेती हैं।
यह सच है कि महिलाएं आज मुक्त होना चाहती हैं, लेकिन अपने घर-परिवार या जिम्मेदारियों से नहीं, बल्कि उन नाकारा बन्धनों से जो उनकी कार्यक्षमता को सीमित कर देते हैं और उन्हें इंसान तक का दर्जा न देते हुए मात्र वस्तु बना देते हैं। घर परिवार में भी उन्हें उचित स्थान नहीं मिलता।
अगर हम अपवाद को छोड़ दें तो अक्सर यह देखा जाता है कि पति यदि पत्नी के लिए कुछ पैसा खर्च कर देता है, कुछ अच्छा सामान ला देता है तब बात-बात पर उसे याद दिलाता रहता है कि देखो मैं तुम्हारे लिए इतना खर्च करता हूं। पति यह भूल जाता है कि पत्नी भी तो पति के लिए, पति के परिवार के लिए सुबह से शाम तक बहुत कुछ करती रहती है। पत्नी के इन कामों को उसका कर्तव्य निरूपित कर दिया जाता है, तो क्या कर्तव्य सिर्फ पत्नियों के हुआ करते हैं? पति के नहीं? यह कैसी बराबरी है? सत्य तो यह है कि पति, पत्नी के लिए करता है तो पत्नी पति के लिए करती है। दोनों एक-दूसरे के अपने हैं, दोनों अपनों के लिए करते हैं। न जाने क्यों पति ये भूल जाते हैं कि उनके द्वारा कही गई ऐसी बातें पत्नी के मन में अपमान एवं अलगाव के भाव को उपजाती हैं। और इससे परिवार का ही अहित होता है।
महापुरुषों ने भी कहा है कि महिलाओं को सम्मान देना, उन्हें अवसर देना, अधिकार देना स्त्रीहित का कार्य नहीं, बल्कि परिवार और राष्ट्रहित का अनुष्ठान है। इसलिए स्त्रियों को मात्र पुरुष के बराबर नहीं, बल्कि उनसे बढ़कर 'विशेष' मानना होगा। क्योंकि, एक नारी को जगा देने से पूरा समाज जागता है।
अब जब बात बराबरी, मुक्ति, स्वतंत्रता की हो रही हो तो हमें यह भी तय करना होगा कि क्या भारतीय समाज की महिलाएं जो आज पश्चिमी सभ्यता का अन्धनुकरण कर रही हैं वह उनकी आजादी है? मुक्ति है?
वास्तव में स्त्री का सशक्तीकरण परिवार का सशक्तीकरण साबित होना चाहिए, परिवार की कमजोरी या परिवार की टूटन नहीं। हमें याद रखना होगा कि फर्क सुमति एवं कुमति का है, स्वतंत्रता एवं स्वच्छन्दता का है, शालीनता एवं उच्छृखलता का है। चूंकि नारी अर्द्धाग्निी है, आधी दुनिया है। इसलिए नैतिक मूल्यों के सृजन की सहभागिता से वह मुंह नहीं मोड़ सकती।
परिवार में नारी की स्थिति को ढूंढ़ने के लिए बहुत कुछ खंगालने की जरूरत है। स्वयं नारी को आत्मनिरीक्षण करते हुए पुन: अपनी सकारात्मक भूमिका तलाशनी होगी। बहुत देर नहीं हुई है। आज भी परिवार को सशक्त बनाते हुए स्वयं सम्मान पाती नारियों की कमी नहीं है। अधिकार की परिभाषा में उलझे बिना हमें अपने कर्तव्य करने हैं। नारियों का उचित आदर करना पुरुष एवं परिवार का कर्तव्य है। यदि वे अपने कर्तव्य को भूल चुके हैं तो भूलें, हम ऐसा क्यों करें।
स्त्रियों को समझना होगा कि हम सृजन के माध्यम से सृष्टि एवं भविष्य को संवारने वाली एक ऊर्जा हैं। प्राणों को भिगोने वाली रागिनी हैं। जीवन का स्पन्दन हैं। हमारे पास अपना विवेक है और निर्णय लेने का अपना अधिकार भी। हमारा चित्र ही कुछ अलग है। हमारा काम ही कुछ विशेष है। तभी तो कामायनी में जयशंकर प्रसाद कहते हैं-
नारी जीवन का चित्र यही
क्या? विकल रंग भर देती हो,
अस्फुट रेखा की सीमा में,
आकार कला को देती हो।
जीवनशाला
अगर किसी व्यक्ति की कड़ी मेहनत के बावजूद उसे मनचाहा फल न मिल पा रहा हो तो उसकी कमियां या दोष न निकालें, क्योंकि ऐसे समय में उसका मनोबल पहले ही काफी गिरा हुआ होगा।
जब भी किसी व्यक्ति को उसकी कमी बताना या कुछ समझाना हो तो हमेशा उसे एकांत में ले जाएं।
जब भी किसी व्यक्ति को उसकी कमी बताएं तो उस दौरान गुस्सा करने से बचें। अगर डांटना भी पड़े तो नरमी बरतते हुए लेकिन प्रभावशाली ढंग से अपनी बात कहें।
अगर आप किसी सभा या महफिल में हैं तो बाद में आने वालों का भी ध्यान रखें और उन्हें भी अपनी बातचीत में शामिल होने का पूरा मौका दें।
अगर आप किसी समूह में या कुछ लोगों के बीच बैठे हैं तो अपने व्यक्तिगत पत्र, अखबार या पत्रिका वगैरह न पढ़ें। साथ ही, सबके बीच इलेक्ट्रानिक उपकरणों का भी इस्तेमाल न करें। अगर कभी ऐसा करना जरूरी हो तो सबसे पहले वहां मौजूद लोगों से इसकी अनुमति लें।











