राज्यों से
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महाराष्ट्र/द.वा.आंबुलकर
महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस गठबंधन सरकार में मतभेद तो शुरूआती दिनों से ही थे, पर अब मंत्रियों व नेताओं के मतभेद जिस तरह से सार्वजनिक हो रहे हैं उससे राज्य सरकार की बहुत छीछालेदार हो रही है। विवादों और मतभेदों की सूची में एक और प्रकरण हाल ही में जुड़ा। राज्य में त्योहारों के अवसर पर बिजली की कमी के चलते राज्य के ऊर्जा मंत्री व उप मुख्यमंत्री अजित पवार को पक्ष-विपक्ष के सभी नेताओं एवं मंत्रियों ने आड़े हाथों लिया। कांग्रेस के नेताओं ने भी राष्ट्रवादी कांग्रेस के इस नेता से अपना हिसाब बराबर करने का अवसर नहीं गंवाया। इस सारे विवाद की शुरुआत कांग्रेस एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस द्वारा जनहित की आड़ में खेली गयी राजनीति से हुई। कांग्रेसी मंत्रियों ने अपने मंत्रालय के 41 सूत्रीय कार्यक्रमों की घोषणा कर दी। तो बदले में राष्ट्रवादी कांग्रेस के मंत्रियों के अपने मंत्रालयों के तहत 105 सूत्रीय कार्यक्रमों की घोषणा की। और तो और, उप मुख्यमंत्री अजित पवार ने राज्य के वित्त मंत्री होने का लाभ उठाते हुए राज्य के खजाने से लगभग 300 करोड़ रुपयों की राशि राष्ट्रवादी कांग्रेस के मंत्रियों से संबद्ध कथित विकास कार्यक्रमों के लिए आबंटित भी कर दी।
ऐसे राजनीतिक खींचतान के वातावरण में मौके की तलाश में बैठे सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के नेताओं को दशहरे व गणेश चतुर्थी पर राज्य में जारी अघोषित बिजली की कटौती के चलते अजित पवार पर निशाना साधने का अवसर दे दिया, जिसका कि इन लोगों ने भरपूर लाभ भी उठाया। एक ओर जहां मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने केन्द्र द्वारा सुचारु रूप से कोयले की आपूर्ति न होने के कारण राज्य में उपजे बिजली संकट को राष्ट्रीय आपदा बताते हुए सभी से सहयोग की अपील की, वहीं इस बिजली संकट का ऊर्जा मंत्रालय को आभास न होने पर राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में प्रमुख मंत्रियों ने आश्चर्य भी जताया। विपक्ष द्वारा राज्य में 12 घंटे की बिजली कटौती के मुद्दे पर छेड़े जा रहे आंदोलनों का सामना कैसे किया जाए, यह सवाल भी राज्य मंत्रिमंडल की चिंता का विषय है। बिजली संकट के मामले में अजित पवार के विरुद्ध जो मंत्री मुख्य रूप से सक्रिय रहे उनमें उद्योगमंत्री नारायण राणे, गृहमंत्री आर. आर. पाटिल तथा राजस्व मंत्री छगन भुजबल प्रमुख हैं। नारायण राणे ने उद्योगों को पर्याप्त बिजली आपूर्ति न होने के कारण सप्ताह में एक दिन की अतिरिक्त बंदी घोषित करने के कारण हो रही उत्पाद की कमी का मुद्दा उठाया, वहीं गृहमंत्री आर.आर.पाटिल ने बिजली संकट पर राज्य में हो रहे आंदोलन तथा कानून-व्यवस्था की स्थिति पर चिंता जताई, जबकि छगन भुजबल ने घंटों तक बिजली गुल रहने से राज्य के किसानों को हो रहे नुकसान पर अपना विरोध जताया। उल्लेखनीय यह भी है कि नारायण राणे अभी भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं तथा सत्ता पक्ष की प्रत्येक कमी को लेकर मंत्रिपरिषद् में होने के बावजूद वे सार्वजनिक आलोचना करते आये हैं। वहीं आर. आर. पाटिल तथा छगन भुजबल दोनों राज्य में कभी उप मुख्यमंत्री हुआ करते थे तथा वे दोनों समान रूप से मानते हैं कि अजित पवार की उप मुख्यमंत्री बनने की जिद के कारण ही वे आज सिर्फ मंत्री बनकर रह गये हैं। यही कारण है कि मंत्रिपरिषद के इन सदस्यों ने भी बिजली की कमी की आड़ में अजित पवार को राजनीतिक झटका दिया है।
