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-रविचन्द्र गुप्ता
एक चौदह वर्षीय बालक दण्डाधिकारी के सामने खुलेआम अपना नाम “आजाद” घोषित कर समस्त भारतीय युवाओं का हृदय सम्राट बन गया। दण्डाधिकारी ने जब उसके मुख से पिता का नाम “स्वाधीन” और निवास “जेलखाना” सुना तो वह क्रोध में आग बबूला हो गया और चन्द्रशेखर को पन्द्रह बेंतों की सजा का आदेश दे डाला। नंगे बदन पर बेंतों की मार पड़नी आरम्भ हुई और थोड़ी ही देर में कोमल शरीर से रक्त बहने लगा। लेकिन जैसे-जैसे बेंतों की संख्या बढ़ती जाती, वैसे ही हर बेंत के बाद “महात्मा गांधी की जय” का जोशीला उच्चारण उसकी संकल्प शक्ति में वृद्धि कर देता। भरी अदालत में ब्रिटिश क्रूरता के इस नंगे नाच को रोकने वाला कोई न था।
चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश में झाबुआ जिले के भवरा (भौरा) गांव में हुआ था। वह अपने माता-पिता की पांचवी संतान थे। पारिवारिक उपेक्षा और गरीबी के कारण उन्होंने घर त्याग दिया। मुम्बई आकर कुछ समय तक चन्द्रशेखर ने समुद्री जहाजों पर मजदूरी की, लेकिन बाद में वह संस्कृत अध्ययन की ललक में काशी आ गये। 15 बेंतों की सजा के बाद अगले ही दिन चन्द्रशेखर का काशी में नागरिक अभिनन्दन किया गया। इसके बाद आजाद ने देश को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति को ही अपना लक्ष्य बना लिया। वह क्रांतिकारी संगठन “हिदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन” के सदस्य बन गये। बाद में वह इस संगठन के कमांडर-इन-चीफ बने। क्रान्तिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने हेतु 9 अगस्त, 1925 को काकोरी रेलवे स्टेशन के निकट सरकारी खजाना लूटा गया। काकोरी मामले में आजाद के चार साथियों- राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह एवं राजेन्द्र लाहिड़ी को फांसी की सजा दी गई। चन्द्रशेखर आजाद भूमिगत रह कर क्रान्तिकारी आन्दोलन को तेज करने में जुट गये। उन्होंने घोषणा कर दी, “सरकार मुझे कभी भी जीवित नहीं पकड़ सकती।” 1928 में साइमन कमीशन का विरोध करते हुए लाला लाजपत राय लाठी-प्रहार से शहीद हो गये। लाला लाजपत राय की हत्या भारत का अपमान था। लेकिन भगत सिंह एवं उनके साथियों के साथ आजाद के दल ने पुलिस उपाधीक्षक जे.पी. सांडर्स का वध कर राष्ट्रीय अपमान का बदला ले लिया।
आजाद के दल ने दिल्ली के सेठ लक्ष्मी नारायण गडोदिया से दल की सहायतार्थ दस हजार रुपए की मांग की। मांग ठुकराने पर 6 जून, 1930 को दल ने गडोदिया स्टोर लूट लिया। लेकिन लूट में प्राप्त महिलाओं के आभूषणों को उन्होंने खजांची को वापस लौटा दिया। इस लूट में उन्हें 14,000 रुपए की प्राप्ति हुई और यह राशि दल में शस्त्रादि खरीदने हेतु बांट दी गई। आजाद ने भगत सिंह को जेल तोड़कर मुक्त कराने की योजना बना ली थी, लेकिन इसके लिए भगत सिंह से स्वीकृति नहीं मिली। आजाद वेष बदल कर पुलिस को चकमा देने में निपुण थे। गुप्तचरों से आजाद के किसी भी नगर में होने की सूचना मिलते ही उस नगर में पुलिस को चौकन्ना कर दिया जाता। पुलिस की गश्त बढ़ा दी जाती थी, लेकिन फिर भी आजाद पुलिस से दोस्ती कर पुलिसकर्मियों से पंजा लड़ाते देखे जाते थे और पुलिस को शक होने से पहले ही नौ दो ग्यारह हो जाते थे।
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