सरोकार
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प्रकृति, पशु-पक्षी, रीति-रिवाज, जीवन मूल्य, पर्व-त्योहार और नाते-रिश्तों से हमारा विविध रूप रंग-रस व गंध का सरोकार रहता है। हमारी प्रकृति व संस्कृति परस्पर पूरक हैं, परस्पर निर्भरता ही इनका जीवन सूत्र है। हम उनके साथ रिश्तों के सरोकार से विलग नहीं रह सकते, लेकिन बदलते दौर में यह ऊष्मा लगातार कम हो रही है। इन सरोकारों में आई कमी कहीं न कहीं हमारे मन को कचोटती है। प्रकृति व संस्कृति के संरक्षण के लिए इन सरोकारों को बचाये रखना बहुत जरूरी है। इसी दृष्टि से प्रस्तुत है यह स्तंभ। -सं.
दादी भी गजब थीं। चलती-फिरती-बहती संस्कृति, ठीक गंगा की तरह। गंगा स्नान करके घाट पर बैठ वे हाथ जोड़कर गंगा की आराधना करती थीं। जल में प्रवेश के पूर्व गंगा को प्रणाम एवं जल से निकलकर भी। गंगा प्रवेश से पूर्व जल में अपने शरीर का प्रक्षालन करने के लिए क्षमा याचना करती थीं। स्नान के बाद गंगा से अपेक्षाएं और अपनी मनोकामनाएं दुहरातीं-
“नहा धोकर बैठी घाट, बैठी है सिंहासन पाट
आगे देखो जल भरा, पीछे देखो घर भरा
ये घर वारन केकर, राई के, दामोदर के
पाप जाए, धरम आए, हे गंगा जी आपन घाट
हमके दीहन वैकुंठ बास
बड़े को पांव लागी, छोटे को आशीष,
सब सखि के राम राम, जय गंगा जी।”
स्नान करके घाट पर बैठी हैं। नदी तो अपने सिंहासन पाट पर बैठी हैं। आगे जल ही जल और पीछे धन-धान्य से घर भरा है। यह घर भी ईश्वर का ही है। सर्व पाप कट जाएं, धर्म आए। अंत में कामना प्रगट करती हैं – “हे गंगा जी! अंत समय में आपके घाट ही आऊंगी। मुझे शरण देना। तभी बैकुंठ जाऊंगी।” यह मनुष्य की सनातन कामना है, बैकुंठ वास (स्वर्गवासी होना) करना।
गंगा, नदियों की प्रतीक है। भारत में मात्र दो नद हैं। ब्रह्मपुत्र और सोन। बाकी सब नदियां। सब का जल पवित्र है। पर गंगा तो गंगा है। नदियों में नर्मदा ज्येष्ठ और गंगा श्रेष्ठ है। कार्तिक मास में गंगा का विशेष महत्त्व रहता है। अन्य नदियों का भी महत्त्व बढ़ जाता है। लोकसंस्कृति में कार्तिक मास प्रारंभ होते ही गंगा सेवन (एक माह तक गंगा के तट पर वास) के लिए बड़े-बुजुर्ग निकल जाते रहे हैं। उनमें महिलाओं की संख्या अधिक रहती है।
बारहमासा लोकगीतों की विशेष शैली में कार्तिक मास को पुण्य मास कहा गया है-
“कार्तिक हे सखि पुण्य महीना, सब सखि गंगा स्नान
सब सखि पहिरे राम पाट पटंवर, हम धनि लुगरी पुरान हे।”
विरहिणी नारी के मन के भाव हैं। उसका पिया परदेश है। सब सखियां नई-नई साड़ियां पहन रही हैं। पर वह विरहिणी तो पुरानी साड़ी (लुगरी) ही पहने है। कार्तिक मास कल्याणकारी माना जाता है-
“न कार्तिसमो मासो, न सतयुगेन समं युगम्,
न वेद सदृशं शास्त्रं न तीर्थ गंगया समम्।”
कार्तिक के समान मास, सतयुग के समान युग, वेद के समान शास्त्र और गंगा की तरह तीर्थ नहीं है। ये चारों अपने-अपने क्षेत्र में उत्तम हैं। कार्तिक मास में गंगा का भी महात्म्य है। दोनों उत्तम मिल जाते हैं, मास और नदी। तभी तो कार्तिक “पुण्य महीना” माना जाता है। यूं तो कार्तिक में जप, तप, व्रत और दान-दक्षिणा का महात्म्य है परंतु गाय, तुलसी, गंगा की विशेष पूजा होती है। वर्षा ऋतु बीतने के उपरांत आने वाला मास है-
“वर्षा विगत शरद ऋतु आई, लक्ष्मण देखहु परम सुहाई।”
कार्तिक का स्वागत बड़े उल्लास के साथ होता है। देश के उत्तरपूर्व भाग में “करवा चौथ” से प्रारंभ होकर पूर्णिमा को कार्तिक स्नान के साथ समाप्त होता है मास। प्रतिदिन पूजा-अर्चना का दिन है।