महाराष्ट्र में व्याप्त बिजली संकट को राष्ट्रीय आपदा की बजाय पवार निर्मित आपदा करार करते हुए लोकसभा में भाजपा के उपनेता गोपीनाथ मुंडे ने कहा है कि बिजली उत्पादन के हालात को देखते हुए यह लगभग तय है कि बिजली की यह कमी एवं कटौती निकट भविष्य में 10 हजार मेगावाट तक जाएगी। इससे राज्य की राजधानी तथा देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई भी बिजली कटौती से प्रभावित हो सकती है। इस मुद्दे पर मात्र बहस ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इस समस्या की जड़ में जाकर इस संकट में ऊर्जा मंत्री के नाते अजित पवार की भूमिका एवं जवाबदेही को जरूरी बताते हुए गोपीनाथ मुंडे ने इस समस्या का संपूर्ण समाधान खोजने के लिए भाजपा द्वारा राज्य स्तर पर आंदोलन करने की चेतावनी भी दी है। महाराष्ट्र में बिजली संकट पर शिवसेना ने भी कड़ा रुख अपनाया है। शिवसेना के कार्याध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने बिजली के मामले में होने वाले हर आंदोलन को अपना समर्थन देने की घोषणा की है।द
प.बंगाल / बासुदेब पाल
प.बंगाल के सीमावर्ती जिलों से लापता मुस्लिम युवक
बंगलादेश में ले रहे हैं प्रशिक्षण
केन्द्र व राज्य के खुफिया विभाग ने अब इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया है कि बंगलादेश की सीमा से सटे प.बंगाल के जिलों में मानव तस्करी जारी है। राज्य खुफिया विभाग की मानें तो बंगलादेश की सीमा से सटे प.बंगाल के जिलों-मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना व नादिया से लगभग 150-200 मुस्लिम युवक लापता हैं। सीमावर्ती जिलों से इतनी बड़ी संख्या में केवल मुस्लिम युवकों के लापता होने के मामले में छानबीन करने पर खुफिया विभाग के सामने यह सच्चाई आयी कि ये गुम नहीं हुए हैं बल्कि सीमा पार कर बंगलादेश चले गए हैं। भारतीय खुफिया विभाग के बंगलादेश स्थित सूत्रों ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया है कि ये लोग बंगलादेश के कुछ मदरसों में देखे गए हैं, बताया जा रहा है कि वे वहां “ट्रेनिंग” ले रहे हैं।
हाल ही में कोलकाता स्थित सचिवालय में केन्द्र व राज्य स्तर के खुफिया अधिकारियों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इसमें पुलिस के भी वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इस बैठक में भारत-बंगलादेश सीमा पर मादक पदार्थों व अन्य वस्तुओं की तस्करी के साथ-साथ सीमावर्ती जिलों में लापता मुस्लिम युवकों को लेकर गंभीर चर्चा हुई। इस दृष्टि से कुछ निर्णय भी लिए गए, जिसमें इस विषय पर पुलिस व खुफिया विभाग की एक विशेष शाखा के गठन की योजना सबसे प्रमुख है।
उल्लेखनीय है कि भारत-बंगलादेश सीमा पर स्थित प.बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तरी दिनाजपुर व दक्षिण दिनाजपुर मुस्लिम बहुल जिले हैं। सन् 2001 की जनगणना के बाद पिछले एक दशक में इन जिलों में भारी मात्रा में बंगलादेशियों की घुसपैठ हुई है। इसके साथ ही सीमा पार बंगलादेश में रंगपुर और कुड़िग्राम में आईएसआई (आतंकवाद को प्रायोजित करने वाली पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था) तथा हूजी (बंगलादेश का आईएसआई समर्थित आतंकवादी संगठन-हरकत उल जिहादी इस्लामी) के “कैम्प” हैं। इसके साथ ही चटगांव से काकस बाजार और फिर म्यांमार तक का समुद्री तट भी भारत विरोधियों और आतंकवादियों के लिए पर्यटन स्थल-सा बना हुआ है। इस समुद्री सीमा पर वे बड़ी आसानी से अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं व शिविर चलाते हैं। खुफिया विभाग के बंगलादेश स्थित सूत्रों ने अपनी विस्तृत रपट में यह सारी जानकारी दी है।
