आवरण कथा
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आवरण कथा
डायन बन गई महंगाइ
आलोक गोस्वामी
बाजार धधक रहा है। लपटों की तपिश आम आदमी को झुलसा रही है। खाने से लेकर, पहनने-ओढ़ने, सजने-संवरने, घूमने-फिरने, मनोरंजन-पर्यटन, सेहत-इलाज तक के लिए सरकार आम आदमी की जेब पर डाका डाल रही है। चीजों के आसमान छूते दाम रह-रहकर कंपा रहे हैं। चैत-बैसाख की धूप अभी अंगड़ाई ले रही है, लेकिन बाजार जाने के नाम पर जनता के पसीने छूट रहे हैं। मध्यम वर्ग के घरों में हाहाकार है, खरीददारी के नाम पर जेबों पर डकैती का डर सता रहा है। तरकारी खरीदने जाने के नाम से जी हलक में अटकने लगा है, घर का बजट अपनी हदें कब का लांघ चुका है। आमदनी बंधी-बंधाई, पर खर्चों की नित नई अंगड़ाई पति-पत्नी में बेवजह की तनातनी का सबब बनी है। गृहणियों के हाल खराब हैं, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, राशन जुटाने की चिंता के बीच तीज-त्योहार आ जाए तो गाड़ी पटरी छोड़ने लगती है।
कीमतें सच में आसमान छू रही हैं… पर सरकार सो रही है, कांग्रेस और सोनिया गांधी का 'हाथ' जनता के गाल पर चपत लगा रहा है…। किसान, नौकरीपेशा, छात्र, मजदूर, घर-गिरस्ती संभालने वाली महिलाएं, सब बेहाल हैं। ऐसा लगता है कि सरकार को केवल मुनाफाखोरों व उच्च धनिक वर्ग की ही चिंता है।
सिर्फ कोरी वजहें
ठीक अपने पिछले कार्यकाल की तरह, संप्रग अपने दूसरे कार्यकाल में भी बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने की बजाय उसके पीछे कोरी दार्शनिकी वजहें गिनाने की रस्म निभा रही है। अर्थशास्त्री होने का दम भरने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सारे आंकड़े बस बढ़ती कीमतों की वजह बताने और 'आने वाले चार-छह महीनों में इसके काबू में आने' का रटा-रटाया जुमला उछालने तक सीमित रहते हैं। वित्तमंत्री कभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में डगमगाहट की बात करते हैं, तो कभी उद्योग जगत की 'लॉबिंग' का नाम लेते हैं, कभी प्रति व्यक्ति आमदनी बढ़ने का बहाना बनाते हैं, तो कभी 'खरीददारी की ताकत में इजाफे' का बाना ओढ़ लेते हैं। कुल मिलाकर चीजों के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं। लेकिन योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह गरीबी कम होने के हास्यास्पद आंकड़े प्रस्तुत कर देश के आर्थिक हालात सुधरने का भ्रम फैलाते हैं।
आसमान में दाम
पुणे में एक साफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाली, दो बच्चों की मां रितिका कुलकर्णी कहती हैं कि हम दोनों (पति-पत्नी) कमाते हैं। पैसा भी ठीक-ठाक मिलता है। दो बच्चे स्कूल जाते हैं। लेकिन हर महीने घर का बजट डगमगाने से हमारे यहां तनाव ही बना रहता है। जैसे-तैसे हिसाब से पैसा खर्चते हैं, पर अगले महीने फिर दाम बढ़ने से किल्लत मच जाती है। रितिका की इन्हीं बातों को लुधियाना की प्रतिभा शर्मा भी दुहराती हैं। वे कहती हैं, घर चलाएं तो कैसे? पति की प्राइवेट कंपनी में नौकरी से जो आता है उसे खूब समझ-बूझकर खर्च करते हैं। लेकिन दालों/सब्जियों/तेल/पेट्रोल के दाम आसमान छू रहे हैं, कैसे गुजारा हो? प्रतिभा की एक 12 साल की बेटी स्कूल जाती है, पर स्कूल में भी फीस के अलावा आएदिन किसी न किसी 'एक्टिविटी' के नाम पर 200-400 रु. की फरमाइश पूरी करनी पड़ती है। दिल्ली की सुरेखा गुप्ता तो सरकार को