दीपों का मास भी है कार्तिक मास। प्रत्येक दिन कहीं-न-कहीं दीप जलाए जाते हैं। नदी (गंगा) का महत्व इसलिए भी है कि इस मास में पड़ने वाले अनेक त्योहार नदी के जल के साथ ही संपन्न होते हैं। पूर्णिमा को गंगा किनारे ही वास करने की हमारी परंपरा आज भी जारी है। कई गांवों से स्त्री-पुरुष आते हैं। गंगा किनारे ही झोपड़ी बनाकर रहते हैं। शकाहारी भोजन (एक शाम) करते हैं। कीर्तन प्रवचन। सायंकाल गंगा में दीप जलाते हैं। गंगा आरती होती है। इन सारे कामों में स्त्री की विशेष भूमिका होती है। नारी ही इन व्रत-त्योहारों को निभाती है। पुरुष सहयोग देते हैं।
गंगा त्रिदेव में सामंजस्य स्थापना करती है। ब्रह्मा के कमंडल से निकलकर विष्णु के पांव में विराजती है और शिव की जटा में रहती है। कहां विष्णु के पांव और कहां महादेव की जटा। तीनों संतुलित हैं। इसलिए स्त्री भी गंगा कही जाती है। वह भी तो परिवार में संतुलन स्थापित करती है। मायके और ससुराल परिवारों में भी। कार्तिक मास भी मौसम में संतुलित मास है। न ठंडा, न विशेष गर्म और न वर्षा, न सूखा। समरस होता है मास। मानव मन भी समरस हो उठता है। तभी तो इतने व्रत-त्योहारों का विधान बन गया। नारी ही तो सभी व्रतों को निभाती है। अधिकांश व्रतों का संबंध जलाशयों से है।
कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्थी तिथि को करवा चौथ से व्रत-त्योहारों का सिलसिला शुरू होकर कृष्ण अष्टमी को अघोई पूजा, त्रयोदशी को धनतेरस, चतुर्थी को यमचतुर्थी, अमावस्या को दीपावली, शुक्ल पक्ष प्रथमा को गोवद्र्धन-पूजा, शुक्ल पक्ष द्वितीया को भाई दूज, और चित्रगुप्त-पूजा (कलम-दवात की पूजा), षष्ठी को सूर्य-पूजा (छठ व्रत), अष्टमी को गोपाष्टमी, नवमी को अक्षय नवमी (आंवले के पेड़ की पूजा और उस वृक्ष के नीचे ही भोजन पका कर खाना), एकादशी (देवोत्थान एकादशी) और अंत में कार्तिक पूर्णिमा। बिहार के मिथलांचल में सामा चकवा (भाई-बहनों का त्योहार) दीपावली के दूसरे दिन से प्रारंभ होकर कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को नदी या पोखर में मिट्टी से बने सामा चकवा की प्रतिमा के विसर्जन पर समाप्त होता है।
अर्थात कार्तिक महीने की अधिकांश तिथियां अपना विशेषण लिए हुए हैं। करवा चौथ, अघोई अष्टमी, धन तेरस, नरक चतुर्दशी, भाई दूज, सूर्य षष्ठी (छठ व्रत), गोपाष्टमी, अक्षय नवमी, देवोत्थान एकादशी और अंत में गंगा-स्नान पूर्णिमा। अन्य मासों में जो एक-दो तिथियां व्रत-त्योहार की हैं, जबकि कार्तिक मास की प्राय: सभी तिथियां अपने महत्त्व के नाम से जानी जाती हैं। तिथियों का क्या, संपूर्ण मास ही पुण्य मास है। इसलिए कार्तिक मास की पहली तिथि से पूर्णिमा तक कार्तिक-स्नान (भोर स्नान) का महात्म्य है। प्रत्येक शाम तुलसी के आगे दीया जलाकर तुलसी-पूजा की जाती है।
करवा चौथ सुहागन के सुहाग के लिए, अघोई अष्टमी पुत्र के लिए, धनतेरस से दीपावली तक धन-धान्य के लिए, गोवद्र्धन-पूजा और गोपाष्टमी जहां पशुधन के लिए वहीं अक्षय नवमी देवोत्थान एकादशी और संपूर्ण कार्तिक मास स्नान या कार्तिक पूर्णिमा स्नान निर्मल काया के लिए है। तुलसी की पूजा और तुलसी का विवाह भी किया जाता है। तुलसी-पूजा, आंवला वृक्ष पूजा तथा दीपावली पूजा भी पर्यावरण की शुद्धता के लिए की जाती है। ऐसा लगता है कि कार्तिक महीने को हिन्दू-चिंतन के अनुरूप संपूर्ण जीवनादर्श को सम्मुख रखकर रचाया गया है और तदनुरूप व्रत-त्योहारों की व्यवस्था की गई है। ठीक यही स्थिति तो स्त्री की भी है। कार्तिक, गंगा और नारी एक ही तो हैं। तीनों का मिलन अपने आप में अपूर्व है। इसलिए तो कार्तिक महीना है।











