| दिंनाक: 04 Jan 2007 00:00:00 |
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न जाने किस हाल में होंगे मां-पिताजी?-नीरजा माधवतिब्बत की स्वतंत्र सांस्कृतिक एवं धार्मिक अस्मिता के प्रश्न पर दुनिया भर के सेकुलर देशों की चुप्पी तोड़ने की दिशा में एक सकारात्मक उपन्यास “गेशे जम्पा” की दसवीं कड़ी। -सं.वेसब चले गए थे। मग्-पा का कोई पता नहीं चला था, परन्तु मां और पिताजी ने दूसरे गांव के अन्य बच्चों के साथ उन्हें भी तिब्बत की सीमा के उस पार भेज देने का निर्णय ले लिया था।”पर मां, मैं वहां जाकर किसके पास रहूंगा।”नन्हें जम्पा ने मां और पिताजी के इरादे को सुना तो बेचैनी में पूछ बैठे थे। कई दिनों से चुपचाप उन्हें भेजने की तैयारी चल रही थी। रात में ही मां ने रास्ते में खाने के लिए मासुङ् और ज्यूपा की पोटली बांधकर तैयार कर ली थी। रो-रोकर उनका बुरा हाल था। प्रत्येक तैयारी करने में वे बार-बार फूटकर रो पड़ती थीं। कोन्-चोग् भइया और चिनये दीदी से बिछुड़कर अब अपने नन्हें जम्पा से अलग होने का दुख विकराल था उनके लिए। रोने के कारण आंखों की लाली समाप्त होने का नाम ही न ले रही थी। पिताजी किंकत्र्तव्यविमूढ़-से कभी मां को और कभी जम्पा को देख लिया करते। उनकी तो जैसे जुबान ही किसी ने छीन ली थी। बस यदा-कदा जम्पा को पास बुलाकर गोद में बैठा लेते और उनके माथे को अपने ओठों से चूमते हुए बुदबुदा उठते-“ऊँ मणिपद्मे हूं ऽ ऽ ऽ ऽ… रक्षा करना भगवान्।””मैं नहीं जाऊंगा पिताजी।” जम्पा मां पिताजी की विह्वलता देख उद्विग्न हो उठे थे।”नहीं बेटा, हम तुम्हें यहां रोक नहीं सकते। वहां जाओगे तो जीवन सुरक्षित है, पर यहां वे सब ले जाएंगे तो क्या होगा? पता नहीं।” पिताजी की पथराई आंखें शून्य में टंग गर्इं थीं।”अगर मग्-पा आ जाएंगे तो वे मुझे नहीं ले जाएंगे?” भयभीत थे जम्पा भी।”कुछ कहा नहीं जा सकता, बेटा। कुछ भी नहीं। न तो मग्-पा के लौट आने का भरोसा ही है और न ही उन सबों की मानसिकता का। सुना है बच्चों को ले जाकर अपने ही देश और संस्कृति के खिलाफ बंदूकें उठाने का प्रशिक्षण देते हैं। कभी-कभी बुरी खबरें भी सुनाई पड़ जाती हैं बच्चों को लेकर।” पिताजी किसी अशुभ बात को मुंह से न निकालते हुए भी उसकी भयावहता की कल्पना से कांप उठे थे। बहुत बाद में जम्पा को भी उस स्थिति का आभास हुआ था जब उन्होंने कहीं-कहीं पढ़ा कि तिब्बती बच्चों को बलात् उनके माता-पिता से छीनकर उन्हें कम्युनिस्ट बनाया जा रहा है। यदि माता-पिता विरोध करते हैं तो उन्हें बंदी बना लिया जाता है या फिर मौत के घाट उतार दिया जाता है। इसके पीछे चीनियों का यह तर्क होता था कि अपने बच्चों के बिना माता-पिता अच्छा काम कर सकते थे या फिर बच्चों को उचित शिक्षा के लिए चीनी केन्द्रों में भेजा गया है। जम्पा ने यह भी खबर सुनी कि लामाओं को विशेष रूप से सताया जा रहा है। उनके ऊपर यह आरोप लगाया जा रहा है कि बिना श्रम किए वे दूसरों के धन पर जीते हैं। इसलिए उनके साथ क्रूरता का व्यवहार करते हुए उन्हें श्रम केन्द्रों में भेज दिया जाता है। खासतौर से वृद्ध लामाओं को सता-सताकर मौत के मुंह तक पहुंचा दिया जाता है।