'जस्मिन क्रांति' रक्त-रंजित क्रांति क्यों बन गई?
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इस्लामी दुनिया के लिए चिंतन का अवसर
क्रांति क्यों बन गई?
मुजफ्फर हुसैन
2011 में दो ऐसी घटनाएं घटी हैं जिन पर मुस्लिम जगत को चिंतन करने की आवश्यकता है। इनमें एक है ओसामा बिन लादेन और दूसरे लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी की मौत। ओसामा को जिस तरह से अमरीका ने पकड़ा और मौत के घाट उतारा उसकी बारीक से बारीक जानकारी विश्व के हर छोटे-बड़े व्यक्ति को है। उसे दो गज जमीन भी नहीं मिली कि कोई याद करता। समुद्र में उसकी लाश को कहां फेंक दिया गया कोई नहीं जानता है। कर्नल गद्दाफी ने 42 वर्ष तक एक तानाशाह के रूप में एकछत्र राज किया, लेकिन अब उसी की सल्तनत वाले रेगिस्तान में उसे कहां दफन किया गया किसी को पता नहीं है। इन दोनों व्यक्तियों ने भले ही 'नायक' के रूप में कुछ दिन अवश्य देखे हों, लेकिन अब तो सम्पूर्ण जगत उन्हें खलनायक के रूप में याद कर रहा है। एक तानाशाह की घमंडी आंखें उसे उसका भविष्य देखने नहीं देतीं। ओसामा को 'नायक' मानने वाले अपने मन को समझाने के लिए उसे चाहे जितना महान समझें, लेकिन आज तो उसकी छवि एक आतंकवादी और नर-पिशाच के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यह स्थिति कर्नल गद्दाफी की है। लीबिया ने उसे लाड़ले नेता की तरह सिर पर बैठाया, लेकिन अब उसके परिवार में जो बचे हैं उन पर भी कोई तरस खाने वाला नहीं है। ट्यूनेशिया में जब 'जस्मिन क्रांति' शुरू हुई थी तब ऐसा लगता था कि रेगिस्तान में कोई बहुत बड़ा रेत का तूफान आएगा और उनके विरुद्ध आवाज उठाने वालों को भूतकाल के गर्भ में हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर देगा। लेकिन जनता की आवाज ने उन सभी नेताओं को पाठ पढ़ा दिया, जो अपने घमंड में चूर थे। हुस्नी मुबारक, जेनुल आबिदीन और गद्दाफी ने तो अपना किया हुआ भुगता ही। लेकिन लगता है कि यह आग सीरिया, यमन और जोर्डन के राजनेताओं को भी जलाकर भस्म कर देगी। मामला आगे बढ़ा तो सऊदी अरब और ईरान भी अब उसमें झुलसे बिना नहीं रह सकेंगे। सभी जानते हैं इनकी तानाशाही ने उन्हें जनता की आंखों से गिरा दिया है। दु:ख और बेचारगी में जीवन काटने वाली जनता ने जब विद्रोह किया तो वे हवा में सूखे पत्तों की तरह तितर-बितर हो गए। मध्य-पूर्व के सभी देश इस चक्रव्यूह में फंस गए हैं और जो नहीं फंसे हैं अब उन पर भी शिकंजा कसता हुआ दिखाई दे रहा है। तब यह सोचना अनिवार्य हो जाता है कि ऐसे कौन से कारण हैं, जो एक साथ तूफान बनकर इन सत्ताधीशों के विनाश का सबब बने।
अपने भीतर नहीं झांका
प्रकृति ने अधिकांश मुस्लिम राष्ट्रों को खनिज तेल की सम्पदा से माला माल किया है। जिनकी धरती के नीचे काला सोना हो उनकी जनता रोटी के लिए तरसे, यह तो एक आश्चर्य की बात है। इन देशों के सत्ताधीश चाहे जितने अय्याश हों फिर भी उनके पास का अलीबाबा का खजाना इतना छलक रहा था कि वे अपनी जनता को कम से कम सम्मानपूर्वक दो समय की रोटी तो दे ही सकते थे। उन्हें शिक्षित बनाकर उनके लिए रोजी जुटा सकते थे। उनकी जनसंख्या भारत और चीन की तरह कोई बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन इसके बावजूद वे निष्क्रिय रहे। जब इसके कारण ढूंढ़ते हैं तो पता चलता है कि उन्होंने लोकतंत्र को नहीं पहचाना। द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति के बाद तानाशाह और राजा-रजवाड़े. धराशायी हो गए। उसके पश्चात् भी इन देशों के सत्ताधारियों ने अपने भीतर नहीं झांका। मध्य युग की तरह वे अपनी शानो-शौकत बरकरार रखने के लिए हाथ-पांव मारते रहे। जिसने उन्हें सहारा दिया उसके हो गए। अपनी जनता की आवाज नही सुनी। 