पद्मश्री वचनेश त्रिपाठी का अवसान
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पद्मश्री वचनेश त्रिपाठी का अवसान

Written byArchiveArchive
Oct 12, 2006, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 12 Oct 2006 00:00:00

पद्मश्री वचनेश त्रिपाठी का अवसानक्रांति-हंस का महाप्रयाणराष्ट्रवादी पत्रकारिता के आदर्श -कुप्.सी.सुदर्शन, सरसंघचालक, रा.स्व.संघप्रेरक और अनुकरणीय व्यक्तित्व -मोहनराव भागवत, सरकार्यवाह, रा.स्व.संघदूषित सेकुलर मानसिकता ने फिर किया एक क्रांतिवीर का अपमानमहान क्रान्तिकारी, आदर्श स्वयंसेवक थे वे -अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्रीदागियों के खिलाफ अदालत ने कसा शिकंजा -कुमारेशहत्या के मामले में शिबू सोरेन को सजा सोनिया की संप्रग सरकार के मंत्रिमण्डल में और भी हैं दागी1993 मुम्बई बम विस्फोट प्रकरण …संजय दत्त शस्त्र कानून के अंतर्गत दोषी -मुम्बई प्रतिनिधिताज गलियारा प्रकरण फिर कठघरे में माया – फिरदौस खानप्राथमिक कक्षा से यौन शिक्षा का सरकारी आदेश हमारी संस्कृति को खत्म करने का षडंत्र -आचार्य विजय रत्नसुन्दरसूरिबिहार में राजग सरकार का एक साल -पटना से संजीव कुमारशबरी मलय-16विचार-गंगाइस सप्ताह आपका भविष्यपचास वर्ष पहलेऐसी भाषा-कैसी भाषा एनडीएमसी क्षेत्र में बेसमेंट से हटेंगे ऑफिसमंथन श्रद्धाञ्जलि- पुरुषोत्तम निझावन वामपंथी दमन का भारतीय शिकार – देवेन्द्र स्वरूप गहरे पानी पैठ दाम इसलिए घटे क्योंकि….”घर के बुजुर्ग कितने सम्मानित, क्यों उपेक्षित?” विषयक परिचर्चा की अंतिम कड़ीशाजीना ने बनाया कीर्तिमान संस्कृत में पाए सर्वाधिक अंकस्त्री महिला पाठकों को आमंत्रण कितना संवेदनशील है महिलाओं के प्रति समाज?मंगलम, शुभ मंगलमराजनाथ सिंह पुन: भाजपा अध्यक्ष बने – प्रतिनिधिसंघ के कार्यक्रम में का.हि.वि. के शिक्षकों ने भाग लिया तो अर्जुन के इशारे पर “पंजाब” ने दिया नोटिस – प्रतिनिधिगुजरात में देश का प्रथम सांध्य न्यायालय – किशोर मकवाणाश्रद्धांजलि हिन्दू समाज की एकजुटता के प्रखर साधक स्वामी सत्यानन्द सरस्वती का अवसान – प्रदीप कुमारनई दिल्ली में विद्या भारती का 19वां राष्ट्रीय खेलकूद समारोह जीवन में सफलता के लिएसंस्कृति से जुड़ो, निर्भय बनो -नवजोत सिंह सिद्धू, भाजपा सासंद एवं पूर्व क्रिकेटर – प्रतिनिधिनेपाल में ऐतिहासिक शांति समझौता शांति और प्रगति की राह? -काठमाण्डू प्रतिनिधिगोरक्षपीठ की “दिग्विजय” साधना -योगी आदित्यनाथभारतीय इतिहास का पुनर्लेखन-2 वामपंथ ने किया अनर्थ -ठाकुर राम सिंह संरक्षक, अ.भा. इतिहास संकलन योजनाकजाकिस्तान में हिन्दुओं का उत्पीड़न, मंदिर तोड़ा, कृष्णभक्तों के घरों पर चला बुलडोजरइंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री ने विरोध किया, भारत के प्रधानमंत्री खामोश – प्रस्तुति : जितेन्द्र तिवारीदादरा नगर हवेली अवसर मिले तो क्या नहीं कर सकते हम!! – प्रतिनिधिश्रीगुरुजी जन्मशताब्दी-समाचार दर्शन – प्रतिनिधिकानपुर में बिरसा मुण्डा वनवासी छात्रावास का रजत जयन्ती समारोह हृदय की विशालता, संवेदनशीलता एवं व्यवहार-कुशलता वनवासियों से सीखें -गुणवन्त सिंह कोठारी, महामंत्री, वनवासी कल्याण आश्रम – आर.एन.विश्वकर्मानरेश शांडिल्य के गजल संग्रह “मैं सदियों की प्यास” का लोकार्पण – प्रतिनिधिगंगा, गीता और हिमालय की तरह संस्कृत सनातन रहेगी -प्रो. जी.