आखिर वह घड़ी आ गई थी जब जम्पा से मां की उंगली हमेशा के लिए छूट गई थी। दुपट्टे के छोर को मुंह में ठूंसे मां जबरदस्ती अपनी रुलाई रोक रही थीं, पर आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। खच्चर पर उनकी आवश्यकता का सारा सामान लाद, पिताजी ने मां की उंगली को अपनी नन्हीं हथेली में मजबूती से पकड़े जम्पा को अलग किया तो जम्पा का कलेजा सहम गया था। भीतर से विछोह की पीड़ा की तेज लहर उनके ह्मदय को डुबाती हुई गले में आकर फंस गई थी। घबड़ाकर वे मां को कमर से पकड़कर झूल गए थे।”मां, मैं नहीं जा सकूंगा। मुझे मत भेजो मां।” वे बिलख पड़े।मां के धैर्य का बांध टूट गया था। फफकते हुए बेटे के सिर को सीने से चिपका लिया और पिताजी से विनती की थी-“भगवान के लिए आप और हम भी चलें जम्पा के साथ। कैसे रहेगा मेरा बच्चा अकेला? कैसे पहुंच पाएगा पहाड़ों के उस पार?” उनके स्वर में गिड़गिड़ाहट थी।पिताजी का स्वर भीग गया था। भर्राए गले से बोले-“जम्पा की मां, क्या मैं अपने बेटे के प्रति निष्ठुर हूं? हम-तुम यहां की जमीन-जायदाद, भेड़ें सब छोड़कर कैसे चले जाएं? फिर दोरजे का हाल नहीं सुना था? बच्चों को लेकर सीमा पार जा रहा था पर इसी पार उसे गिरफ्तार कर जेल में ठूस दिया गया और बच्चों को गायब कर दिया गया। केवल बच्चे रहते हैं तो जल्दी किसी को शक नहीं होता है अन्यथा मैं कभी अपने जम्पा को अकेले नहीं भेजता।”पिताजी ने तर्क दिया था। जम्पा मां के सीने से अभी तक चिपके हुए थे। मां की ममतामयी ऊष्मा के साथ ही उसके ह्मदय की धड़कनें भी जम्पा को साफ सुनाई दे रही थीं, जो आज तक एकांत के क्षणों में उनके कानों में गूंज उठती हैं। फिर कभी न लिपट पाए जम्पा मां के सीने से और न ही सुन सके अपनी मां के ह्मदय की धड़कनें।विवशता में अपने से अलग किया था मां ने उन्हें और हिदायतें देने लगी थीं-“देखो, संभलकर चढ़ना चोटियों पर। ज्यादा ठंड लगे तो चुक-टू भी ओढ़ लेना।”जम्पा उदास आंखों से ताकते, सिर हिला हामी भर रहे थे।”रात में सभी बच्चों के बीच में सोना। पेशाब के लिए अपने साथ किसी को ले लेना।””हूं।” जम्पा को तेजी से रुलाई फूट पड़ी। यह उनकी सबसे बड़ी दुर्बलता थी। रात में वे अकेले नहीं जा सकते थे। मां या पिताजी को साथ लेकर ही वे बाहर निकलते थे।”घबड़ाओ नहीं जम्पा! उस पार तुम लोगों के लिए उचित व्यवस्था है। अनाथ नहीं रहोगे तुम। भारत सरकार के सहयोग से शरणार्थियों के लिए रहने और पढ़ने की व्यवस्था परम पावनजी ने की है। यही बच्चे उनकी उम्मीद हैं। बहुत ध्यान से वहां उनका पालन-पोषण होता है।”पिताजी एक ही उत्तर से मां और उन्हें दोनों को आश्वस्त करने में लगे थे।”आप सीमा तक इसके साथ जाएंगे न?” मां अधीर होकर पूछ रही थीं।”