मतांतरण का दंश और जनजातीय समाज
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उड़ीसा / समन्वय नंद
मतांतरण के बाद मतांतरित व्यक्ति के जीवन में होने वाले बदलाव के बारे में महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि 'मैंने सुना कि एक मशहूर हिन्दू सज्जन अपना धर्म बदल कर ईसाई बन गये हैं। शहर में चर्चा थी कि बपतिस्मा लेते समय उन्हें गोमांस खाना पड़ा और शराब पीनी पड़ी। अपनी वेशभूषा भी बदलनी पड़ी तथा तब से हैट लगाने लगे और यूरोपीय वेशभूषा धारण करने लगे। मैने सोचा जो धर्म या पंथ किसी को गोमांस खाने, शराब पीने और पहनावा बदलने के लिए विवश करे वह तो धर्म या पंथ कहे जाने योग्य नहीं है। मैने यह भी सुना नया 'कनवर्ट' अपने पूर्वजों के पंथ या धर्म को, उनके रहन-सहन को तथा उनके देश को गालियां देने लगा है। इस सबसे मुझसे ईसाइयत के प्रति नापसंदगी पैदा हो गई।' (एन आटोवायोग्राफी आर द स्टोरी आफ माइं एक्सपेरिमेंट विद ट्रूथ, नवजीवन, अहमदाबाद)।
गांधी जी ने काफी स्पष्ट व सरल शब्दों में मतांतरण के बाद लोगों में हो रहे बदलाव का उल्लेख किया है। यह घटना 1880 के आस पास की है। आज जब हम 2011 पार करने के लिए खड़े हैं, तो फिर वही प्रश्न एक बार फिर सामने है। अभी दीपावली के आस पास उड़ीसा के केन्दुझर जिले में एक घटना ने इस प्रश्न को पुन: एक बार खड़ा कर दिया है। केन्दुझर जिले के आनंदपुर उप मंडल के घसीपुरा थानाक्षेत्र के अंतर्गत भंडारीडिहा पंचायत की यह घटना है। इस ग्राम पंचायत के रंगामाटिया, बसंतगांव व राइघाटी गांव के कुछ जनजातीय परिवारों का चर्च द्वारा मतांतरण किया गया था। मतांतरण के बाद से ही जनजातीय समाज के बीच तनाव की स्थिति रहती थी। वन में रहने वाले जनजातीय लोगों की जीवनशैली की जानकारी रखने वाले लोग इस बात को जानते हैं वे अपनी परम्परा व आस्थाओं के लिए काफी समर्पित होते हैं। उनके पूर्वजों की परम्पराओं की रक्षा और अपनी जड़ों के साथ जुड़े रहना उनकी विशेषता है। लेकिन मतांतरण की प्रक्रिया के बाद मतांतरित लोगों ने जनजातीय समाज की इन परंपराओं को छोड़ दिया। वे अपनी पुरानी संस्कृति व विरासत से पूरी तरह कट गये। इतना ही नहीं, इन मतांतरित लोगों ने शेष लोगों को इन परम्पराओ को न मानने के लिए उकसाया। मतांतरित लोगों ने उस हर कार्य व परम्परा का विरोध किया जो वे अपने पूर्वजों के समय से ही करते आ रहे थे। भोला-भाला जनजातीय समाज इससे व्यथित हुआ। जनजातीय समाज के लोग इस बात से हैरान थे कि जो लोग कल तक उनके परिवार के ही सदस्य थे और उनके त्योहारों को साथ मिलकर मनाते थे, साथ मिलकर नाचते थे, वे आज इन त्योहारों का विरोध क्यों कर रहे हैं? लोग तो वहीं है फिर उन्हें हो क्या गया है?
लेकिन मतांतरित लोग केवल इतने में नहीं रुके। उन्होंने माओवादियों की तरह पोस्टर लगाकर आस्था के विरुद्ध कुछ बातें लिख दीं। आमतौर पर शांत रहने वाला जनजातीय समाज तब चुप नहीं रह सका। अंग्रेजों ने भी अपने शासनकाल में इस तरह के कई प्रयास किए थे और जनजातीय समाज ने इसके खिलाफ विद्रोह किए थे। पोस्टर चिपकाने की घटना के बाद आस-पास के गांवों के जनजातीय लोग इकट्ठा हुए और संस्कृति, परम्परा व विरासत पर किसी भी प्रकार का हमले को बर्दाश्त न करने की घोषणा की। इससे इलाके में भारी तनाव देखा गया। इसके बाद प्रशासन ने हस्तक्षेप किया और स्थिति कुछ शांत हुई।
उपरोक्त घटना एक बार फिर दर्शाती है कि चर्च मतांतरण के बाद समाज को कैसे तोड़ता है, अपनी जड़ों से लोगों को कैसे काटता है, अपने पूर्वजों की विरासत, संस्कृति व परम्पराओं से कैसे दूर करता है। मतांतरण से केवल व्यक्ति की उपासना पद्धति ही नहीं बदलती बल्कि उसकी आस्था भी बदल जाती है। शायद यही कारण है कि स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि अगर एक व्यक्ति मतांतरित हो गया तो केवल एक हिन्दू कम हो गया ऐसा नहीं है, बल्कि देश का एक शत्रु बढ़ जाता है। उड़ीसा के जनजातीय बहुल केन्दुझर जिले की यह घटना इस तरह की कोई अकेली घटना नहीं है, इस तरह की घटनाएं पूरे भारत में घट रही हैं। यह घटना तो प्रतीक मात्र है कि कैसे चर्च भारत में मतांतरण के माध्यम से देश के लोगों को जड़ों से काटकर उनके अभारतीयकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है।
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