अफगानिस्तान के मध्य में जो पर्वतीय क्षेत्र था, अर्थात हजारिस्तान, वहाँ पर हजारा समुदाय एक स्वतंत्र और शिया समुदाय था। इस समुदाय की महिलाएं बहुत सुंदर हुआ करती थीं। 19 वीं शताब्दी के अंत में अर्थात 1890 में अफगानिस्तान पर अमीर अब्दुर रहमान खान का शासन था। वह एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। वह पूरे अफगानिस्तान पर निर्बाध शासन चाहता था। अमीर ने हजारा समुदाय पर भारी टैक्स लगाया और उनकी आजादी छीनने का प्रयास किया। और उसके विरोध में हजारा समुदाय ने विद्रोह कर दिया था। इस विद्रोह को अमीर बर्दाश्त नहीं कर सका, और अपने ही मुसलमान भाइयों के इस विद्रोह को कुचलने के लिए उसने एक विशाल सेना भेज दी।
हालांकि, हजारा समुदाय के लोगों ने डटकर सामना किया, मगर अमीर की विशाल और आधुनिक सेना के सामने वे टिक न सके और हार गए। इस विद्रोह का केंद्र उरुजगन देखते ही देखते ढह गया। और फिर अमीर की सेना ने हजारा समुदाय का कत्लेआम शुरू कर दिया। आदमियों को मारकर उनके सिरों की मीनार बनाई गई और हजारा मुसलमान महिलाओं को “माल ए गनीमत” घोषित कर दिया।
उन्हें बंदी बनाया गया और काबुल, कंधार आदि के बाजारों में यौन दासी बनाकर बेचा जाने लगा।
हजारा समुदाय की 47 लड़कियों ने की थी पहाड़ी से कूदकर आत्महत्या
जब यह कत्लेआम चल रहा था और मंडियों के लिए हजारा शिया समुदाय की लड़कियों को कैद किया जा रहा था, उसी समय युवतियों और महिलाओं का एक समूह अपनी जान और इज्जत बचाने के लिए पहाड़ों की तरफ भागा। इन्हें शायद पता था कि इनके साथ क्या होने जा रहा है। लगभग 47 महिलाओं का यह समूह था, जो अपने पीछे भागते हुए क्रूर और वहशी सैनिकों को देख रहा था।
देखते ही देखते उन्हें शासशपर की ऊंची पहाड़ियों पर घेर लिया गया। उनके पास जीवित बचने का एक ही रास्ता था कि अपने आप को वे सेना के हवाले कर दें और फिर बाजार में जाकर मंडी की बोलियों का शिकार बनें।
अपनी अस्मत बचाने के लिए महिलाओं ने की आत्महत्या
उन युवतियों और महिलाओं ने उस क्षण एक बहुत ही भारी निर्णय लिया। उन्होनें जीवन के बदले में स्वाभिमान चुना और उन सभी ने उस पहाड़ी से छलांग लगा दी। इस पहाड़ी का नाम “चेहेल दोख्तारान” (Chehel Dokhtaraan) रख दिया गया है, जिसका अर्थ है चालीस लड़कियां।
उन्होंने जान दे दी, मगर अपने स्वाभिमान को अमीर की सेना के हाथों कुचलवाना मंजूर नहीं किया। यह घटना एकमात्र घटना नहीं है। hazarainternational.com के अनुसार, अब्दुर रहमान के शासनकाल में कोई भी, फिर चाहे वह पश्तून हो या गैर पश्तून, अगर वह शासन के खिलाफ कुछ भी बोलता था, तो उसे सीधा काबुल भेजा जाता था, जहां से वह जिंदा वापस नहीं आता था।
यह भी कहा जाता है कि उरुजगन से जो बंदी बनाकर लाए गए थे, उनमें 400 महिलाएं भी थीं। और उन चार सौ महिलाओं ने भी उन 47 युवतियों की तरह अपने स्वाभिमान को कुचलते हुए नहीं देख सकती थीं, इसलिए उन्होनें काबुल के रास्ते में पड़ने वाली नदी में छलांग लगाकर अपनी ज़िंदगी खत्म कर ली थी।
बांग्लादेश की आजादी के बाद सैकड़ों महिलाओं ने की आत्महत्या