पूरा प्रयास करूंगा कि अपने सामने ही इन सबको चोटियों पर चढ़ाकर तब लौटूं। आगे भगवान जानें।”उन्होंने जम्पा की उंगली पकड़ ली थी।”अपना हाल किसी भी तरह भेजना बेटा।”मां का करुण क्रन्दन युम्-डोग्-छो की निस्तब्ध वादियों को भंग करने लगा था।जम्पा बेचैनी में उठकर खड़े हो गए थे। कमरे के भीतर तक आज भी मां की सिसकियां सुनाई पड़ रही थीं। तब से लेकर आज तक न तो मां की ही कोई खबर मिली और न ही वे किसी भी तरह अपना हाल मां तक पहुंचा पाए। न जाने किस हाल में होंगे मां और पिताजी? मां तो अब इतनी बूढ़ी हो गई होंगी कि शायद ही सूरत से पहचान में आएं। पर उनके सीने की ऊष्मा और ममतामयी धड़कनें ही उसका पता होंगी। स्वयं उन्हें भी तो देखकर शायद ही मां पहचान सके। नन्हें से जम्पा का ध्यान होगा उसे। इन तीस-पैंतीस वर्षों में कितना कुछ तो बदल चुका है। उनकी मठ में शिक्षा पूरी हुई, फिर गेशे की पदवी के साथ ही उन्हें इस संस्थान के अध्यक्ष के रूप में बच्चों को शिक्षित करने और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की दीक्षा देने का दायित्व भी सौंपा गया है। काश! मां होतीं इस समय यहां।वे बेचैनी में टहलने लगे। सामने खिड़की से सारनाथ का अशोक स्तंभ साफ-साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने घड़ी की ओर देखा। याद आया, इस समय देवयानी का अंतिम पीरियड चल रहा होगा। कुछ ही देर में वह आएगी। कितनी आत्मीय-सी लगती है बातचीत में। अपने विषय के साथ ही आसपास के परिवेश पर भी कितनी सशक्त पकड़ है उसकी। पैनी दृष्टि से चीजों को परखती है और फिर अपनी निर्भीक टिप्पणी दे डालती है, बिना यह परवाह किए कि सामने वाले को बुरा भी लग सकता है।”सर, क्या आपको भी यह नहीं लगता कि आज के वैज्ञानिक युग में वह भी जब आपके समुदाय को आजादी चाहिए, भिक्षु नहीं बल्कि वीर सैनिक बनाए जाने चाहिए?” एक दिन धर्म पर बातें करते-करते एकाएक गेशे जम्पा के सामने ही बोल पड़ी थी।”क्या तात्पर्य है?” गेशे जम्पा ने शांत स्वर में पूछा था।”यही कि अभी पिछले दिनों यहां सारनाथ में भी 162 तिब्बतियों को भिक्षु बनाया गया। एक तरफ तिब्बत में पराधीन तिब्बतियों की शिक्षा पर भी पहरे हैं और यहां पुन: उसी प्राचीन रीति-रिवाज को कसकर पकड़ने की कोशिश। क्या आप समझते हैं कि इन भिक्षुओं के द्वारा आजादी मिल जाएगी?””देवयानी, एक मिनट मेरी बात सुनोगी?” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था।”जी, कहिए।” वह उनकी ओर देखने लगी थी, लेकिन अन्तर में विचार उमड़-घुमड़ रहे थे।”साबरमती के संत को तो जानती हो न? वे हमारे आदर्श हैं। उन्होंने हिंसा से नहीं, बल्कि अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजों का सामना किया!””