बंगलादेशी सूत्रों से मिली जानकारी के बाद जब सीमावर्ती जिलों के मुस्लिम मोहल्लों में अपने सूत्रों से पुलिस व खुफिया विभाग ने जानकारी जुटाई तो पता चला कि 150-200 किशोर व युवा लापता हैं। अभी पुलिस व खुफिया विभाग के लोग उनकी सूची बना रहे हैं, हो सकता है कि यह संख्या और अधिक हो। उनमें से कुछ के बारे में उनके मां-बाप या परिजनों ने रपट भी लिखा रखी है कि वे गुमशुदा हैं। जबकि सीमावर्ती जिलों में आईएसआई व हूजी के एजेंटों द्वारा उग्र व असामाजिक प्रवृत्ति के युवकों पर नजर रखी जाती है, फिर उन्हें विश्वास में लेकर उनका चुनाव कर सीमा पार भेजा जाता है। शुरुआत में इन्हें मालदा, मुर्शिदाबाद से सटे बंगलादेश के चांपाई, नवाबगंज व राजशाही जिलों के मदरसों में रखा जाता है। फिर उन्हीं में से चुनाव कर कुछ लड़कों को गुप्त शिविरों में आतंकवादी हमलों के प्रशिक्षण के लिए भेज दिया जाता है। भारत विरोधी गतिविधियों के लिए भारत के विरोधी भारत के ही युवकों का इस तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं। खुफिया विभाग को पता चला है कि प.बंगाल के इन जिलों के मुस्लिम युवकों को पाकिस्तान, बंगलादेश और कश्मीर भेजा जा रहा है। बाहर से “ट्रेनिंग” लेकर लौटे लड़के या तो स्वयं आतंकवादी गतिविधियों में लग जाते हैं या फिर “स्लीपर सेल” के सदस्य बनकर आतंकवादियों को मदद पहुंचाते हैं।द
पैर पसारते माओवादी
कोलकाता से सटे हुगली जिले में माओवादियों ने अपनी जबरदस्त पकड़ बना ली है। हुगली जिले की अरामबाग तहसील के संधिपुर में माओवादियों ने अपना मजबूत आधार एवं तंत्र विकसित कर लिया है। सूत्रों के अनुसार पश्चिम मिदनापुर जिले के चमकाइतला से इस इलाके में आना-जाना आसान है। हुगली, बांकुड़ा, पश्चिम मिदनापुर के सीमावर्ती छोर पर माओवादी अपना केन्द्र बनाने में जुटे हैं।
केसपुर- गढ़वेता क्षेत्र में माकपा की सशस्त्र हर्माद वाहिनी द्वारा हिंसा के बल पर किए गए कब्जे से पहले इस इलाके में नक्सली संगठन पीपुल्स वार ग्रुप (पी.डब्लू.जी.) की पकड़ या कब्जा था। यह सन् 2000-2001 की बात है। सन् 2004 में पीडब्लूजी नवगठित माकपा (माओवादी) में सम्मिलित हो गया। लेकिन तब तक हर्माद वाहिनी का दबदबा कायम हो चुका था। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में माकपा की करारी हार हुई। सुश्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सत्ता पर आ गयी। सत्ता से बेदखल होते ही माकपा ने अपनी सशस्त्र हर्माद वाहिनी को भंग कर दिया और उसके गुर्गे भूमिगत हो गए। सत्ता में बदल के बाद पुलिस ने छापा मारकर कुछ पुराने हथियार जरूर बरामद किए लेकिन हर्माद वाहिनी के अत्याधुनिक हथियार उसे नहीं मिले। अनुमान है कि अत्याधुनिक हथियारों से लैस हर्माद वाहिनी के लोग सुरक्षित ठिकानों पर अभी शांत बैठे हैं और मौके के इंतजार में हैं। इस बीच तृणमूल कांग्रेस और माओवादी आमने-सामने हो गये हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार अब माओवादी पश्चिम मिदनापुर से रानीगंज तक अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं।
राज्य में वाममोर्चे की सरकार के समय में हर्माद वाहिनी एवं युवा वाहिनी के दबाव से हथियारबंद माओवादी पुरुलिया जिले के वान्दोयान-झाड़ग्राम के पश्चिम में चले गये थे। लेकिन माओवादियों ने फिर से वान्दोयान-झाड़ग्राम मार्ग पर अपना कब्जा जमा लिया है। अब वे रानीगंज-मिदनापुर मार्ग की ओर बढ़ रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि अब- झाड़ग्राम, बेलपहाड़ी, शालवनी, नयाग्राम, सांकराइल के इलाके अब माओवादियों के हाथों में आ गये हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि माओवादी ग्रामीण जनता को हथियारों का प्रशिक्षण देकर “पीपुल्स आर्मी” बनाने की कोशिश में लगे हैं। इसमें वे कुछ हद तक सफल भी हो रहे हैं। इस बीच आंध्र प्रदेश के नक्सली नेता बरबरा राव के नेतृत्व में एक गुट ने जंगल महल जाकर माओवादियों और राज्य सरकार के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश की, पर वे जंगल महल में जा ही नहीं सके। क्योंकि ग्रामीण महिलाओं ने उन्हें पहले ही रोक दिया। बताया जा रहा है कि माओवादी अब किसी भी मध्यस्थता करने वाले के माध्यम से शांतिवार्ता में शामिल नहीं होना चाहते हैं।