आर.सुन्दर कुलसचिव, भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली – प्रतिनिधिकाशी में अन्तरराष्ट्रीय धर्म-संस्कृति संगम सम्पन्न संकटों से घिरी दुनिया में धर्म-मार्ग ही समाधान – वि.सं.के., काशी2उस आग्नेय पथिक के दर्शन अब नहीं होंगे। दारुलशफा से राष्ट्रधर्म कार्यालय तक, चाहे भीषण गर्मी हो या जाड़ा, 90 वर्ष की अवस्था में भी पैदल ही चलकर आने वाला वह क्रान्तिपुरुष चला गया। स्वातंत्र्य समर में जिस तरुण ने हरदोई के बालामऊ जंक्शन पर रेल-यातायात अवरुद्ध कर दिया था, पुलिस चौकी जिसकी क्रोधाग्नि में जलकर स्वाहा हो गई थी, 15 साल की अल्पायु में मैनपुरी बमकाण्ड के फरार क्रांतिकारी पंडित देवनारायण भारती के सान्निध्य में जिस किशोर ने विद्यापथ छोड़ क्रांतिपथ अपना लिया, उस क्रान्तियोद्धा के दर्शन अब ऋषि शांडिल्य की तपोभूमि संडीला को नहीं होंगे। संडीला के लोगों का मस्तक जिसके कारण सदा गौरवान्वित रहा, ऐसे पाञ्चजन्य के पूर्व संपादक श्री वचनेश त्रिपाठी अब नहीं रहे। गत 30 नवम्बर, 2006 को उनका लखनऊ में निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे। पिछले कुछ महीनों से वे अस्वस्थ चल रहे थे और बड़े पुत्र डा. प्रमोद त्रिपाठी के लखनऊ स्थित आवास पर रहकर स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे।24 जनवरी, 1914 में सण्डीला के मंगल बाजार में उनका जन्म हुआ। उनका प्रारंभिक नाम पुष्कर नाथ था। पिता पं. मनोहर लाल त्रिपाठी एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे। घर के पास में ही सुप्रसिद्ध शीतला देवी मंदिर में नित्य उनकी आराधना चलती थी। सण्डीला के इल्तिफात रसूल इण्टरमीडिएट कालेज में पढ़ाई करते समय ही उनका सम्पर्क क्रान्तिकारी धारा से हो चुका था। वह 1925 का साल था। सण्डीला के समीपवर्ती काकोरी स्टेशन के पास ट्रेन रोककर क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजी खजाना लूट लिया। चारों ओर अंग्रेज पुलिस ने जबरदस्त छापेमारी की। अश्फाक उल्ला खां, प. रामप्रसाद बिस्मिल सहित अनेक क्रांतिकारियों को 1927 में फांसी पर चढ़ा दिया गया। पुष्कर के बालमन पर इन घटनाओं का गहरा असर पड़ा। उसी समय पुष्कर नाथ ने भी क्रान्तिपथ का अनुसरण करते हुए अपना जीवन मातृभूमि की सेवा में अर्पित करने का निश्चय किया। वे चन्द्रशेखर आजाद और सरदार भगत सिंह की क्रान्ति-टोली में सम्मिलित हो गए। अंग्रेज सरकार ने उनकी भी गिरफ्तारी की और उन्होंने बरेली जेल में डेढ़ साल की सजा काटी। जेल से बाहर आने तक क्रान्ति ज्वाला के अनेक प्रमुख सूत्र शहीद हो चुके थे। चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह के बलिदान ने उन्हें भीतर तक झकझोर डाला। युवा पुष्कर नाथ, जो अब वचनेश त्रिपाठी बन चुके थे, ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध कलम उठाई और “विद्रोही” नाम से लिखने लगे। बाद में वे पुन: गिरफ्तार हुए और 10 महीने की सजा मिली। फिर सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भी भाग लिया। आगे उनका संपर्क रा.स्व.संघ से हुआ और फिर तो मानो उन्हें जीवन का मार्ग ही मिल गया। संघ पर प्रथम प्रतिबंध लगने के पहले की बात है। तब श्री अटल बिहारी वाजपेयी सण्डीला में संघ कार्य विस्तार के लिए भेजे गए थे। पं. दीनदयाल उपाध्याय और श्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उन्होंने संघ कार्य के विस्तार के लिए सण्डीला और आस-पास के ग्रामों में सघन प्रवास किया। वे सण्डीला के समीप ढिकुन्नी गांव में एक विद्यालय में शिक्षक भी रहे थे। फिर सण्डीला, रा.