परन्तु गेला, क्षमा करिएगा, मैं सहमत नहीं हूं आपके कथन से। आपको क्या लगता है कि केवल उनकी अहिंसा के कारण ही हमें आजादी मिली? चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, लाला लाजपतराय या सुभाषचंद्र बोस जैसे अनेक क्रांतिकारियों का कोई योगदान नहीं था? सिर कटा लेने का जज्बा उस समय के लगभग हर युवा भारतीय खून में हिलोरे ले रहा था। नरम और गरम दोनों धाराएं एक साथ प्रवाहमान थीं। चौतरफा दबाव पड़ा था अंग्रेजी हुकूमत पर तब जाकर हम स्वतंत्र हो पाए थे।” देवयानी उनकी अप्रसन्नता की परवाह किए बिना गर्व से बोलती जा रही थी। कुछ क्षण के लिए गेशे जम्पा निरुत्तर से हो उठे थे।”दरअसल, परम पावनजी किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं कर सकते। उनका मानना है कि हिंसात्मक कार्य से सत्य की साधना नहीं की जा सकती। यदि साधन ही सही नहीं है तो उसका साध्य हितकर कैसे होगा? इसलिए हम तिब्बत की मुक्ति को विश्व-शांति और मानव-कल्याण की साधना के रूप में देखते हैं।” बोलते हुए उनकी दृष्टि सामने दीवार पर थी। देवयानी उनके चेहरे को ध्यान से देख रही थी। कक्ष में अन्य अध्यापक भी बैठे उनकी बातें सुन रहे थे।”तो क्या आपको लगता है कि दूर देश में बैठकर इन नीतियों के बल पर तिब्बत आजाद हो जाएगा?”देवयानी का अगला प्रश्न उभरा था। बगल में बैठे बालेंदु थपलियाल द्वारा फुसफुसाकर देवयानी से इस प्रकार के प्रश्न न करने की सलाह भी उनके कानों में पड़ी थी।”नहीं, नहीं, थपलियाल! संकोच मत करो। इस बिंदु पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। छिपाने से तो छोटा-सा फोड़ा भी नासूर बन जाता है। भारतीयों के मन में अकसर यह प्रश्न कौंधता है कि हम दूसरे देशों में बैठकर किस प्रकार आजादी की बात कर सकते हैं? इसके लिए तो हमें मैदान में उतरना ही होगा। इस दिशा में हम प्रयास कर भी रहे हैं कि अहिंसा में विश्वास रखने वाले लोगों को समूह में धीरे-धीरे वहां भेजें। अब दूसरे देश में रहकर अपनी मुक्ति-साधना को चलाना कठिन है।”गेशे जम्पा की आवाज संयत थी।देवयानी एकाएक ग्लानि बोध से भर उठी।”गेला, मुझे क्षमा करें। मेरा आशय कताई यह नहीं है कि हम आप सबको भार…मेरा मतलब, भारत में आप लोगों का रहना हमें भारी लग रहा है।””तुम्हें दुखी होने की आवश्यकता नहीं देवयानी। हम तुम्हारी भावना समझते हैं। भारत भी यथासंभव हमारी मदद कर रहा है। चीन के साथ उसकी अपनी अलग नीतियां हैं। हम अपनी सीमा से परे जाकर कुछ अपेक्षा नहीं करते। हम भी चाहते हैं कि भारत-चीन सम्बंध अच्छे रहें। परन्तु इसके लिए भी जरूरी है कि तिब्बत जैसा शांतिप्रिय देश “बफर स्टेट” की भूमिका निभाता रहे, अन्यथा समस्या हो सकती है दो महाशक्तियों के बीच।”देवयानी ने आगे कोई तर्क नहीं किया था। बस, कुछ देर यूं ही उनके चेहरे को एकटक देखती रही थी। बालेंदु थपलियाल आज्ञा लेकर अपनी कक्षा लेने चले गए थे। धीरे-धीरे उनका कक्ष खाली हो गया परन्तु देवयानी किसी ऊहापोह में बैठी रही थी। उन्होंने ही पूछा था-“आज पीरियड नहीं है, देवयानी?””जी, है…कहीं आपने मेरी बातों को अन्यथा तो नहीं लिया सर?” वह उलझन में थी। क्रमश….32