कोसने में कोर-कसर नहीं रखतीं। कहती हैं, ये है कांग्रेस का हाथ? उसका बस नहीं चलता नहीं तो ये हाथ सीधा आदमी की जेब ही नोंच डाले। बेहद खिन्नाते हुए सुरेखा बताती हैं कि अब तो बाजार जाकर राशन खरीदने से पहले दो बार मन संभालती हूं कि न जाने इस बार दाल-चावल-आटा कहां जाकर टिका होगा, 'ब्रांडिड' चीजें खरीदने की तो सोचना भी गुनाह हो गया है। पेट्रोल और गैस की कीमतें चढ़ते ही सब बढ़ जाता है। एक बार ऊपर गईं कीमतें लौटने का नाम नहीं लेतीं।
यह सोलह आने सच है। अरहर की दाल 80 से 100 रु. किलो, ढंग का चावल 35 से 60 रु. किलो, सरसों का तेल 120 रु. लीटर, आटा 22 से 25 रु. किलो, तो सब्जियां भी होश उड़ाने में पीछे नहीं हैं। आलू 15 से 20 रु. किलो, टमाटर 40 रु. किलो, वह भी पिलपिला, लौकी, करेला, कद्दू, परमल, फली 30 से 50 रु. किलो, भिण्डी 80 रु. किलो। फलों के दाम न ही गिनाएं जाएं तो अच्छा। मध्यम वर्ग चिंता में है कि क्या खाए, क्या छोड़े। पेट्रोल/डीजल/ गैस/सीएनजी के दामों को बढ़ने के लिए अब सालाना बजट का इंतजार नहीं करना पड़ता। हर एकाध महीने में कभी 77 पैसे, कभी 1.10 रु., कभी 2.53 रु. के बड़े हिसाब से निकाले आंकड़ों के अनुसार पेट्रोल/डीजल/सीएनजी के दाम बढ़ाए जाने लगे हैं। टेलीविजन के खबरिया चैनल दाम बढ़ने के कुछ दिन पहले से जनता को भयभीत करने की कमान संभाल लेते हैं। तेल कंपनियों और मंत्रालयों के बाबुओं के हवाले से डरावनी सुर्खियां उछाल-उछालकर कर पर्दे पर लाते हैं और पीछे से आती है डराती हुई आवाज। आजकल तेल कंपनियों का एक लीटर पेट्रोल पर नौ रु. का घाटा होने का जुमला उछाल-उछालकर दिखाया जा रहा है। जबकि वास्तविकता तो यह है कि तेल की मूल कीमत से दुगना तो उस पर टैक्स है।
दरअसल यह समस्या तब से ज्यादा महसूस की जाने लगी है जबसे तेल कंपनियों को सरकारी काबू से बाहर किया गया है। यानी सरकार का उनकी नीतियों पर कोई नियंत्रण नहीं रहा, वे जब चाहें 'अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रति बैरल दाम बढ़ने' की बात करके दाम बढ़ा देती हैं।
पेट्रोल/डीजल की बढ़ती कीमतों के मामले में पूर्व पेट्रोलियम मंत्री राम नाइक का यह कहना सही लगता है कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी को कम से कम करने के लिए मौजूदा सरकार के पास कोई नीति नहीं है। राजग सरकार के तहत कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दामों में बढ़त-गिरत के अनुसार उत्पाद और आयात शुल्क कम करने की एक व्यवस्था थी। इस वजह से पेट्रोल पदार्थों के दाम काबू में रखने में मदद मिलती थी। लेकिन कांग्रेस की अगुआई वाली संप्रग सरकार के कुर्सी पर बैठते ही वह व्यवस्था भंग कर दी गई। अब अंतरराष्ट्रीय दाम बढ़ें या घटें, भारत में कीमतें नीचे नहीं आतीं। नाइक बताते हैं, राजग शासन के दौरान 70 फीसदी कच्चा तेल आयात किया जाता था, पर अब करीब 80 फीसदी आयात हो रहा है। मनमोहन सरकार पेट्रोल का घरेलू उत्पादन भी बढ़ाने में नाकाम रही है।
तेजी से चढ़ा आंकड़ा
