सब बुझे दीपक जला लूं
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शिवओम अम्बर
महीयसी महादेवी का अभिकथन है कि सूर्योपासक, अग्निपूजक भारत की संस्कृति यदि विशिष्ट आलोकजीवी हो तो इसे स्वाभाविक ही कहा जाएगा। “तमसो मा ज्योतिर्गमय” की गूंज भारत के धर्म, दर्शन, साहित्य, कला, जीवन पद्धति आदि में निरंतर गूंजती रहती है।
अपने एक गीत में वह मरण के पर्व को भी दीपावली की तरह ज्योति अभिसिक्त बनाने की कामना करती हैं और तमस की सघनता में दीपक रागिनी को गुंजित करने की बात कहती हैं-
लय बनी मृदु वर्तिका
हर स्वर जला बन लौ सजीली,
फैलती आलोक सी
झंकार मेरी स्नेह गीली।
इस मरण के पर्व को
मैं आज दीवाली बना लूं,
घिर रहा तम आज
दीपक-रागिनी अपनी जला लूं-
सब बुझे दीपक जला लूं।
“आरोह तमसो ज्योति:” के वैदिक मंत्र के शाश्वत उदाहरण सा दीपक हिन्दी काव्य जगत का एक अत्यंत प्रिय प्रतीक रहा है। हर युग के रचनाकारों ने उसके माध्यम से अपने समय को भी सम्बोधित किया है और सनातन सत्य को भी शब्दायित करने की चेष्टा की है। कविवर गोपालदास नीरज युग के नीति नियंताओं को सचेत करते हुए कहते हैं कि दीपावली की सामाजिकता तभी सार्थक होती है जब गली-गली प्रकाश से परिवेष्टित हो जाये-
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अंधेरा धरा पे कहीं रह न जाये।
नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल
उड़े मत्र्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले।
इसी आकांक्षा के फलीभूत न होने पर आपातकालीन अंधेरे के घुटन भरे माहौल में दुष्यंत कुमार ने कविता को एक प्रज्ज्वलित प्रश्नचिन्ह बनाते हुए रेखांकित किया था कि हर देहरी पर दीपमालिका की सर्जना को संकल्पित सत्ता आज मात्र तिमिर की संरक्षिका बनकर रह गई है-
कहां तो तय था चरागां हरेक घर के लिये,
कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिये।
यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है,
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिये।
पंचदिवसीय पर्व दीपावली का प्राणतत्व है दीपक। वह मृत्तिका की देह में जागती हुई ज्योति के जयगान की तरह है, एक काली रात के खिलाफ खड़े विप्लवी अभियान और क्रांति के आह्वान की तरह है, नैराश्य में आशा के संधान और अवसाद में उल्लास के वितान की तरह है। उसकी इसी लघुकाया में समाविष्ट महाप्राण चेतना को बड़े ही प्रभावी ढंग से विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ने अपनी एक रचना में प्रकट किया है जिसका आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने सुष्ठु भावानुवाद कर हिन्दी की श्रीवृद्धि की है-
सांध्य रवि बोला कि लेगा
काम अब यह कौन
सुन निरुत्तर छविलिखित सा
रह गया जग मौन,
मृत्तिका का दीप बोला
तब झुकाकर माथ
शक्ति मुझमें है जहां तक
मैं करूंगा नाथ।
अपनी शक्ति भर आलोक वितरण का व्रत लेने वाला दीपक अपनी समर्पणशीलता के कारण अंधेरी धरती के पृष्ठ पर दिनमान के हस्ताक्षर की हैसियत पा जाता है। दीपक के जीवन दर्शन को प्रकट करने वाला बालकवि वैरागी का एक छंद मानवीय जीवन को प्रेरणा का पाथेय प्रदान करने वाला वरेण्य बोध वाक्य है-
सामना जब भी कभी हो जिंदगी में रात से
कर न लेना दोस्ती बदशक्ल से बदजात से,
रोशनी से दुश्मनी जिसका सनातन धर्म हो
और ऐसे धर्म पर जिसको न कोई शर्म हो-
उसके लिये संकल्प की बस एक तीली चाहिए,
ध्यान रखना आंसुओं से वह न गीली चाहिए।
कातर होकर युद्ध नहीं लड़े जाते, योद्धा के पास साहस भी होना चाहिए और संकल्प भी, तभी अंधकार में आलोक के रथ की अगवानी हो पाती है। दीपक के इस अविचल सेनानी के व्यक्तित्व को अविराम साहित्य साधना का रूपक बनाते हुए रामावतार त्यागी उसकी सामाजिक सुरक्षा और संरक्षा के प्रति अलख सी जगाते हुए कहते हैं-
शाम ने सबके मुखों पर रात मल दी
मैं जला हूं तो सुबह लाकर बुझूंगा,
जिंदगी सारी गुनाहों में बिताकर
जब मरूंगा देवता बनकर पुजूंगा।….
एक अंगारा गरम मैं ही बचा हूं, मत बुझाओ,
जब जलेगी आरती मुझसे जलेगी।
इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूं,
मत बुझाओ,
जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी।
यह जलता हुआ दिया युग-युग से जन-गण-मन में आलोक के प्रति निष्ठा और उसकी उपलब्धि के लिए आत्मयजन का भाव जगाते हुए अर्पण-तर्पण और समर्पण की हमारी सांस्कृतिक चेतना का अस्मिता बोध है। इसी दीपक को अध्यात्म का अर्थगर्भ प्रतीक बनाकर हमारे संतों और ऋषियों ने जीवन को सफल के साथ-साथ सार्थक बनाने के भी सूत्र दिये। महर्षि व्यास ने जीवनमूल्यों के उस प्रदीप की सावधानीपूर्वक रक्षा करने की बात कही जिसका आधार-पीठ सत्य है, जिसमें तप का तेल है और जिसमें दया की वर्तिका पर क्षमा की ज्योति शिखा जगमगा रही है-
सत्याधार: तपस्तैल: दयावर्त्ति: क्षमा शिखा,
अंधकारे प्रवेष्टव्ये दीपो यत्नेन वार्यताम्।।
और इसके उदाहरण के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हुए कबीर ने उद्घोषणा की कि मैंने दीपक को तेल से परिपूर्ण करके अखंड वर्तिका प्रज्ज्वलित कर दी है, इस संसार की हाट में मेरा सारा लेन देन चुक गया है और मैं इसमें पुन: प्रवेश की बाध्यता से मुक्त हो गया हूं-
दीपक दीया तेल भरि बाती दई अघट्ट,
पूरा किया बिसाहुणा बहुरि न आवौं हट्ट।
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी जी ने एक विराट रूपक प्रस्तुत करते हुए ज्ञान को दीपक बताकर उसे जाग्रत करने की प्रक्रिया समझाई है तो दोहावली में राम-नाम की महिमा का गान करते हुए उसे आन्तर और बाह्य अंधकार को सहज ही विलीन करने में समर्थ मणिदीप की संज्ञा दी है-
राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार,
तुलसी भीतर बाहेरहु जौ चाहसि उजियार।
भगवान बुद्ध की अंतिम देशना है-आत्मदीपो भव, अर्थात् स्वयं को दीपक बनाओ। प्राणों में पीड़ा समेटे और अंगों में आग को लपेटे हुए दीपक हमारी संस्कृति का, कला का, कविता का चिरंतन प्रतीक है-अक्षय प्रेरणा का अप्रतिम स्रोत है।











