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बिखरता संप्रग कमजोर होती कांग्रेस

Written byArchiveArchive
Jan 7, 2012, 12:00 am IST
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आवरण कथा

दिंनाक: 07 Jan 2012 17:12:14

अंत:पुर की राजनीति और सत्ता संघर्ष से

कमलेश सिंह

एक वक्त था जब विरोधी भी मानने लगे थे कि सत्ता का सीमेंट संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और नेहरू परिवार का नेतृत्व कांग्रेस को बांधे रखने में समर्थ है, पर बीता वर्ष इस धारणा पर सवालिया निशान लगा गया। आजाद भारत के सबसे बड़े घोटाले 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन में कांग्रेसी केन्द्रीय गृहमंत्री चिदम्बरम को बचाते हुए महज द्रमुक के नेताओं के विरुद्ध कार्रवाई से संप्रग में जो दरारें उजागर हुई थीं, वे “सिंगल ब्रांड” खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से लेकर लोकपाल तक तमाम मुद्दों पर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के टकराव से खाई में बदलती नजर आयीं। ऐसे में  कांग्रेस की अंतर्कलह भी छिपी नहीं रह सकी।

दरअसल कांग्रेस का अपना अंतर्कलह हो या संप्रग की दरारें, इनके लिए जिम्मेदार कांग्रेस आलाकमान और सरकार के नेतृत्व की कार्यशैली ही है। सभी जानते हैं कि गठबंधन राजनीति के दौर में ही कभी पचमढ़ी में कांग्रेस ने “एकला चलो” का नारा दिया था, लेकिन सत्ता की लालसा ने उसे भांति-भांति के क्षेत्रीय दलों की मदद से भानुमती का कुनबा जोड़ने को मजबूर कर दिया। जाहिर है, गठबंधन राजनीति को कांग्रेस ने सकारात्मक भावना से नहीं, बल्कि मजबूरी में अपनाया है, इसलिए उसकी कार्यशैली में क्षेत्रीय दलों के प्रति सम्मान और सद्भाव के बजाय अहमन्यता की झलकती है।

यही अहमन्यता न सिर्फ सरकार के कामकाज को प्रभावित कर रही है, बल्कि संप्रग में दरारों को भी गहरा रही है। विपक्षी दलों ने जब वर्ष 2001 की दर पर वर्ष 2008 में 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर सवाल उठाया तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिना जांच ही प्रमाण पत्र जारी कर दिया कि सब कुछ नियमानुसार हुआ है। पर सच को कब तक छिपाया जा सकता है? न्यायपालिका के निर्देश पर जब सीबीआई सक्रिय हुई तो तत्कालीन संचार मंत्री ए.राजा और उनके पार्टी प्रमुख करुणानिधि की सांसद पुत्री कनिमोझी पर शिकंजा कस गया। लेकिन कांग्रेस और उसकी सरकार ने उन्हीं दोनों पर आजाद भारत के सबसे बड़े घोटाले का ठीकरा फोड़ते हुए दस जनपथ के करीबी चिदम्बरम को बचा लिया।

राजा और कनिमोझी को जेल जाना पड़ा तो द्रमुक कोटे के ही एक अन्य पूर्व संचार मंत्री दयानिधि मारन को मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा। कनिमोझी को तो कई महीने बाद जमानत मिल गयी, पर राजा अभी तक जेल में हैं। राजा के साथ मिलकर 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन की कीमतें तय करने वाले चिदम्बरम अभी भी देश के गृह मंत्री बने हुए हैं, जबकि उन्हें सह अभियुक्त बनाने के लिए जनता पार्टी अध्यक्ष डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका पर अदालत में सुनवाई जारी है।