भारत के एक प्रमुख औद्योगिक संगठन एसोचैम (एसोसिएटिड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज) ने कुछ दिन पहले कुछ दिलचस्प आंकड़े पेश किए हैं। उसके किए एक सर्वेक्षण ने निष्कर्ष निकाला है कि 2005-06 से 2010-11 के बीच, 5 सालों में खाने-पीने की जरूरी चीजों की कीमतों में 72 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दूध, सब्जी और मसालों के दाम 72 फीसदी बढ़े हैं जबकि एक औसत महानगरीय भारतीय की प्रति व्यक्ति आय में महज 38 फीसदी बढ़त हुई है। सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, मसालों और दूध व दालों की कीमतों में क्रमश: 158.07 फीसदी और 73.69 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। कॉफी की कीमतों में 70.75 फीसदी, चाय में 66.89 फीसदी, गेहूं में 63.25 फीसदी और फलों व सब्जियों में 59.31 फीसदी की बढ़त महज 5 सालों के दौरान देखने में आई है। ध्यान रहे, पांचों साल कुर्सी पर मनमोहन सिंह या कहें सोनिया गांधी ही बैठी रहीं।
ये आंकड़े भी अब छका दिए गए महसूस होते हैं। क्योंकि अब दूध (अमूल) 40 रु. लीटर छू गया है, लिहाजा डेयरी उत्पादों के दाम बढ़ने तय हैं। सब्जियों में आग भड़क ही चुकी है, पेट्रोल/डीजल के दाम भी अब बढ़े कि तब बढ़े। जानते हैं, गर्मी के मौसम की शुरुआत में ही सब्जियों/फलों के दाम इतने क्यों चढ़े हैं? वजह कम पैदावार नहीं है। वजह है इन जल्दी खराब हो जाने वाली चीजों को रखने के लिए 'ठण्डे गोदामों' की कमी। ज्यादातर पैदावार सड़कर बेकार हो जाती है, बाजार पहुंच ही नहीं पाती।
कांग्रेस आई, महंगाई लाई
क्या वजह है कि दिल्ली की गद्दी पर जब-जब कांग्रेस या उसकी नेतागिरी वाली सरकार बैठी होती है, तब तब कीमतें आसमान छूने लगती हैं? वजह है- बेपरवाही। कुर्सी के मद में जमीन से पैर ऊपर होने की खामख्याली। अपनी अंटी मोटी करने की जुगत-भिड़ाई और अन्नदाता को दुत्कारने की बेहयाई। समय-समय पर रहे कांग्रेसी राज में महंगाई से बेहाल जनता के दर्द को हमारे फिल्मकारों ने (उस उस कालखंड में) अपनी फिल्मों में बखूबी पेश किया है। याद कीजिए इंदिरा गांधी की सरकार में सत्तर के दशक में तब के हिसाब से ऐसी महंगाई थी कि लोग लाचार से कसमसाए हुए थे। तब मशहूर निर्माता/निर्देशक/अभिनेता मनोज कुमार ने अपनी फिल्म 'रोटी, कपड़ा और मकान' में आम आदमी की पीड़ा को इस गाने में झलकाया था- '…बाकी जो कुछ बचा तो महंगाई मार गई।' खूब चला था गाना, क्योंकि दर्द की कशिश उबार गया था वह। इसी तरह पिछले साल आई फिल्म 'पीपली लाइव' का वह गाना भी जनता की जुबान पर खूब चढ़ा था, जिसके बोल थे- '…महंगाई डायन खाए जात है!'
महंगाई डायन बनी जनता को खा रही है… पर सरकार सो रही है। दो वक्त की रोटी जुटाने को पहले से ही सामर्थ्य से ज्यादा हाड़तोड़ मेहनत कर रहा मध्यम वर्ग बढ़ती कीमतों के साथ मेल बैठाने के चक्कर में आपा खोता दिखता है। अपने बच्चों को दाल-रोटी के साथ एक अदद सूखी सब्जी देने को कलपता उसका मन सिसक रहा है… पर सरकार सो रही है। सब्जी के नाम पर बस तरी में रोटी का टुकड़ा डुबोकर खाने को लाचार मध्यम वर्ग जगी आंखों कल की सुबह सुकूनभरी होने का सपना देखता है… पर सरकार सो रही है! बंद आंख! बेसधु! बेखबर! ¤Éä{É®ú´Éɽþ!n
यूं बढ़ाई संप्रग सरकार ने महंगाई
चीजें/पदार्थ मई 2004 जनवरी 2010
(राजग शासन) (संप्रग शासन)
में कीमतें में कीमतें
(प्रति कि.) (प्रति कि.)
गेहूं 9 16-22
आटा 10 16-25
चावल 10 25-35
डबलरोटी 8 12-17
चीनी 14 40
चाय 80 150-240
मूंग दाल 24 70-90
अरहर दाल 26 85-90
बेसन 20 40-50
सरसों का तेल 30-35 80-92
आलू 2-5 10-15
प्याज 6 25
शुद्ध घी 110-120 280-290
दूध 14 26
गैस सिलेंडर 244 325
सीमेंट 125/कट्टा 260-320/कट्टा
l2012 आते-आते ये कीमतें और ऊपर चढ़ गई हैं।











