| दिंनाक: 02 Mar 2008 00:00:00 |
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देश से धोखा? वित्तमंत्री चिदम्बरम ने अमरीकी इशारे पर देश को करोड़ों का चूना लगाया?? भारतीय शेयर बाजार में गिरावट तो बड़े संकट की महज एक झलक-नमित वर्मासुप्रसिद्ध अर्थ विशेषज्ञजनवरी के तीसरे हफ्ते में शेयर बाजार के सभी सूचकांक गिरते ही चले गए। शुक्रवार (25 जनवरी) को मुम्बई स्टाक एक्सचेंज का सेन्सेक्स 687 पार्इंट गिरा। सोमवार 21 जनवरी को जब बाजार खुला था, तब उसके इतिहास का सबसे बड़ा झटका लगा जब सेन्सेक्स में 1408 पार्इंट की गिरावट हुई। 22 जनवरी तक निवेशकों को कुल 14 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका था।इस भयावह परिस्थिति के दो कारण बताए गए : अमरीकी मंदी का भारत समेत विश्वव्यापी बनने का भय एवं बाजार से तरलता खत्म होना।जिस दौर में शेयर बाजार में बिकवाली का दानव आया, उस दौर की शुरुआत हुई फ्यूचर ग्रूप के 490 करोड़ रुपए के आई.पी.ओ. से। 11 से 16 जनवरी, 2007 के बीच 132 गुना खरीद होने के कारण इस आई.पी.ओ. ने बाजार से 16 से 17 हजार करोड़ रुपए की तरलता कम कर दी।15 जनवरी को खुले रिलायंस पावर के 11,600 करोड़ के आई.पी.ओ. की सीमा से अधिक खरीदारी होने का अर्थ था उसके 2.9 अरब डालर के शेयरों के बदले 200 अरब डालरों के शेयरों की मांग। यह एक विश्व रिकार्ड था। लाखों करोड़ रुपए रिलायंस पावर आई.पी.ओ. में जमा हो गए। यह पैसा आया कहां से? स्पष्ट है कि ज्यादातर पैसा शेयर बाजार की शुरुआती बिकवाली से आया। निवेश के लिए धन उत्पन्न करने वाली यह बिकवाली कब शुद्ध बिकवाली में परिवर्तित हो गई, और क्यों, इसका अध्ययन हमें करना होगा।स्पष्ट है कि रिलायंस पावर, सेबी एवं सरकार ने बाजार में उपलब्ध तरलता का गलत अनुमान लगाया था। जैसे ही निवेशकों की ऋण लेने की क्षमता समाप्त हो गई, वे बिकवाली की मार्फत निवेश पूंजी अर्जित करने को मजबूर हो गए। परन्तु यह कारण शेयर बाजार के टूटने का कारण नहीं था। निवेशक यह जानते थे कि जब भी बाजार में एक बड़ा नया निवेश का मौका आता है, तब तब दूसरे शेयरों से पैसा निकालकर नए आई.पी.ओ. में लगाना स्वाभाविक होता है। साथ ही सूचकांक में कुछ गिरावट आना भी सामान्य था। सबको नवम्बर 2007 का मूंदरा पोर्ट याद था, जब ऐसा ही हुआ था। फिर बिकवाली की भगदड़ क्यों मची?मंदीग्रस्त अमरीका अपनी आंतरिक अर्थव्यवस्था में निवेश और उपभोग बढ़ाने के लिए मजबूरन ब्याज दर पौन प्रतिशत घटाने की तैयारी कर रहा था। विडम्बना यह थी कि ब्याज दर घटाने से उपभोग बढ़ता है और आंतरिक निवेश की संभावना जागृत होती है, परन्तु इसके कारण अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी पलायन कर जाती है। इस परिस्थिति को रोकने एवं उलटने के लिए, ब्याज दर कटौती की घोषणा से पूर्व, अमरीकी सरकार के नुमाइस प्रकार, आर्थिक संकट