जाहिर है, कांग्रेस के इस दुर्भावनापूर्ण रवैये पर द्रमुक खफा है। 18 लोकसभा सांसदों वाली द्रमुक का समर्थन मनमोहन सिंह सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण भी है, लेकिन तमिलनाडु के मतदाताओं द्वारा खारिज कर दिये जाने के बाद वह केन्द्र में भी सरकार की नाराजगी का जोखिम नहीं उठाना चाहती। इसलिए अपमान का घूंट पीकर भी संप्रग में रहने को मजबूर है, पर “बंगाल की शेरनी” कही जाने वाली ममता बनर्जी की ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। इसलिए वह मौका मिलने पर कांग्रेस और उसकी सरकार को हैसियत बताने से नहीं चूकतीं। वैसे इसके लिए भी कांग्रेस नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार की अहमन्यता ही ज्यादा जिम्मेदार है। संसद के पिछले मानसून सत्र में ही मनमोहन सिंह सरकार ने वचन दिया था कि अण्णा हजारे की मांग के अनुरूप शीतकालीन सत्र में ही लोकपाल विधेयक पारित किया जाएगा, लेकिन वैसा न होने पाये, इसके लिए उसने सुनियोजित साजिश रची। विपक्ष ने पहले ही साफ कर दिया था कि वह शीतकालीन सत्र में काले धन और महंगाई पर काम रोको प्रस्ताव लायेगा, लेकिन संसद न चल पाये, इस मकसद से सरकार ने प्रस्ताव मंजूर नहीं होने दिया। कुछ दिन बर्बाद कर बढ़ती आलोचना के बाद कालेधन पर काम रोको तथा महंगाई पर बिना मतदान वाले नियम के तहत चर्चा पर सहमत हुई सरकार ने संसद में व्यवधान के लिए एक और चाल चल दी।

मनमोहन सरकार ने अचानक ही “सिंगल ब्रांड” खुदरा कारोबार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी, जबकि वह जानती थी कि भाजपाई नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से लेकर वाममोर्चा तक, हर विपक्षी दल इस जन विरोधी फैसले का विरोध ही करेगा। यही हुआ भी। संसद सत्र जारी रहने के दौरान सरकार द्वारा लिये गये इतने बड़े नीतिगत फैसले पर विपक्ष उबल पड़ा और संसद ठप हो गयी।

हालांकि अक्सर संकट की घड़ी में प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के मददगार बन जाने वाले सपा, बसपा और राजद सरीखे दल भी इस मुद्दे पर सरकार के विरोध में खड़े हो गये, लेकिन उसकी हेकड़ी निकाली तृणमूल कांग्रेस प्रमुख एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तो खैर ममता से समर्थन मांगने का साहस ही नहीं जुटा पायीं, प्रधानमंत्री को ममता ने दो टूक इनकार कर नसीहत दे डाली कि उनसे पुनर्विचार करने को कहने के बजाय सरकार खुद इस जनविरोधी फैसले पर पुनर्विचार करे।

तृणमूल कांग्रेस द्वारा कांग्रेस को हैसियत बताने का न तो यह पहला मौका था और न ही आखिरी। इसके तुरंत बाद ही ममता के दबाव में सरकार को पेंशन विधेयक भी ठंडे बस्ते में डाल देना पड़ा। हालांकि ये तमाम विवाद और टकराव सरकार की गलत कार्यशैली से उपजे, फिर भी उन्हें “नीतिगत मतभेद” कहकर बचने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन पश्चिम बंगाल के साल्ट लेक सिटी में इंदिरा भवन का नामकरण क्रांतिकारी कवि काजी नजरुल इस्लाम के नाम पर किये जाने के बाद कांग्रेस जिस तरह तृणमूल कांग्रेस सरकार के विरुद्ध सड़कों पर आ गयी है, उससे तो साफ है कि संप्रग की दरारें अब बिखराव में बदलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

बेशक गठबंधन राजनीति की अपरिहार्यता के इस दौर में सरकार के कार्यकाल के मध्य में ही संप्रग में गहराती दरारें कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब हैं, लेकिन उसकी सबसे बड़ी समस्या अंतर्कलह है, जो अब सतह पर आने लगी है। जरा याद करें कि 2 जी स्पेक्ट्रम आबंटन घोटाले में चिदम्बरम की भूमिका के विपक्षी आरोपों को पुष्ट आधार जिस पत्र से मिला, वह प्रणब मुखर्जी की अगुआई वाले वित्त मंत्रालय द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखा गया था।

इस खुलासे ने कांग्रेस में चल रहे सत्ता संघर्ष को पहली बार उजागर किया था और संकट इतना गहरा गया था कि मनमोहन और मुखर्जी को विदेश यात्रा के दौरान ही बैठक करनी पड़ी थी तथा उनके स्वदेश लौटने के बाद भी सोनिया और उनके सिपहसालार कई दिनों तक जूझते रहे थे। कहना नहीं होगा कि संकट तो टल गया, पर कांग्रेस की अंतर्कलह को बेनकाब कर गया।