स्व.संघ के तहसील कार्यवाह बने और संघ शिक्षा वर्ग द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।सन् 1942 में उन्होंने लखनऊ से एक भूमिगत पत्र “चिंगारी” का संपादन किया था। 1949 में जब लखनऊ से पाञ्चजन्य साप्ताहिक एवं दैनिक स्वदेश का प्रकाशन प्रारंभ हुआ तो वे अटल जी के संपादकीय सहयोगी बनकर संपादन कार्य में जुट गए। वे पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म एवं दैनिक स्वदेश के अनेक वर्षों तक संपादक रहे। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया की फीचर सेवा के नामांकित लेखकों में वचनेश जी का भी नाम था। 15 वर्ष तक वे आल इण्डिया एडिटर्स कान्फ्रेंस के सदस्य रहे। उनकी देश और साहित्य सेवा को देखते हुए उन्हें सन् 2001 में राष्ट्रपति डा.के.आर. नारायणन ने पद्मश्री से सम्मानित किया। उन्हें इसके पूर्व बड़ा बाजार कुमारसभा पुस्तकालय, कोलकाता, उ.प्र. हिन्दी संस्थान सहित अनेक ख्यातलब्ध संस्थाएं अनेक अलंकरणों से सम्मानित कर चुकी थीं।राष्ट्रधर्म प्रकाशन से प्रारम्भ से जुड़े रहे श्री बजरंग शरण तिवारी बताते हैं- “लखनऊ से 31 अगस्त, 1947 (रक्षाबंधन) के दिन राष्ट्रधर्म मासिक का पहला अंक निकला। जनवरी, 1948 में पाञ्चजन्य और 1950 में दैनिक स्वदेश प्रारम्भ हुआ। इन पत्रों के संपादक अटल जी थे। उन्होंने वचनेश जी को स्वदेश के साप्ताहिक साहित्यिक संस्करण का संपादक बनाया। 1952 में स्वदेश का प्रकाशन बन्द हो गया। इस बीच वचनेश जी ने अनेक पुस्तकें भी लिखीं।” लखनऊ में 1960 में सांध्य दैनिक तरुण भारत शुरू हुआ। वचनेश जी इसके संपादक बने। राष्ट्रधर्म प्रकाशन में पिछले 50 वर्ष से कार्यरत श्री पानगिरि गोस्वामी बताते हैं कि उस समय तरुण भारत की इतनी मांग थी कि बाजार में इसकी प्रतियां देखते ही देखते खत्म हो जाती थीं। उनकी गिनती लोकप्रिय संपादकों व पत्रकारों में होने लगी। बाद में 1967 से 1973 तथा 1975 से 1984 तक वे राष्ट्रधर्म मासिक के व 1973 से “75 तक पाञ्चजन्य साप्ताहिक के संपादक रहे।वे भारतीय स्वातंत्र्य आन्दोलन एवं क्रान्तिकारियों के इतिहास के जीते-जागते महाग्रन्थ थे। देश के स्वाधीनता आन्दोलन की क्रान्ति गाथाएं सुनाने में उनकी गहरी रुचि थी। संत-बाबाओं जैसी अपनी मस्ती में मगन रहना, कुछ गाते-गुनगुनाते रहना उनका स्वभाव था। पाञ्चजन्य और राष्ट्रधर्म में छपने वाला उनका नियमित स्तंभ संभवत: देश के क्रान्ति इतिहास पर किसी लेखक द्वारा सर्वाधिक लम्बे समय तक लिखा जाने वाला स्तंभ है। उनकी अग्निधर्मा लेखनी से जो कृतियां बन पड़ीं, उनके नाम पढ़-सुनकर कोई अनजान सा व्यक्ति भी उनके व्यक्त्वि के बारे में अंदाजा लगा सकता है। जरा याद करो कुर्बानी (तीन खंडों में), वे आजाद थे, शहीद, अग्निपथ के राही, सुकरात का प्याला, सूरज के बेटे, हम विद्रोही चिर अशांत, गोदावरी की खोज, काकोरी कांड, इतिहास के झरोखे से आदि पुस्तकें उनके रचना कर्म के मात्र कुछ स्फुलिंग हैं। उन्होंने 80 के लगभग पुस्तकें लिखीं। वे कवि भी थे। पाञ्चजन्य और राष्ट्रधर्म में उनकी कविताएं अक्सर प्रकाशित होती थीं। बाल