21वीं शताब्दी का प्रथम दशक समाप्त हो गया तब भी वे अपने वैभव को यथावत् रखने के लिए हाथ-पांव मारते रहे। ट्यूनेशिया को जब फ्रांस ने आजाद किया उस समय वह एक प्रगतिशील राष्ट्र था। उत्तरी अफ्रीका के तीनों देश अल्जीरिया, मोरक्को और ट्यूनेशिया अपने भूमध्य सागरीय जलवायु के कारण कृषि प्रधान देश हैं। फलों की खेती और बढ़िया शराब के कारण उनकी आय संतोष-जनक थी। ट्यूनेशिया की आबादी केवल सवा करोड़ है। उसके पढ़े-लिखे लोग दुनिया में ऊंचे पदों पर काम कर रहे थे। उसके तानाशाह जेनुल आबिदीन ने प्रारम्भ से ही सम्पूर्ण देश की सत्ता अपनी मुट्ठी में बंद कर ली थी। कट्टरवादी इस्लामी पार्टी उन्हें लगातार चुनौती देती रहती थी। लेकिन वे अपनी सख्ती और तानाशाही से वहां के लोगों को कुचलते रहे। अलनहजा नामक पार्टी पर उन्होंने प्रतिबंध लगा दिया था। अब क्रांति के पश्चात् उसी पार्टी ने चुनाव में 40 प्रतिशत सीटों पर कब्जा कर लिया है। जेनुल आबिदीन बिन अली पिछले 40 वर्ष से तानाशाह बनकर राज कर रहे थे। 9 माह पूर्व जब चमेली (जस्मिन) के खिलने का मौसम आता है उस समय वहां के लोगों ने जेनुल आबिदीन के विरुद्ध अपना झंडा बुलंद कर दिया। चमेली के खिलने और सुगंध बिखरने के समय ही वहां जेनुल आबिदीन को जनता ने चुनौती दी। इसलिए इस आन्दोलन का नाम ही जस्मिन अथवा यासमीन क्रांति पड़ गया। जेनुल आबिदीन की विदेशी पत्नी जब भागी तो उसके 29 सूटकेस हीरे जवाहरात और सोने के आभूषण से भरे हुए थे। क्रांति सफल होते ही सबसे पहला काम जनता ने उन सूट केसों को स्वदेश लाने में सफलता प्राप्त कर ली। भ्रष्ट सेना जेनुल आबिदीन को नहीं बचा सकी।
जनता की बेचैनी
जस्मिन क्रांति ने ट्यूनेशिया के पश्चात् अपनी सुगंध पड़ोसी देश अल्जीरिया और मोरक्को तक पहुंचा दी। लेकिन उसका बहुत जोरदार झोंका मिस्र में आया। विश्व का यह प्राचीन देश भी अपने तानाशाहों से त्रस्त रहा। फारुख की बादशाहत का तख्ता पलट दिया गया। प्रथम राष्ट्रपति के रूप में कर्नल नासिर का दौर प्रारम्भ हुआ। साम्यवाद से प्रभावित इस नेता ने जब ब्रिटेन और फ्रांस की सत्ता को हिला दिया तो दुनिया में नासिर के नाम का डंका बजने लगा। वामपंथी विचारधारा के इस नेता ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। नासिर के पश्चात् अनवर सादात और हुस्नी मुबारक ने देश की सत्ता को अपने हाथों में केन्द्रित रखा। अनवर सादात केम्प डेविड समझौते के कारण एक छत्र राज करने में सफल हुए। सामान्य आदमी ने इन नेताओं को बर्दाश्त किया। मिस्र में चुनाव आयोजित किए जाते थे, लेकिन उनकी विश्वनीयता नहीं थी। वहां एकदलीय लोकतंत्र तानाशाही के रूप में चलता था। मुस्लिम ब्रदरहुड (इखवानुल मुस्लिमीन) प्रारम्भ से ही कट्टरवादी इस्लामी पार्टी थी, जिसे तीनों राष्ट्रपतियों