हालांकि, यह आत्महत्याएं सामूहिक नहीं थीं। मगर सैकड़ों बांग्ला मुस्लिम महिलाओं ने आत्महत्याएं की थीं। ये आत्महत्याएं इस कारण की थी क्योंकि, उनके साथ पाकिस्तानी सेना ने बलात्कार किया था। यह महत्वपूर्ण बात है कि 1971 के युद्ध के दौरान बांग्लादेश की मुस्लिम महिलाओं के प्रति यह हिंसा केवल सैनिकों का अनियंत्रित व्यवहार ही नहीं थी, बल्कि इस बलात्कार को युद्ध के एक टूल की तरह प्रयोग किया गया।
यह सोच ही कितनी विकृत है कि महिलाओं के शरीर को ही युद्ध का मैदान बना दिया जाए। महिला अपनी रक्षा उनसे ही करने के लिए भागे, जो उनके ही मजहब को मानने वाले हैं।
अल्जीरिया का काला दशक
यह एक अछूता विषय है। 1992 से 2000 के बीच का दशक अल्जीरिया के लिए काला दशक माना जाता है। इस दशक के दौरान अल्जीरियाई मुस्लिम महिलाओं को कट्टरपंथी इस्लामी सेना का शिकार होना पड़ा था। हालांकि, यह भी कहा जाता है कि अल्जीरिया में महिलाओं के साथ सरकारी सुरक्षाबलों ने भी अत्याचार किए थे। और सुरक्षाबल भी मुस्लिम सरकार के ही थे। अर्थात उस दौरान अल्जीरिया में सरकार मुसलमानों की ही थी।
इस काले दशक के दौरान महिलाओं पर अत्याचार करने वाले दोनों ही पक्ष माने सरकारी सुरक्षा बल और इस्लामी सशस्त्र संगठन, मुस्लिम बहुल अल्जीरियाई समाज से ही आते थे। अल्जीरिया में काले दशक के दौरान मजहब के नाम पर अपनी ही लड़कियों के साथ अत्याचार की हर सीमा पार कर दी थी। निकाहे-मुता की आड़ में लड़कियों की सुनियोजित यौन दासता तय की गई।
हथियारों से लैस कट्टर आतंकवादी रात के अंधेरे में सुन्नी मुसलमानों के गावों में हमला करके 13 से 25 साल तक की युवा लड़कियों और कुंवारी लड़कियों को उनके माता पिता के सामने बंदूक की नोक पर उठा लेते थे। ऐसा कहा जाता है कि असंख्य लड़कियों ने इस दासता के चलते आत्महत्या कर ली थी। क्योंकि, बलात्कार के बाद या फिर ऐसी घटनाओं के बाद जब वे अगर जिंदा वापस लौटती भी थीं, तो परिवार उन्हें अपनाता नहीं था।
लड़कियों का अपहरण और बलात्कार
इसके साथ ही ऐसी लड़कियों के साथ अपहरण के बाद सामूहिक बलात्कार किया जाता था। और जब वे बीमार हो जाती थीं, तो उनकी हत्या कर दी जाती थी। जो कुछ सौभाग्यशाली अपने घर पहुँचने में सफल होती थी, वे कलंक के डर से आत्महत्या कर लेती थीं।
जो महिलाएं पर्दा नहीं करती थीं, उनकी हत्या कर दी जाती थी। इसमें दोनों ही पक्ष मुसलमान थे, मगर फिर भी मुसलमान महिलाओं को निशाने पर लिया गया। उनके शरीर को युद्ध का मैदान बनाया गया और जिसके कारण असंख्य मुसलमान महिलाओं ने आत्महत्याएं की!
हालांकि यह आरोप लगते हैं कि आत्महत्या करने वाले आँकड़े सरकार ने छिपा लिए, यह स्पष्ट नहीं किया गया कि आखिर इस दौरान जो अल्जीरियाई मुसलमान महिलाओं ने आत्महत्याएं कीं, वे किस कारण कीं? क्या वे अपना स्वाभिमान बचाने के लिए थीं या फिर स्वाभिमान खो जाने के कारण? ये कुछ घटनाएं हैं, जिन पर अब बात होना आवश्यक है। जो इतिहास की नहीं हैं, जो महज कुछ दशकों पूर्व की ही बातें हैं, घटनाएं हैं।
आखिर 1890 में हजारा शिया मुस्लिम महिलाओं ने, 1972 में बंगाली मुसलमान महिलाओं ने और 1992-2002 के दशक के दौरान अल्जीरिया की मुसलमान महिलाओं ने जो अपनी जान गंवाई, वह किस कारण गंवाई? और उनके स्वाभिमान को किससे खतरा था?
उनकी आत्महत्याओं का कारण क्या था? और क्यों उनपर बात नहीं होती है?