कथा, कहानी, कविता, संस्मरण, उपन्यास, इतिहास-कथाएं, निबंध, वैचारिक लेख आदि लेखन की सभी विधाओं में उनकी लेखनी गजब निष्णात थी। और कागज की उनकी नजरों में कीमत ऐसी कि कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों पर भी वे लिखते थे। जीवन की अंतिम श्वांस तक उन्होंने सरस्वती की अनथक साधना की। उन्होंने कालजयी रचनाओं का मात्र सृजन ही नहीं किया वरन् कालजयी जीवन जिया भी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को मिलने वाली राजकीय सुविधाएं, पेंशन आदि स्वीकार नहीं कीं। देश की राजनीति की बड़ी-बड़ी विभूतियों के मन में उनके प्रति गहन श्रद्धा थी लेकिन उन्होंने कभी किसी सरकारी पद पर बैठना स्वीकार नहीं किया। खादी का कुर्ता-पाजामा, घनी-उजली सफेद दाढ़ी, सूर्य समान दहकता मुख मंडल, पैर में एक साधारण सी चप्पल, खद्दर का एक पुराना झोला जिसमें कुछ कागज, किताबें लिए सण्डीला स्टेशन से लगभग साढ़े तीन कि.मी. दूर अपने घर से स्टेशन तक अक्सर वे पैदल ही आते। और रास्ते में कितने ही लोग उन्हें नमस्कार करते, अक्सर कोई पुराने मौलाना या साथी-दोस्त मिल जाते तो प्यार भरी बातों का ऐसा सिलसिला शुरू हो जाता कि सामने वाला बस ठगा सा ही रह जाता। सण्डीलावासियों के मन में उनके प्रति और सण्डीलावासियों के प्रति उनके मन में बहुत प्यार व सम्मान था। सुबह लखनऊ जाने वाली दून एक्सप्रेस या जनता एक्सप्रेस में साधारण डिब्बे में बैठकर यात्रा करना उन्हें भाता था। सण्डीला से लखनऊ आते समय या तो उनका रचना कर्म चलता रहता या फिर साथी यात्रियों से वे गपशप करते रहते, लेकिन जैसे ही ट्रेन “काकोरी” के पास आती वे बेसब्राी से बाहर झांकने लगते थे मानो काकोरी काण्ड के अपने बिछुड़े साथियों-क्रांतिकारियों को ही बाहर खोज रहे हों। लखनऊ में “शहीद स्मृति समिति” के सचिव उदय खत्री (रामकृष्ण खत्री के पुत्र) बताते हैं-“वे भारतीय क्रांति-इतिहास के चलते-फिरते ज्ञान-कोष थे। उनके द्वारा बताए गए व लिखे गए तथ्यों को कोई चुनौती नहीं दे सकता था। ऐसी कितनी ही अज्ञात क्रान्ति घटनाओं व क्रान्तिकारियों को उन्होंने इतिहास के रहस्यों में से निकाल कर जीवंत किया। वे सही अर्थों में क्रान्ति इतिहास के शोधकर्ता थे। उन्होंने पाञ्चजन्य और राष्ट्रधर्म के संपादक रहते हुए जो क्रान्ति विशेषांक निकाले, वे क्रान्ति इतिहास के दस्तावेज हैं।”गत 30 नवम्बर की सायंकाल लखनऊ के बैकुंठधाम घाट पर उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। इस अवसर पर उन्हें हजारों लोगों ने अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित की। इसके पूर्व उनकी पार्थिव देह अंतिम दर्शनार्थ राष्ट्रधर्म कार्यालय और प्रदेश भाजपा कार्यालय भी ले जायी गयी, जहां रा.स्व.संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री अनन्त रामचन्द्र गोखले, अ.भा. कार्यकारी मण्डल के सदस्य श्री ओमप्रकाश, प्रांत प्रचारक श्री कृपाशंकर, पूर्व मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री केशरी नाथ त्रिपाठी, राष्ट्रधर्म के संपादक श्री आनंद मिश्र “अभय” व राष्ट्रधर्म प्रकाशन से जुड़े अन्य लोगों, श्री हृदय नारायण दीक्षित आदि वरिष्ठ नेताओं ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए।-लखनऊ से विजय कुमार के साथ दिल्ली ब्यूरो3

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