ने प्रतिबंधित कर दिया था। जनता अपने पूर्व के राष्ट्रपतियों से खुश नहीं थी, लेकिन हुस्नी मुबारक के आते-आते तो मिस्र की तानाशाही से बेजार हो गई। सरकार में बैठे लोग भ्रष्टाचार में गले तक डूबे थे। मुबारक की विदेशी पत्नी जब देश छोड़कर भागने लगी तो अपने साथ पांच टन सोना और मूल्यवान वस्तुओं का ढेर लेकर चलती बनी। मुबारक को तब भी जनता की बेचैनी का विचार नहीं आया। केम्प डेविड समझौते के कारण अमरीका की आर्थिक सहायता धड़ल्ले से मिस्र को मिलती थी। इस्रायल के साथ मिस्र के सम्बंध अच्छे रहें इसलिए मुबारक इस्रायल और अमरीका का पूरा लाभ उठाते रहे। जनता को इस आर्थिक सहायता का कोई लाभ नहीं होता था। सेना के भ्रष्ट अधिकारी न केवल शोषण करते थे, बल्कि सामान्य व्यक्तियों को मुबारक का गुलाम बने रहने के ताने-बाने बुना करते थे। इसलिए जब ट्यूनेशिया में जनता ने विद्रोह किया तो इसकी आग मिस्र तक पहुंची। हुस्नी मुबारक की तानाशाही, भ्रष्टाचारी और जन विरोधी गतिविधियां रास्ते पर आ गईं। परिणाम यह हुआ कि मुबारक को पद से हटा दिया गया। अब वहां चुनाव प्रक्रिया जारी है। लोकतंत्र की किरणें मिस्र के आम आदमी तक नहीं पहुंचीं जिसके परिणामस्वरूप हुस्नी मुबारक का पतन हुआ।
लीबिया में भी यही कहानी दोहराई गई। 42 वर्ष पूर्व राजा इदरीस से सत्ता छीन कर कर्नल गद्दाफी लीबिया के राष्ट्रपति बन गए। गद्दाफी का सम्पूर्ण जीवन रंगीन और संगीन रहा। स्वयं को साम्यवादी कहने वाले इस नेता ने अपने जीवन में कई बार अमरीका से टक्कर ली। पड़ोसी देश सीरिया से गठजोड़ कर लिया और फिर समय आया तो अलग भी हो गया। अमरीका चाहता था कि लीबिया से उसे मूल्यवान तेल मिल सके। दुनिया में सबसे उच्च गुणवत्ता का तेल लीबिया के पास ही है। लेकिन स्वयं को साम्यवादी कहलाने वाले गद्दाफी ने अंतत: अमरीका के सामने हथियार डाल दिए। अमरीका जिस तेल के लिए लालायित था वह उसे मिल गया। गद्दाफी ने न कभी चुनाव कराए और न ही जनता को अपनी सत्ता में भागीदार बनाया, बल्कि उसके सात बेटे उसकी सत्ता के मजबूत स्तम्भ बन गए। उनके मनमाने स्वभाव और तानाशाही वृत्ति ने समस्त लीबिया को 'गद्दाफी एंड संस लिमिटेड' में बदल दिया। गद्दाफी का अंत दुनिया ने देख लिया। जस्मिन क्रांति वाले देशों में वहां के शासकों की तानाशाही वृत्ति और सत्ता का केन्द्रीकरण ही उनके पतन का प्रमुख कारण रहा। कट्टरवादी मुस्लिम आन्दोलन इन देशों की जड़ें खोखली करते रहे। खनिज तेल को अपनी निजी मिल्कियत समझ कर मनचाहा उपयोग उनकी अय्याशी का प्रमुख कारण बना। लोकतांत्रिक न होने के कारण वे कट्टरवादी बने रहे इसलिए इस्रायल को अपना हमेशा से दुश्मन समझा। इस्रायल और अमरीका का तो कुछ नहीं बिगड़ा, लेकिन उनकी कट्टरवादी इस्लामी मनोवृत्ति ने उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में पीछे कर दिया। इस्लामी देशों में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर कोई राजनीतिक दल नहीं बना। मजहब को केन्द्र में रखकर ही राजनीतिक और आर्थिक निर्णय लिए जाते रहे, इसलिए उनमें हर समय आधुनिकता का अभाव रहा। कभी मजहब का उपयोग सत्ताधीश करते हैं और कभी सत्ता का उपयोग मजहबी नेता करते हैं। एक विशिष्ट मजहब किसी देश का संविधान नहीं हो ।