जहां तक हुगली की बात है तो यह जिला हमेशा से माओवादियों के निशाने पर रहा है। शिल्पांचल में माओवादियों का शुरू से ही कुछ न कुछ प्रभाव है। कांचन, सोमेन सहित कुछ ऊंचे कद के माओवादियों के छिपने की जगह हुगली जिले में ही थी। माओवादियों के पोलित ब्यूरो सदस्य सुशील राय ने हुगली जिले में ही अपना जाल बुना था। ये सब अब पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद से जेल में हैं। ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण अब तक आरामबाग तहसील में ही माओवादियों का काम सीमित था। पर अब वे संधिपुर को आधार बनाकर हुगली जिले के जांगीपाड़ा, हरिपाल, तारकेश्वर, खानाकुल, पुरसुड़ा, उत्तर हुगली के वलागड़, पाण्डुया, सप्तग्राम और चुंचुड़ा तहसील के ग्रामीण इलाके में अपने पैर पसार रहे हैं।द
भारत पर कसता चीन का घेरा
भारत के उत्तर पूर्वांचल में सक्रिय आतंकी गिरोहों के खिलाफ शेख हसीना के नेतृत्व वाली बंगलादेश सरकार ने जैसे ही कुछ कड़े कदम उठाए, वे म्यांमार जाकर डेरा जमाने लगे हैं। इससे नई दिल्ली को कुछ राहत जरूर महसूस होती होगी। लेकिन जानकार लोगों के मन में यह चिंता उभर रही है कि चीन की भारत विरोधी योजना के अनुसार ये आतंकी गिरोह, इसके सरगना व कैडर अब म्यांमार में ही क्यों इकट्ठे हो रहे हैं? अब तक इन आतंकी गिरोहों को चीन ही आधुनिक स्वचालित हथियार उपलब्ध करा रहा था। चीन की काफी समय से मंशा है कि असम, नागालैंड एवं मणिपुर के आतंकी गिराहों को एकजुट किया जाए ताकि वे पूर्वोत्तर भारत में बड़े पैमाने पर उपद्रव करके भारत सरकार को अस्थिर कर दें और अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन अपने खतरनाक मंसूबे पूरे कर सके। केन्द्रीय खुफिया विभाग के अनुसार बीजिंग की सलाह पर उल्फा के कमांडर इन चीफ परेश बरुआ, नागालैंड के आतंकवादी संगठन एनएससीएन (खाफलांग गुट) के प्रमुख एस.एस. खाफलांग तथा मणिपुर के सात आतंकी गिरोहों ने एकजुट होकर एक यूनाइटेड फ्रंट बनाया है। जैसा पाकिस्तान ने कश्मीर में यूनाइटेड जिहाद काउंसिल बनवाया था। सूत्रों के अनुसार यह यूनाइटेड फ्रंट गत 11 जुलाई को बनाया गया। चीन काफी समय से इस दृष्टि से प्रयास कर रहा था। इन आतंकी गुटों के नेताओं से बहुत पहले से उसका सम्पर्क है। भारत से भागकर इन आतंकी गुटों के ऊंचे कद के नेता चीन में ही शरण लेते हैं। बंगलादेश के मुकाबले म्यांमार में इन आतंकियों पर नजर रखना चीन के लिए काफी आसान हो गया है। उधर चीन पाकिस्तान के कब्जे वाले भारतीय भू-भाग में सड़क और अन्य ढांचागत सुविधाएं बना रहा है। नेपाल, बंगलादेश एवं श्रीलंका में भी चीन का दखल बढ़ा है। बंगलादेश में भारत को जरूर कुछ कूटनीतिक सफलता मिली, पर अन्य देशों में ऐसा नहीं किया। परेश बरुआ को पनाह देना चीन की कूटनीति का ही हिस्सा है। पकड़े जाने के बाद मणिपुरी आतंकी गुट के नेता राजकुमार मेघेन ने भारतीय खुफिया अधिकारियों के सामने यह बात कबूल की है। एन.एस.सी.एन. (आई.एम.) के शीर्ष नेता एंटनी शिरके ने कबूल किया कि वह चीन से बंगलादेश होकर अत्याधुनिक हथियार भारत लाने का काम करता था। चीनी गुप्तचर विभाग के साथ भी उनका निकट सम्पर्क था। दक्षिण पूर्व एशिया में चीन आर्थिक एवं सामरिक शक्ति बनना चाहता है। इसीलिए चीन अब भारत के पड़ोसी देशों में अपनी पैठ बढ़ा रहा है। भारत की तेल खोजी संस्था ओएनजीसी द्वारा दक्षिण चीन सागर में तेल निकालने पर चीन विरोध जता रहा है। भारत द्वारा इसकी अनदेखी करने पर चीन हिन्द महासागर में अपनी तेल खोज की सीमा बढ़ाने की घोषणा भी कर चुका है।