के इस दौर में अमरीका अपने मित्रों से मदद और संयम की गुहार लगा रहा है। अरब खाड़ी के देशों को, अमरीका में घाटा युक्त निवेश कर अमरीका के प्रति अपने मैत्री भाव का सबूत देने की सलाह दे रहा है। भारत जैसे देशों, जिनके राजनीतिक नेृतत्व पर अमरीका की प्रबल प्रकड़ है, को स्पष्ट आदेश दिया जा रहा है कि वे अमरीकी ट्रेजरी बाण्डों में घाटायुक्त निवेश करें। शेयर बाजार त्रासदी के शुरुआती दौर के समय दिल्ली आए अमरीकी उप वाणिज्य मंत्री डेविड बोहीजियन का यही संदेश था। 17 जनवरी 2008 को संवाददाताओं से बात करते हुए भी उन्होंने खुलासा किया, “हम भारत से अमरीका में निवेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”पाठकों को याद होगा कि 21 नवम्बर 2007 को मैंने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के नाम लिखे अपने खुले पत्र (पाचजन्य, 16 दिसम्बर, 2007) में उल्लेख किया था कि भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश के लिए आई पूंजी को किस प्रकार भारतीय रिजर्व बैंक ने भारतीय बाजार से निकाल कर, आठ प्रतिशत घाटा सहकर, उसका अमरीकी ट्रेजरी बाण्डों में निवेश किया। यह कार्यवाही गैर-कानूनी एम.एस.एस. बांड घोटाले के मार्फत सिद्ध की गई थी। इसी संदर्भ में लिखे मेरे दूसरे खुले पत्र में (देखें बाक्स) यह स्पष्ट जाहिर होता है कि वर्तमान भारत सरकार और रिजर्व बैंक गवर्नर, दोनों ही गैर कानूनी ढंग से भारतीय बाजार में तरलता व्यर्थीकरण (लिक्विडिटी स्टेरिलाईजेशन) करने में कार्यरत थे।खुले पत्र के व्यापक प्रकाशन के पश्चात दिसम्बर, 2007 में गैर कानूनी एमएसएस बांडों की बिक्री रोक दी गई थी और कुछ दिनों तक भारतीय अर्थव्यवस्था एवं निवेशकों ने राहत की सांस ली। परन्तु अमरीकी फेडेरल रिजर्व गवर्नर बेन बर्नांक और उनके संदेशवाहक डेविड बोहीजियन के दबाव में आकर सरकार ने 6 हफ्ते के अन्तराल के बाद गैरकानूनी एम.एस.एस. बाण्ड स्कीम दोबारा लागू कर दी। बोहीजियन के भारत आगमन के साथ-साथ 16 और 17 जनवरी को तरलता व्यथीकरण के नाम पर, दस हजार करोड़ रुपए के एम.एस.एस. बाण्ड पुन: जारी किए गए। बाजार में तरलता प्रभावित हुई कि शेयर बाजार टूट गया। मुम्बई स्टाक एक्सचेंज सूचकांक में, तरलता व्यथीकरण की घोषणा होते ही, 14 जनवरी, 2008 से ही बाजार टूटने के लक्षण दिखने लगे। बाजार को तेजी प्रदान करने वाले म्यूचुअल फंडों के द्वारा खरीददारी समाप्त सी हो गई।रिलायंस पावर के बहुचर्चित आई.पी.ओ. में मदमस्त भारतीय शेयर बाजार में भी विरोधाभास देखा गया। एक तरफ मंुह जबानी प्रचार पर निवेश करने वाली भीड़ पैसा लगाने के लिए बेताब थी, तो दूसरी तरफ म्यूचुअल फंड और अन्य सुलझे हुए खिलाड़ी बाजारी तरलता के बदलते हालात से भयभीत थे।अनिल अम्बानी के 11,700 करोड़ रुपए के आई.पी.