कांग्रेस और सरकार के संकटमोचक कहे जाने वाले मुखर्जी की यह पीड़ा चाहे-अनचाहे अब झलक ही जाती है कि प्रधानमंत्री पद का मजा तो मनमोहन ले रहे हैं, लेकिन समस्याओं से दो-चार उन्हें होना पड़ रहा है। दस जनपथ और प्रधानमंत्री के बीच बढ़ती दूरियों की चर्चाएं अब कांग्रेसी गलियारों में आम हो चली हैं। दस जनपथ के करीबी समझे जाने वाले मंत्रियों द्वारा ही अपनी कथनी-करनी से प्रधानमंत्री के लिए मुश्किलें पैदा किये जाने से भी इन चर्चाओं को बल मिल रहा है।

पिछले साल ही जब प्रधानमंत्री ने काले धन के मुद्दे पर रामलीला मैदान में अनशन करने जा रहे योगगुरु बाबा रामदेव को मनाने अपने कुछ मंत्री हवाई अड्डे भेज दिये तो उसकी सबसे मुखर आलोचना कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह सरीखे सोनिया-भक्तों की ओर से ही आयी थी। बाबा रामदेव के साथ सत्याग्रह पर बैठे पुरुषों-महिलाओं-बच्चों और संतों पर आधी रात को बर्बर पुलिस लाठीचार्ज में चिदम्बरम की भूमिका की सुनवाई तो अब अदालत में हो रही है।

बाबा रामदेव के सत्याग्रह का मामला हो या अण्णा के अनशन का, उसके प्रति आक्रामक तेवर दिखाकर मामले को बिगाड़ने में भी जिन लोगों की भूमिका रही, उनमें दस जनपथ के करीबी ही ज्यादा हैं। कपिल सिब्बल और चिदम्बरम तो अब कुछ कम बोलने लगे हैं, लेकिन जुलाई में फेरबदल के बाद कानून मंत्री बनाये गये सलमान खुर्शीद को तो बस बोलने का बहाना चाहिए। 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में जब कई दूरसंचार कंपनियों के आला अधिकारी जेल में थे तो उन्होंने बयान दागा कि इस तरह कारपोरेट जगत के दिग्गजों को जेल में डाल देंगे तो फिर निवेश कैसे आयेगा?

 

आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इस बयान पर सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ी प्रतिक्रिया जतायी। सरकार ने किस तरह लोकपाल को राज्यसभा में सुनियोजित ढंग से लटकाया, पूरे देश ने आधी रात तक देखा, लेकिन ठीकरा फोड़ने की कोशिश की विपक्ष के सिर पर। सलमान यहां भी नहीं चूके और अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार कर बैठे कि विपक्ष चाल खेल रहा था, सो हमने भी चाल खेली। लोकसभा में भी लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने वाला विधेयक गिर जाने का ठीकरा कांग्रेस और सरकार ने विपक्ष के ही सिर फोड़ने की कोशिश की, लेकिन खुद कांग्रेस के 13 सदस्यों समेत संप्रग के 24 सदस्यों की अनुपस्थिति का तथ्य एक बार फिर पार्टी व गठबंधन में बिखराव के सच को बेनकाब कर गया।

कहना नहीं होगा कि गुजरते वक्त के साथ संप्रग की दरारों के साथ-साथ कांग्रेस की अंतर्कलह भी बढ़ेगी ही। ऐसे में “युवराज” के मिशन उ.प्र. और उनके चाटुकारों के “युवराज” की ताजपोशी के सपने का क्या होगा, यह सवाल कांग्रेस से बाहर भी राजनीतिक गलियारों में पूछा जाने लगा है। इस पूरी अंतर्कलह को “युवराज” की राजनीति से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। चाटुकार उनकी ताजपोशी की जल्दी में हैं, पर मनमोहन कुर्सी छोड़ने की जल्दी में नहीं हैं। फिर खुद को राहुल के राजनीतिक रथ का सारथी समझने वाले दिग्विजय सिंह की नजर अहमद पटेल वाली भूमिका पर है। ऐसे में अंत:पुर की यह राजनीति और सत्ता संघर्ष क्या गुल खिलाएगा, यह देखना वाकई दिलचस्प होगा।द

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