ओ. के बीचों बीच सरकार के 10,000 करोड़ की बांड नीलामी पर “मनी मार्केट” में कई प्रकार की अटकले लगीं, साफ था कि केन्द्र सरकार में मुलायम सिंह यादव के निकट समझे जाने वाले अनिल अम्बानी की साख गिर गई थी। सरकार ने उनके आई.पी.ओ. असफल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, परन्तु अस्सी गुना खरीददारी के द्वारा जनता ने उनकी लाज रख ली। भारत सरकार जरूर अपने ही बनाए हुए तरलता संकट में फंस गई। एम.एस.एस. बांड की पांच हजार करोड़ रुपए की पहली खेप में से डेढ़ हजार करोड़ के बाण्डों का कोई ग्राहक ही नहीं आया। पहली बार एम.एस.एस. बांड “ओवर सब्स्क्राइब” नहीं हुआ। संभवत: निवेशक इस गैरकानूनी राष्ट्रविरोधी बांड की असलियत जानने के बाद इसका परित्याग कर रहे हैं।शेयर बाजार में बिकवाली संकट गहराने का एक कारण और था : 17 जनवरी का वित्त मंत्री चिदम्बरम का वक्तव्य। सम्पूर्ण दुनिया जानती है कि भारतीय बाजार अमरीकी मंदीग्रस्त अर्थव्यवस्था से न्यूनतम प्रभावित अर्थव्यवस्था है। हमारा अपना बढ़ता बाजार है और यही कारण है कि विश्वभर के निवेशक भारत की ओर खिंचे आ रहे हैं। परन्तु बिकवाली संकट के बीच में वित्त मंत्री ने कुछ उल्टा ही संदेश दिया : शायद वह अपने द्वारा रचित तरलता संकट के उत्तरदायित्व से बचने का प्रयास कर रहे थे। सी.आई.आई. के वार्षिक भागीदारी सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा, “अगर अमरीका मंदी के दौर से गुजर रहा है तो इसके वैश्विक परिणाम होंगे और भारत को इसका एक अंश भुगतना पड़ेगा।” अगले दिन मुम्बई स्टाक एक्सचेंज का सूचकांक 687.12 पार्इंट से गिर गया और उसके अगले दिन पुन: 1408 पार्इंट से गिरा।प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपने वित्तमंत्री के इस गलत बयानबाजी की सुधारीकरण को जारी करने में चार दिन लगे। जब तक उनका नया बयान आता तब तक देशी निवेशकों को 14 लाख करोड़ का घाटा हो चुका था।जब 21 जनवरी को रिजर्व बैंक गवर्नर यगा वेणुगोपाल रेड्डी से पूछा गया कि तरलता संकट के बीचोंबीच उन्होंने तरलता व्यर्थीकरण की नीति क्यों अपनाई, तब उनका जवाब था, “कभी तरलता रहती है तो कभी तरलता संकट रहता है। सो हमें एक लम्बे अर्से का नजरिया रखना चाहिए, न कि केवल संदर्भ का।” शायद गवर्नर रेड्डी भूल गए हैं कि अभी तक उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार नहीं किया है कि एम.एस.एस. बांड का उद्देश्य लम्बे अर्से के लिए भारत में आए निवेश बहाव को अमरीका की ओर मोड़ना है। वे भूल रहे हैं कि कागजों में रिजर्व बैंक एम.एस.एस. बांड को लघुकालीन तरलता समायोजन सुविधा का एक अंश बताता है।जब सरकार इस प्रकार चलेगी और जब उसकी नीयत भारतीयों को नुकसान पहुंचाकर विदेशी आका को लाभ पहुंचाना होगा, तब आर्थिक संकट दूर कैसे होगा? शेयर बाजार का ताजा घोटाला तो आने वाले घोटालों, उनसे पिसती जनता और अर्थव्यवस्था में आने वाले संकटों का सूचक मात्र है।7